Thursday, 11 January 2018

दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : व्यवहारवादी समाजशास्त्र

व्यवहारवादी समाजशास्त्र (संस्करण : 2009)
  • हर मुद्दे पर आवश्यक और अनावश्यकता का निर्णय हम इस विधि से पाते हैं कि निश्चित लक्ष्यगामी स्थिति-गति के लिए प्रेरक, सहायक होने के सभी तथ्यों को आवश्यकता के अर्थ में और इसके विपरीत अर्थात् लक्ष्य के विपरीत सभी प्रकार की देशकाल में हुई घटनाएँ मानव परंपरा के लिये अनावश्यक है। सम्पूर्ण मानव का मूल लक्ष्य इसकी अक्षुण्णता, अखण्डता सार्वभौमता ही है। इसका प्रमाण स्वरूप समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व है। यह दायित्व, कर्तव्य, संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता पूर्वक हर मानव में, से, के लिये समान रूप में आवश्यक और समीचीन होना और सार्थकता का मूल्यांकन होना तथा नित्य उत्सव होना पाया जाता है। इसी अर्थ में आवश्यकता और अनावश्यकता का वर्गीकरण हो पाता है। लक्ष्य और प्रमाण के सार्थकता, सामरस्यता सहज सभी श्रुति-स्मृति, साक्षात्कार, अनुभव ज्ञान, दर्शन, व्यवहार, व्यवस्थाएँ, नित्यगति रूप में सार्थक होना पाया जाता है। इसी क्रम में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, परिवार मानव, स्वायत्त मानव, संयोजन, योजन कार्यविधि से मानव परंपरा युगों-युगों तक सफल होने का मार्ग प्रशस्त है। (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर: 103-104)
  • जागृति और उसका प्रमाण सहज रूप में ही जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान सहित परिवारमूलक व्यवस्था विधि से सफल होना पाया जाता है, सार्थक होना पाया जाता है। सफल होने का तात्पर्य मानव स्वयं-स्फूर्त विधि से व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हो जाने से है। सार्थकता का तात्पर्य समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने से है। अस्तित्व सहज रूप में ही मानव अपने त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने योग्य इकाई है। यही मानव जागृति को निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक प्रमाणित होने, करने का एवं करने के लिये मत देने का सूत्र है। इस विधि से सार्वभौम लक्ष्य रूपी जागृति और जागृति प्रमाण, मानवीयतापूर्ण आचरण स्वयं कर्त्तव्यों, दायित्वों,  प्रेरकताओं और सम्पूर्ण कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत-कारित, अनुमोदित विधियों से मानव परंपरा में स्पष्ट हो जाता है। यही प्रधान रूप में संविधान की मंशा है। (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर: 124) 
  • लक्ष्य सहज प्रमाणों का
मूल्यांकन विधि - 1. स्वयं में, एक दूसरे के परस्परता में यथा प्रत्येक मनुष्य अपने में, परस्पर मानव संबंधों में और नैसर्गिक संबंधों में। 2. समझदारी, समझदारी के अनुरूप निष्ठा (कर्तव्य, दायित्व के रूप में किया गया निर्वहन और उसका फल-परिणाम) सहज विधि। (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर: 125-126)
  • संतुलन ही हर व्यक्ति में दायित्व और कर्तव्य के रूप में नियंत्रित रहना पाया जाता है। यही संपूर्ण कार्यों में नियमित रहना होता है। इस प्रकार मानव अपने परिभाषा के अनुरूप अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान को स्वीकृति के रूप में स्वानुशासन के रूप में स्वतंत्रता को; समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में स्वराज्य व्यवस्था को प्रमाणित करता है। यही मानव सहज परिभाषा का सार्थकता, उपकार, तृप्ति और उसकी निरंतरता है। अस्तु, मानव अपने परिभाषा सहज सार्थकता को प्रमाणित करना ही मौलिक अधिकार है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 148)
  • ऊपर कहे प्रतिज्ञा कार्यों में यह तथ्य उद्घाटित हुआ ही है कि स्वायत्त मानवाधिकारोपरान्त ही विवाह घटना का उपयोगी और सार्थक होना पाया जाता है। स्वायत्त मानव का पहचान स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक और व्यवसाय में स्वावलंबन सहज प्रमाण के आधार पर सम्पन्न होना व्यवहारिक है। ऐसी अर्हता को शिक्षा-संस्कार परंपरा में प्रावधानित रहना मानव सहज वैभव में से एक प्रधान आयाम है। इस प्रकार चेतना विकास मूल्य शिक्षा सम्पन्न शिक्षित व्यक्ति ही अध्ययनपूर्वक अपने में स्वायत्तता का अनुभव करने और सत्यापित करता है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा, मानवीयतापूर्ण ज्ञान, दर्शन और आचरण सम्पूर्ण अध्ययनोपरांत किये जाने वाले हर सत्यापन को वाचिक प्रमाण के रूप में स्वीकारना नैसर्गिक व्यवहारिक आवश्यक मानव परंपरा में से प्रयोजनशील होना देखा गया है क्योंकि परस्पर सम्बोधन सत्यापन के साथ ही सम्बंध, कर्तव्य व दायित्वों की अपेक्षाएँ और प्रवृत्तियाँ परस्परता में अथवा हरेक पक्ष में स्वयं स्फूर्त होना पाया जाता है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 153)
  • स्वायत्त मानवाधिकार के लिए 18 वर्ष की आयु तक सम्पन्न होने की व्यवस्था है। इसके उपरान्त परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होने के लिए चार वर्ष न्यूनतम रूप में होना आवश्यक है। इसमें हर अभिभावक, आचार्य, भाई-बहन, मित्र सबको प्रमाण देखने को मिलेंगे। इस अवधि के उपरान्त प्रधानत: अभिभावक, प्रौढ़, भाई-बहन, मित्रों की सम्मति विवाह में प्रयोजित होने वाले नर-नारी की प्रवृत्तियों का संगीत अथवा एक मानसिकता के आधार पर आचार्यों की सम्मति सहित विवाह संस्कार सम्पन्न होगा। यही मानव परंपरा में मानवीयतापूर्ण पद्घत्ति से मानव संचेतना सहित सम्पन्न होने वाला विवाह संस्कार उत्सव है। इसके लिये आयु विचार स्पष्ट हो गया। बाईस वर्ष के उपरान्त ही विवाह सम्पन्न होना अध्ययन विधि से स्पष्ट हो चुका है। इसी अवधि के साथ दायित्व, कर्त्तव्य और परिवार मानव का सम्पूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता और अवधियाँ स्पष्ट हो चुकी है। दूसरी विधि से स्वास्थ्य संबंध में सोचने पर भी शरीर-अंग-अवयव पुष्टि भी इसी आयु तक सहज ही सम्पन्न होना देखा गया है। (अध्याय:6, पृष्ठ नंबर: 154)
  • मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा में मानव कुल के रूप में शरीर निर्माण गर्भाशय में होने एवं उसका पोषण-सरंक्षण-संवर्धन एक आवश्यकीय भूमिका है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए ही विवाह सम्बन्ध का सर्वोपरि प्रयोजन है। इसी के साथ-साथ यौवन और यौन विचार संयोग की आपूर्ति स्वाभाविक रूप में होना पाया जाता है। इसमें यह भी देखा गया है मानवीयतापूर्ण मानसिकता, विचार, चिन्तन (मानवीयता के प्रति दायित्व-कर्तव्य मानसिकता की सुदृढ़ता) समुन्नत और परिष्कृत होते-होते यौन-यौवन संबंधी आकर्षण अथवा सम्मोहन क्षय होता है। यह भी मानवीयता के प्रति निष्ठान्वित हर नर-नारी में परीक्षण और सत्यापन संगीत का पाया जाना नैसर्गिक है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:156)
  • तथ्य :- मानवीयतापूर्ण विधि से अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी का होना प्रधान लक्ष्य है। इसी विधि में मौलिक अधिकार और इसी क्रम में मौलिक अधिकार का स्पष्टीकरण एक दूसरे को इंगित होता है, स्वीकृत होता है, जाँचने की विधि स्वयं स्फूर्त होता है। इसी क्रम में स्वायत्त मानव के वैभवों का परीक्षण जैसा- (1) स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करने का अधिकार, प्रक्रिया और प्रमाण, (2) प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलनाधिकार प्रक्रिया और प्रमाण और (3) व्यवहार में सामाजिक एवं व्यवसाय में स्वावलंबनाधिकार, प्रक्रिया और प्रमाण एक दूसरे को समझ में आता है। समझ में आने का तात्पर्य जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने से है। ऐसे मनुष्य ही परिवार मानव और व्यवस्था मानव के रूप में प्रमाणित होना सहज है। यही सम्पूर्ण स्वत्व स्वतंत्रता और अधिकारों का वैभव और विस्तार है। इस प्रकार कर्तव्य दायित्व ही समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, भागीदारी के रूप में अधिकार है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 160-161)
  • हर परिवार मानव में जागृति का प्रभाव, जागृति का वैभव मुखरित रहता ही है। इसी आधार पर हर अभिभावक शिशुकाल से ही जागृतिकारी संस्कारों को स्थापित करने में सफल होते ही हैं। यह हर जागृत नर-नारी का कर्तव्य भी है, दायित्व भी है। इससे यह स्पष्ट है हर मनुष्य अभिभावक पद को पाने से पहले एक अनिवार्यता है, स्वायत्तपूर्ण रहना एक आवश्यकता है और परिवार मानव के रूप में प्रमाणित रहना सर्वोपरि अनिवार्यता है ही। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 181-182)
  • परिवार क्रम में
सम्बोधन                         प्रयोजन
6. स्वामी (साथी) - दायित्व
7. सेवक (सहयोगी) - कर्तव्य
(अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर: 185)
  • ...अखंड समाज सूत्र परिवार विधि से सार्थक होना पाया जाता है। परिवारों का स्वरूप और विशालता को दस सोपानों में स्पष्ट किया गया है। इसी के साथ-साथ दस सोपानों में सभा-स्वरूप व्यवस्था कार्य, कर्तव्य, दायित्व को स्पष्ट किया है। परिवार क्रम में मूल्य, चरित्र, नैतिकता अविभाज्यता को सहज ही स्पष्ट किया जा चुका है। दस सोपानीय समाज रचना और व्यवस्था गति अपने-आप में एक दूसरे को संतुलित करने के अर्थ से हम अभिहित होते हैं। जैसा:- परिवार- जिसका सूत्र सम्बन्ध मूल्य, मूल्यांकन, उभय-तृप्ति और परिवारगत उत्पादन-कार्य में पूरकता फलस्वरूप परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन है। परस्पर परिवार व्यवस्था में विनिमय एक अनिवार्य कार्य है। इसी के साथ सीखा हुआ को सिखाने, किया हुआ को कराने, समझा हुआ को समझाने का कार्य प्रणाली सदा-सदा जागृत मानव पंरपरा में वर्तमान रहता ही है। इसी क्रम में सर्वमानव सुख, सर्वमानव शुभ और सर्वमानव समाधान सर्वसुलभ होता ही रहता है। इस स्थिति को पाना सर्वमानव का अभीप्सा है। अतएव सुलभ होने का मार्ग सुस्पष्ट है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:198-199)
  • मित्र सम्बन्ध - जीवन ज्ञान सम्पन्नता के अनन्तर सुस्पष्ट हो जाता है कि सभी सम्बन्ध जीवन जागृति और उसका प्रमाणीकरण प्रणाली का ही पहचान है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान सम्पन्न होने के उपरान्त सम्पूर्ण प्रकार के सम्बन्धों, मूल्यों, मूल्यांकनों और उभयतृप्ति का पहचान, स्वीकृति मानसिकता, गति, प्रयोजन पुन: पहचान, मूल्यांकन क्रम आवर्तित रहता ही है। यह अनुस्यूत प्रक्रिया है। जीवन ही दृष्टा-कर्ता-भोक्ता होने का तथ्य जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान में पारंगत होने के फलन में सह-अस्तित्व में वर्तमानित रहता है। इसी आधार पर मित्र सम्बन्ध परस्पर अभ्युदय के लिये कामना, कार्य, मूल्यांकन करने में समर्थ रहता ही है। मित्र सम्बन्ध में भाई-भाई, बहन-बहन सम्बन्ध के सदृश जाँच, पड़ताल, विश्लेषण, निष्कर्ष, मूल्यांकन सहायक होना पाया जाता है। दूसरे भाषा में सहायक होना ही सार्थकता है। हर सम्बन्ध कम से कम दो व्यक्तियों के बीच होना पाया जाता है। भाई और मित्र सम्बन्ध में समानता है। इसको आमूलत: विश्लेषण करने पर लड़कों के साथ लड़कों की मित्रता, लड़कियों की मित्रता लड़कियों से हो पाता है। क्योंकि आशय बहिन-बहिन और भाई-भाई का ही सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का पावन रूप उभय जागृति, कर्तव्य, दायित्व उसकी गति प्रयोजन और उसका मूल्यांकन विधि से ही मित्रता और भाई-बहन सम्बन्ध सदा-सदा ही मानव परंपरा में पावन रूप में उपकार विधि और उसका शोध, निष्कर्ष को प्रस्तुत करते ही रहेंगे। पावन का तात्पर्य व्यवस्था के अर्थ में है। यही उपकार का स्वरूप है। यद्यपि सभी सम्बन्धों में आशित, इच्छित, लक्षित और वांछित तथ्य समाधान, समृद्घि अभय, सह-अस्तित्व ही है। इस आशय अथवा आवश्यकता की आपूर्ति और इसके सर्वसुलभ होने के लिये समझना-समझाना, करना-कराना, सीखना-सीखाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी क्रम में समाज गति, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी, स्वाभाविक रूप में मूल्यांकित होता है। ऐसी मूल्यांकन प्रणाली से ही मानव परंपरा में मानवीयतापूर्ण प्रणाली, पद्घति, नीति का दृढ़ता सुख, सुन्दर, समाधान, समृद्घिपूर्वक प्रमाणित होना नित्य समीचीन रहता है। ऐसे सर्ववांछित उपलब्धि के लिये मित्र संबंध अतिवांछनीय होना पाया जाता है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:213-215)
  • शिक्षा-संस्कार में अथ से इति तक मानव का अध्ययन प्रधान विधि से अध्यापन कार्य सम्पन्न होना सहज है। अध्ययन मनुष्य का, मानव में, से, के लिये ही होना दृढ़ता से स्वीकार रहेगा। प्रत्येक मनुष्य के अध्ययन में शरीर और जीवन का सुस्पष्ट बोध सुलभ होना पाया गया है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन निबद्घ विधि से अध्ययन सुलभ होने के कारण अस्तित्व मूलक मानव का पहचान, मानवीयतापूर्ण पद्घति, प्रणाली, नीति समेत पारंगत होने की विधि रहेगी। इसी विधि से हर आचार्य विद्यार्थियों को शिक्षण-शिक्षा पूर्वक अध्ययन कार्य को सम्पन्न करने में समर्थ रहते हैं। जिसमें उनका कर्तव्य और दायित्व प्रभावशील रहना स्वाभाविक है। क्योंकि हर आचार्य शिक्षा, शिक्षण, अध्ययन का प्रमाण स्वरूप में स्वयं प्रस्तुत रहते हैं इसलिये यह सार्थक होने की संभावना अथवा निश्चित संभावना समीचीन रहता है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:216)
  • अध्ययन संस्थाओं की अभीप्सा, स्वरूप, लक्ष्य, सामान्य क्रिया प्रणाली स्पष्ट हो चुकी है। मानव कुल में समर्पित संतानों को शिक्षा-संस्कार की अनिवार्यता होना पहले से स्पष्ट है। इसे सार्थक और सुलभ बनाने के क्रम में परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था को दस सोपानों में स्पष्ट किया जा चुका है। व्यवस्था की निरंतरता में प्रधान आयाम मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार, पद्घति, प्रणाली, नीति ही है। शिक्षित हर व्यक्ति स्वायत्त होना सहज है। स्वायत्तता ही शिक्षित और संस्कारित व्यक्ति का प्रमाण है। ऐसी स्वायत्तता सर्वमानव स्वीकृत तथ्य है। इसलिये सार्वभौम नाम प्रदान किये हैं। सार्वभौम का तात्पर्य सर्वमानव स्वीकृत है, स्वीकृति योग्य है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार पूर्वक स्वायत्त मानव का स्वीकृति परिवार और व्यवस्था में भागीदारी करने के लक्ष्य से स्वीकृत होता ही है। ऐसे सार्वभौम रूप में स्वीकृत मनुष्य ही मौलिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपने को समाधानित और वातावरण को समाधानित करने में निष्ठान्वित रहना स्वाभाविक है। उसके लिये दायित्व और कर्तव्यशील रहना स्वाभाविक है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर हर परिवार में समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व वर्तमान में प्रमाणित होता है। व्यवस्था, परिवार और समाज सदा ही वर्तमान में, से, के लिये अपने त्व सहित वैभवित होना है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:218-219)
  • शिक्षा-संस्कार सम्पन्न होने के उपरान्त हर व्यक्ति को स्वायत्त और परिवार मानव के रूप में पहचानना स्वाभाविक होता है। परिवार मानव के रूप में ही हर सम्बन्धों का निर्वाह होना, प्रमाणित होना और प्रयोजित होना मूल्यांकित होता है। इसी आधार पर मौलिक अधिकारों को कार्य, व्यवहार, आचरण रूप में प्रमाणित करना ही परिवार मानव सहज सार्थकता है। परिवार मानव संबंधों में, से एक विवाह सम्बन्ध एक पत्नी, एक पति संबंध है। परिवार मानव का कार्य रूप अपने आप में व्यवस्था में जीना ही है। दूसरी भाषा में मानवीयतापूर्ण परिवार में ही व्यवस्था का प्रमाण सदा-सदा के लिये वर्तमानित रहता है। यही जागृत मानव परंपरा का भी साक्ष्य है। परम्परा में प्रधान आयाम परिवार और व्यवस्था का नित्य प्रेरणा स्रोत शिक्षा-संस्कार ही होना पाया जाता है। अतएव स्रोत और प्रमाण के संयुक्त रूप में ही अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र प्रतिपादित होता है। निष्कर्ष यही है परिवार में ही समाज सूत्र और व्यवस्था सूत्र कार्य, व्यवहार, आचरण रूप में प्रमाणित होना ही मानव परंपरा का वैभव है। यही मानवीयता पूर्ण परिवार का तात्पर्य है। इसी में समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व का प्रमाण प्रसवित होता है। इस क्रम में हर परिवार में समाधान और समृद्घि का दायित्व, कर्तव्य, आवश्यकता और प्रयोजन परिवार के सभी सदस्यों में स्वीकृत होना और प्रभावशील रहना ही अथवा प्रमाणित रहना ही परिवार की महिमा और गरिमा है। मानवीयता पूर्ण परिवार का अपने परिभाषा में भी यही तथ्य इंगित होता है जैसा परिवार में भागीदारी निर्वाह करता हुआ हर सदस्य एक दूसरे के संबंधों को पहचानते हैं; मूल्यों का निर्वाह करते हैं और मूल्यांकन करते हैं। फलस्वरूप उभयतृप्ति एक दूसरे के साथ विश्वास के रूप में जानने, मानने, पहचानने और निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होता है। यही परिवार सहज गतिविधि का प्रधान आयाम है। इसी के साथ दूसरा आयाम परिवार में भागीदारी निर्वाह करता हुआ हर सदस्य परिवार गत उत्पादन-कार्य में भागीदारी का निर्वाह करते हैं। फलस्वरूप परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना पाया जाता है। जिससे समृद्घि का स्वरूप सदा-सदा परिवार में बना ही रहता है। इसीलिये परिवार और ग्राम परिवार, परिवार समूह और परिवार के रूप में जीने की कला अपने आप में प्रसवित होती है। समृद्घि समाधान, सम्बन्धों, मूल्य, मूल्यांकन के आधार पर बनी ही रहती है। समाधान और समृद्घि सूत्र परिवार में विश्वास के रूप में प्रमाणित होता ही है। इसी आधार पर विशालता की ओर विश्वास के फैलाव की आवश्यकता निर्मित होता है। यही सह-अस्तित्व के लिये सूत्र है। इस प्रकार से परिवार और व्यवस्था का दूसरे भाषा में परिवार मूलक विधि से व्यवस्था का संप्रेषणा, प्रकाशन सर्वसुलभ हो जाता है। ऐसी सर्वसुलभता मानवीय शिक्षा-संस्कार स्वरूप से ही हो पाता है। यही शुभ, सुंदर, समाधानपूर्ण परिवार विधि है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:230-231)
  • विवाह संबंध को स्वीकारा गया और प्रतिबद्घता पूर्वक अर्थात् संकल्प पूर्वक निर्वाह करने के लिये मानसिक तैयारी सहित घोषणा और सत्यापन कार्यक्रम विवाहोत्सव का स्वरूप है। इसी आशय को गाकर व्यक्त किया जाता है। सम्भाषण, संबोधन और सम्मति व्यक्त करने के रूप में उत्सव सम्पन्न होता है। इसी के साथ-साथ दांपत्य संबंध के साथ-साथ एक परिवार मानव सहज दायित्वों, कर्तव्यों सहित मानव सहज उद्देश्य, जीवन सहज उद्देश्य के लिये अर्हिनिशी समझने, सोचने, करने, कराने के लिये मत देने के लिये संकल्प किया जाता है। विवाहोत्सव में भागीदारी निर्वाह करता हुआ हर व्यक्ति दांपत्य जीवन सफल होने की कामना सहित सम्मतियों को व्यक्त करने के रूप में प्रस्तुत होना सहज होता है। दाम्पत्य संबंध में सत्यापित व्यक्ति से कम अवस्था वाले जो भागीदारी निर्वाह किये रहते हैं वे सब नव दंपतियों के जीने की कला, विचार शैली और अनुभवों से सदा-सदा प्रेरणा पाने के लिये कामना व्यक्त करने के रूप में उत्सव में भागीदारी को निर्वाह करना सहज है। इस प्रकार उत्सव में सम्मिलित सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों की भागीदारी अपने आप स्पष्ट होती है। यही विवाहोत्सव का तात्पर्य है। (अध्याय:6, पृष्ठ नंबर: 231)
  • ...उक्त चारों मौलिक अधिकार सूत्र में इंगित किया गया आशय तथ्य और प्रयोजन एक पाँचवे सूत्र के व्याप्ति में ही स्पष्ट हो चुका है। मौलिक अधिकार का प्रयोग जागृत मानव ही उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशील बना पाता है; अतएव मानव अपने अखण्डता, सार्वभौमता और अक्षुण्णता को बनाये रखने का दायित्व और कर्तव्य मानव में ही मानव में, से, के लिये सन्निहित है। इन सबका अथवा सभी प्रकार की सफलता जीवन जागृति ही है और जागृति पूर्णता ही है। जागृति और जागृति पूर्णता के अनन्तर ही मानव अपने अखण्डता, सार्वभौमता, अक्षुण्णता को सहज ही पहचानता है। फलत: निर्वाह करना स्वाभाविक हो जाता है। मनुष्य में ही जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने का वैभव प्रमाणित होता है। यह जागृति व जागृति पूर्णता का ही द्योतक है। संपूर्ण आयाम, कोण, दिशा परिप्रेक्ष्यों में जानने, मानने का प्रमाणों में दायित्व पहचानने, मानने, निर्वाह करने का वैभव प्रमाणित होता है। यह जागृति पूर्णता का ही द्योतक है। संपूर्ण आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में जानने, मानने का प्रमाणों में दायित्व पहचानने और निर्वाह करने के रूप में कर्तव्य करते हुए स्वयं स्फूर्त होता है। कर्तव्य से समृद्घि, दायित्व से समाधान निष्पन्न एवं प्रमाणित होता है। जानने, मानने के फलन में नियम और न्याय का संतुलन होना पाया जाता है। फलस्वरूप नित्य समाधान होता है। समाधान व्यवस्था का सूत्र है। इसका व्याख्या उक्त सभी मौलिक अधिकारों में व्याख्यायित हुई है। समस्या पूर्वक कोई मौलिक अधिकार वर्तमान होता ही नहीं है। इसी कारणवश हर व्यक्ति को जागृत होने की आवश्यकता बनी है। सभी विधाओं में मानव अपने को संतुलन बनाये रखने का न्याय और नियम में सामरस्यता ही है। फलस्वरूप समाधान, व्यवस्था उसकी अक्षुण्णता स्वाभाविक रूप में प्रमाणित होना सहज है। इसमें हर व्यक्ति अपना भागीदारी करना स्वाभाविक है; चाहत हर व्यक्ति में है ही। इसे सर्व-सुलभ बनाने के लिये मानवीयकृत शिक्षा योजना, जीवन विद्या योजना, परिवार मूलक स्वराज्य योजना सहज विधियों से सर्वमानव जागृत होना सदा-सदा बना रहेगा। इस प्रकार जागृति और जागृति पूर्णता को कार्य-व्यवहार, व्यवस्था के रूप में सतत् बनाये रखना ही अक्षुण्णता का तात्पर्य है। संपूर्ण मानव को मानवत्व के आधार पर समानता का अनुभव करना अखण्डता का तात्पर्य है। हर जागृत मनुष्य हर जागृत मनुष्य के साथ जो कुछ भी मैं समझता हूँ उसे सभी मानव समझा है या समझ सकता है; मैं जो कुछ सोचता हूँ, जो कुछ भी समाधान के रूप में सोचता हूँ ऐसा सर्वमानव सोचता है; समाधान और प्रामाणिकता के पक्ष में मैं जो कुछ भी बोल पाता हूँ और बोलता हूँ इसे सर्वमानव बोल सकता है अथवा बोलता है; जो कुछ भी मैं पाया हूँ उसे सर्वमानव पा सकता है, जो कुछ भी हम करते हैं उसे सर्वमानव कर सकता है। जितना भी हम जीने देकर जिया हूँ हर व्यक्ति जीने देकर जी सकता है; मैं व्यवस्था में जीता हूँ सर्वमानव व्यवस्था में जी सकता है या जियेगा। मैं समाधान सहज निरंतरता में सुखी हूँ। हर व्यक्ति समाधान सहज विधि से सुखी है या सुखी हो सकता है। मैं न्याय और नियमपूर्वक हर कार्य-व्यवहार को निश्चय करता हूँ और क्रियान्वयन करता हूँ वैसे ही हर व्यक्ति निश्चयन करता है और निश्चयन कर सकेगा। मैं प्रमाणिक हूँ हर व्यक्ति इस धरती पर प्रमाणिक होगा और प्रमाणिक हो सकता है। इस विधि से मानसिकता, विचार और समझदारी संपन्न होना है। ऐसा जीना ही मानव का परिभाषा मानवीयतापूर्ण आचरण सार्वभौम व्यवस्था व अखण्ड समाज और समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व का नित्य वैभव है। यही जागृत मानव समाज का स्वरूप कार्य-विचार और नजरिया है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 254-255)
  • दायित्व और कर्तव्य (अध्याय 8)
जागृत मानव सहज रूप में समझदारी के आधार पर ही सम्पूर्ण प्रकार के विचार करता हुआ, विचारों के आधार पर अथवा विचार शैली के आधार पर ही जीने की कला अथवा जीवन शैली ही सम्पूर्ण कार्यकलाप होना पाया जाता है। मूल समझ का स्वरूप अस्तित्व रूपी सह-अस्तित्व ही होना स्पष्ट हो चुका है। ऐसा समझ जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में संचेतना स्वरूप मानव में वर्तमान होना प्रमाणित है। यही मानव सहज जागृति का द्योतक है। प्रत्येक जागृत मानव संचेतनापूर्ण अथवा संचेतनशील रहता ही है। पूर्ण होने का तात्पर्य दिव्य मानव पद में सार्थक और प्रमाणित होता है और मानव तथा देव मानव परिष्कृत संचेतनशील रहता है। भ्रमित मानव अपरिष्कृत संवेदनशील रहता ही है। इसी कारणवश मानव में पाँच कोटियाँ सुस्पष्ट हो चुकी हैं। जागृति पूर्ण मानव पंरपरा मानव संतानों में ही देखने को मिलेगी। युवा-प्रौढ़ व्यक्तियों में भ्रम का सम्भावना ही समाप्त हो जाता हैं। परिष्कृत और परिष्कृतपूर्ण संचेतन सम्पन्न मानव परंपरा में दायित्व और कर्तव्य बोध होना स्वाभाविक है। संचेतना का तात्पर्य पूर्णता के अर्थ में चेतना है। चेतना का तात्पर्य ज्ञान और ज्ञान के स्वरूप में जानने-मानने-पहचानने एवं निर्वाह करने का प्रमाण है।
सम्पूर्ण प्रमाण वर्तमान में ही वैभवित होना देखा गया। संचेतना सहज विधि से जीवन शक्ति और बल को पूरक विधि से देने योग्य स्वरूप स्वयं में दायित्व है। व्यवहार और उत्पादन कार्यों में जीवन शक्तियों और बलों को अर्पित करना ही देने का तात्पर्य है। ऐसा दायित्व, कर्तव्यों के साथ ही अर्थात् व्यवहार, उत्पादन, व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी के साथ ही प्रमाणित होता है। यही कर्तव्य का स्वरूप और महिमा है। ऐसे कर्तव्य और दायित्व हर व्यक्ति में चेतना विकास पूर्वक स्वीकृत हैं। इसलिये जागृति के उपरान्त प्रमाणित होना सहज है। जागृत मानव में दायित्व और कर्तव्य पूरक विधि से सम्पन्न होता ही रहता है। 
मनुष्येत्तर तीनों प्रकृति में भी पूरकता नियम से सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न होता हुआ देखने को मिलता है। इनमें लक्ष्य तीनों अवस्थाओं में तीन स्वरूप में होना देखा गया है। पदार्थावस्था में परिणामानुषंगी सूत्र और व्याख्या है। यही प्राणावस्था में परिणाम सहित पुष्टि धर्म निहित रहना पाया जाता है। जीवावस्था में अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा धर्म विद्यमान होना देखा गया है। इसलिये सम्पूर्ण जीवावस्था जीवनीक्रम सहित परिणाम, पुष्टि सहित जीने की आशा सहज लक्ष्य रूप में होना पाया जाता है। इसलिये जीवावस्था में जीने की आशा, लक्ष्य, सूत्र और व्याख्या प्रमाणित है। मानव में अस्तित्व, पुष्टि, जीने की आशा सहित सुख धर्मीयता स्पष्ट है। इसी के साथ अपरिष्कृत, परिष्कृतपूर्ण संचेतन सहज कार्यकलाप का वर्गीकरण भ्रम व जागृति रूप में करता हुआ मानव अपने-आप में स्पष्ट है। ऐसे मानव में स्वाभाविक रूप में सुख-लक्ष्य, सूत्र-व्याख्या का होना स्वाभाविक रहा है। ऐसी सुख लक्ष्य परिष्कृत संचेतना अथवा परिष्कृत पूर्ण संचेतना सहज विधि से समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व में अनुभव प्रमाण सहित प्रमाणित होना पाया जाता है। मानव अपने आप में सुख धर्मी होने के आधार पर ही मानव संचेतना सहज अर्थात् जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने सहज विधि से समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व में अनुभव प्रमाण रूप में दायित्व और कर्तव्यों का निर्वाह होना सहज है। इसी क्रम में जागृति सहज विधि से ही दायित्व और कर्तव्यों को सम्पन्न करना स्वत्व व स्वतंत्रता का द्योतक है। क्योंकि मानव का मानवीयतापूर्ण आचरण मानव में, से, के लिये स्वतंत्रता का प्रमाण है।
प्रमाण सहित ही हर मानव का सुखी होना सतत समीचीन है। सम्पूर्ण मानव में, से, के लिये प्रामाणिकता और प्रमाण ही सुख का स्रोत, सूत्र और व्याख्या है। जीवन ही जागृति पूर्वक मानव परंपरा में सुख का स्रोत होना पहले से स्पष्ट हो चुकी है। जागृति के पहले जीवन भ्रमित रहता है। भ्रमवश ही मानव जीवन बंधन में होता है। ऐसा बंधन भ्रमित आशा, विचार, इच्छा के रूप में होना सर्वेक्षित है। न्याय, धर्म (सर्वतोमुखी समाधान), सत्य (अस्तित्व में अनुभव) सहज विधि से प्रमाणित पूर्वक ही जागृत होना देखा गया है। जागृति पूर्वक ही हर मनुष्य दायित्व और कर्तव्य को निर्वाह कर पाता है और सुखी होता है। मौलिक अधिकार का प्रयोग अपने-आप में जागृति पूर्वक ही सम्पन्न होता है। हर मानव जागृति के लिये पात्र है। जागृति को परंपरा के रूप में स्थापित करना मानवीय शिक्षा-संस्कार-पूर्वक सहज है। इस विधि से हर मनुष्य जागृत होने का स्रोत जागृत मानव परंपरा ही है। यह स्पष्ट होता है। 
जागृति सहज कार्यक्रम दायित्व और कर्तव्य के आधार पर ही सुयोजित हो पाता है। ऐसे सुयोजन परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में सर्वसुलभ होता है। जागृति पूर्वक जीने की कला ही सुयोजना का साक्ष्य है। परिवार मूलक स्वराज्य-व्यवस्था में व्यवस्थापूर्वक ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होना पाया जाता है। इसी सत्यवश, यही सत्यता मानव परंपरा में सर्वतोमुखी समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व के रूप में प्रमाणित होता है; जिसका अक्षुण्णता सहज होना पाया जाता है। मानव का अभीष्ट सदा-सदा से ही और सदा-सदा के लिये शुभ ही शुभ होना देखा गया है। ऐसा सार्वभौम शुभ अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था रूपी कार्यक्रम ही है। ऐसा कार्यक्रम स्वाभाविक रूप में ही जागृति सहज शिक्षा-संस्कार विधि से स्पष्ट हो जाती है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार अपने-आप में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन, मध्यस्थ दर्शन (सह-अस्तित्ववाद) के रूप में स्पष्ट हो जाती है। यही सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान सम्पन्नता सहित होने वाले अध्ययन, अवधारणा, अनुभव है। सह-अस्तित्व में अनुभव के आधार पर ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का प्रमाण मानव परंपरा में ही प्रमाणित होना समीचीन है। यही जागृति का द्योतक है। मानवीयतापूर्ण परंपरा का प्रमाण मानवीय शिक्षा-संस्कार सुलभता, न्याय-सुरक्षा सुलभता, विनिमय-कोष सुलभता, उत्पादन-कार्य सुलभता और स्वास्थ्य-संयम सुलभता ही है। इन्हीं पाँच आयामों के योगफल में संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था अपने-आप प्रमाणित होता है और अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का स्वरूप और उसकी निरंतरता बना ही रहता है। ऐसे भागीदारी में दायित्व, कर्तव्य का प्रमाण हर मानव में, से, के लिए सहज सुलभ होता है।
दायित्व बोध और उसके अनुरूप कार्य प्रणालियाँ; सम्बन्ध, मूल्य-मूल्यांकन, उभयतृप्ति, संतुलन और उसकी निरंतरता के रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। इसी के साथ तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग, सुरक्षा भी दायित्वों में समाहित रहता ही है। कर्तव्य का स्वरूप आवश्यकता से अधिक उत्पादन, लाभ-हानि मुक्त विनिमय कार्यों में भागीदारी के रूप में सम्पन्न होना देखा गया है। दायित्वों और कर्तव्यों को निर्वाह करने के क्रम में स्वास्थ्य-संयम एक अनिवार्य क्रियाकलाप है जिसको आगे अध्याय में स्पष्ट किया गया है ।इस प्रकार दायित्व बोध के लिये जानना, मानना और कर्तव्य बोध के लिये पहचानना, निर्वाह करना एक अनिवार्य स्थिति है। इस स्थिति में कार्यरत, व्यवहाररत रहना ही जागृत परंपरा सहज महिमा है। परंपरा सहज महिमा ही मानव संतान में, से, के लिये अत्यधिक प्रभावशाली होता है।
मानव परंपरा अपने में बहुआयामी अभिव्यक्ति होना सुदूर विगत से अभी तक और अभी से सुदूर आगत तक होना दिखाई पड़ता है। मानव परंपरा में शिक्षा-संस्कारादि पाँचो आयाम सहित ही स्वस्थ परंपरा होना स्पष्ट हो चुका है। इन्हीं पाँचों आयामों में हर व्यक्ति कार्यरत होना ही बहुआयामी अभिव्यक्ति का तात्पर्य है। इसी क्रम में विभिन्न दृष्टिकोणों, निश्चित दिशाओं और हर देशकाल में प्रमाणित होने योग्य इकाई मानव है अर्थात् सभी आयामों में प्रमाणित होने योग्य इकाई मानव है। ऐसे प्रमाणित होने के क्रम में मौलिक रूप में अधिकार स्वत्व स्वतंत्रता पूर्वक अर्थात् स्वयं स्फूर्त विधि से प्रयोग करना स्वाभाविक रहता ही है। साथ ही जागृति व जागृतिपूर्ण परंपरा में ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होता है।
जागृति ही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सहज परंपरा रूप में मानव संतानों को सुलभ हो जाती है। शिक्षा-स्वरूप में सह-अस्तित्व विधि से प्रयोजन कार्य-विश्लेषण विधि को अपनाना सहज है। सह-अस्तित्व विधि से विज्ञान विधियाँ सकारात्मक होना पाया जाता है। अन्यथा नकारात्मक होती है। सकारात्मक का आधार सह-अस्तित्व और व्यवस्था है। इसी आधार पर होने वाली स्पष्ट अवधारणाएँ निष्ठा का सूत्र होना देखा गया। निष्ठा का तात्पर्य वर्तमान में विश्वासपूर्वक किये जाने वाले क्रियाकलाप हैं। सभी क्रियाकलाप व्यवहार, व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज प्रमाण है। इन्हीं व्यवहार वैभव मानव में स्वत्व स्वतंत्रता अधिकार ही स्वराज्य व्यवस्था कहलाता है। मूलत: स्वराज्य व्यवस्था मानव का समझ प्रक्रिया का संयुक्त वैभव ही है - वह भी जागृति पूर्ण वैभव है। अतएव हम जागृतिपूर्वक मानव लक्ष्य एवं जीवन लक्ष्यों को सफल बनाते हैं। जो दायित्व और कर्तव्य पूर्वक ही सफल होता है। इसलिये न्यायपूर्ण व्यवहार कार्यों में दायित्व और कर्तव्य मूल्यांकित होता है। इसी के साथ जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना सुलभ होता है। इसी विधि से न्याय सुलभता का मार्ग प्रशस्त होता है। न्याय सुलभता सर्व स्वीकृति तथ्य है। न्यायिक विधि से अखण्ड समाज, पाँचों आयामों में स्वराज्य विधि से सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना स्वाभाविक है। हर मानव अपने को जागृतिपूर्वक इन दोनों मुद्दे में अपने उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयता को मूल्यांकित करता है। यही स्वस्थ सामाजिक मानव और व्यक्तित्व का तात्पर्य है। यह हर मानव की आवश्यकता है। इस विधि से सम्पूर्ण दायित्वों, कर्तव्यों को उसके प्रयोजन सहित प्रमाणित करना, मूल्यांकित करना सहज है। (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 262-269)
  • मानव संबंधों को सात प्रकार से नाम सहित प्रयोजनों को इंगित कराया है। संबंध क्रम से पोषण, संरक्षण, अभ्युदय, जागृति, प्रामाणिकता, जिज्ञासा, यतित्व, सतीत्व, विकास-प्रगति, दायित्व-कर्तव्य प्रयोजनों का स्वरूप है। इन प्रयोजनों के अर्थ में हर संबंधों का कार्यकलाप साक्षित होना ही विधि है। दायित्व और कर्तव्य के सम्बन्ध में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी, परिवार और समाज में भागीदारी एक आवश्यकीय स्थिति और गति होना स्पष्ट किया जा चुका है। यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि दायित्व और कर्तव्यों के साथ ही मौलिक अधिकारों का प्रयोग सार्थक होता है। जितने भी प्रयोजन है वह सब मानव कुल में ही प्रमाणित होता है। वह 1. माता - पिता, 2. भाई - बहन, 3. गुरू - शिष्य,       4. मित्र, 5. पति - पत्नी, 6. स्वामी (साथी) - सेवक (सहयोगी), 7. पुत्र - पुत्री। इस प्रकार से 7 संबंध। इसमें से पति-पत्नी संबंधों को छोड़कर बाकी सभी सम्बन्ध पुत्र-पुत्रीवत्, माता-पितावत्, गुरूवत्, शिष्यवत्, मित्रवत्, भाई-बहिनवत्, स्वामी-सेवकवत् के रूप में पहचाना जाना सहज है। इसमें सर्वाधिक अथवा विशाल रूप में होने वाले प्रतिष्ठा को मित्र के रूप में पहचाना जाना स्वाभाविक है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 271)
  • इन सभी सम्बन्धों के साथ सार्थकता अथवा प्रयोजनों की अपेक्षा परस्पर स्वीकृत रहा करता है जैसा - माता-पिता से अपेक्षा जागृति, प्रामाणिकता सहित समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व का होना प्रत्येक संतानों में अपेक्षित-प्रतीक्षित रूप में मिलता है। हर संतान के साथ माता-पिता की अपेक्षा जागृति, प्रामाणिकता सहित समाधान, कर्तव्य और दायित्व सहज निष्ठा का अपेक्षा, प्रतीक्षा, आवश्यकता के रूप में सर्वेक्षित होता है। हर शिष्य अपने गुरू से प्रामाणिकता, समाधान और वात्सल्य की अपेक्षा रखता है। हर विद्यार्थी से गुरू की अपेक्षाएं तीव्र जिज्ञासा, ग्राह्यता सहित अवधारणाओं के रूप में देखना बना ही रहता है। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर:271-272)
  • पति-पत्नी सम्बन्धों में परस्पर व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी परिवार मानव का सम्पूर्ण दायित्व-कर्तव्य, अपेक्षा, प्रतीक्षा बना ही रहता है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 272)
  • स्वामी (साथी)-सेवक (सहयोगी) सम्बन्ध में स्वयं स्वीकृत प्रणाली, स्वयं स्वीकृत विधि से व्यवस्था में भागीदारी निर्वहन के आधार पर घोषणा कार्यप्रणाली है। इस क्रम में भाई सम्बोधन या बहन सम्बोधन समुचित रहता है। इसी की आवश्यकता है। व्यवस्था सम्बन्ध में परिवार सभा से विश्व परिवार सभा तक की समान सम्बोधन होना और कार्यों की समानता भी प्रमाणित होना पाया जाता है। यह स्वाभाविक विधि है हर सभा में एक प्रधान व्यक्ति को निर्वाचित कर लेना, पहचानना, अधिकार सम्पन्न रहना एक आवश्यकता बनी रहती है। यह जनतांत्रिक प्रणाली, पद्घति, नीतियों को प्रमाणित करने का गठन कार्य है। अतएव सभा प्रणाली में भाई-बहन-मित्र सम्बोधन में समानता, दायित्वों, कर्तव्यों का वहन करने में स्वयं स्फूर्त स्वीकृत विधि से सम्पादित होता है। यही जनतांत्रिकता का तात्पर्य है। इसी विधि से विरोध विहीन, विवाद विहीन, सामरस्यता और समाधान पूर्ण अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में कार्यरत रहना पाया जाता है। इसकी आवश्यकता सर्वमानव में होना पाया जाता है। इसकी नित्य समीचीनता जागृति विधि पूर्वक स्पष्ट हुआ है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 272-273)
  • सम्बन्ध का तात्पर्य स्वयं में पूर्णता सहित हर मानव में पूर्णता के अर्थ में अनुबंधित रहना स्वाभाविक है। यह मानव में ही प्रमाणित होने वाला मौलिक अभिव्यक्ति है। यही ज्ञानावस्था का परिचायक है। इसी के साथ मानव को, इसकी अपेक्षा, आवश्यकता नियति सहज विधि से देखने को मिलता है। अर्थात् मानव संबंध के अनुरूप प्रयोजनों को प्रमाणित करने में निष्ठा स्वयं स्फूर्त होता है। अपेक्षाओं के अनुसार सार्थक होना, चरितार्थ होना ही सम्बन्धों का सम्पूर्ण प्रयोजन है। प्रयोजनों का सूत्र अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था, परिवार मानव और स्वायत्त मानव रूप में ही मानव परंपरा में देखने को मिलता है। यही प्रयोजनों का मूल रूप है। इसे ज्ञानावस्था का स्वरूप भी कहा जा सकता है। जागृत मानव परंपरा में यह सार्थकता का स्वरूप शिक्षा-संस्कारपूर्वक परंपरा में स्थापित होता ही रहेगा। जागृत शिक्षा-संस्कार के सम्बन्ध में स्पष्ट किया जा चुका है। जागृतिपूर्ण परंपरा अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व विधि से अनुप्राणित रहने के आधार पर ही जागृत मानव परंपरा का अक्षुण्णता समीचीन रहना पाया जाता है। अतएव सम्पूर्ण सम्बन्ध और उसका सम्बोधन निश्चित प्रयोजन के अर्थ में अपेक्षित रहना ही सम्बोधन का तात्पर्य है। इसमें हर व्यक्ति जागृत रहना यह प्राथमिक दायित्व है। इन्हीं दायित्वों, मौलिक अधिकारों का प्रयोजन सहज ही सफल हो पाता है। फलस्वरूप मानव परंपरा में जीने की कला विधि के रूप में प्रमाणित होता है। विधि का प्रमाण स्वयं सम्बन्ध-मूल्य-मूल्यांकन-उभयतृप्ति, मानव परिभाषा के अनुरूप हर मानव अपने मौलिक अधिकार रूपी स्वतंत्रता का प्रयोग करना, तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा करना और स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार में निष्ठान्वित रहना विधि है। यही सम्पूर्ण उत्सवों का आधार होना पाया जाता है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 274)
  • जन्मदिनोत्सव संस्कार - जन्मदिनोत्सव को सम्पादित करने की उमंग, उमंग का तात्पर्य उत्साह और प्रसन्नता सहित आशय को व्यक्त करने से है। आशय जन्म दिवस का स्मरण बीते हुए वर्षों की गणना से सम्बन्धित रहता है। यह सर्वविदित है। इस क्रम में शैशवावस्था तक जीवन जागृति कामना सहित मानवीयतापूर्ण आचरण सम्पन्न होने, जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान में पारंगत होने के कामनाओं सहित चर्चा, वार्तालाप, कामना गीत के साथ गायन, नृत्य, वाद्य के साथ उत्सव सम्पन्न करने का कार्यक्रम हर शैशवावस्था तक उत्सव में भाग लेने वाले हर व्यक्ति से हर व्यक्ति को सम्मान व्यक्त करता हुआ शिशु और आशय आकांक्षा सहित आशीषों को प्रस्तुत करने वाले हर व्यक्ति उत्सव में भागीदारी के रूप में देखने को मिलता है। ऐसे उत्सव मानव सहज जागृति परंपरा का ही पुनर्उद्गार ही रहता है। ऐसी जन्मदिनोत्सव को जैसा ही शैशवावस्था से कौमार्य अवस्था आता है अथवा जिस जन्मदिनोत्सव तक अपने मूल्यांकन करने में सक्षम हो जाते हैं, जिसको अभिभावक भले प्रकार से मूल्यांकन कर सकते हैं। इसी जन्मदिवस से हर मानव संतान से अपना मूल्यांकन  कराने और सत्यापित करने की विधि अपनाना आवश्यक रहता ही है। ऐसा सत्यापन सहज अभिव्यक्ति की पुष्टि में उत्साह और प्रसन्नता को व्यक्त करने का समारोह बंधु-बांधव और अभिभावक मित्रों के साथ-साथ अनुभव करना बनता है। ऐसी सम्पूर्ण अनुभूति का आधार का मापदण्ड जीवन जागृति, मानवीयतापूर्ण आचरण शैशवावस्था  से किया गया आज्ञापालन, सहयोगवादी कार्यकलाप, अनुसरण किया गया कार्यकलाप अर्थात् अभिभावक एवं आचार्यों के साथ किया गया अनुसरण क्रियाकलाप और उसके प्रयोजनों के साथ उन-उनके सभी अभिमत किशोरावस्था से ही व्यक्त होना स्वाभाविक रहता ही है। स्वयं स्फूर्त आशा, आकांक्षा के संदर्भ में भी प्रोत्साहनपूर्वक संप्रेषित करने का अवसर प्रदान करना उत्सव समारोह का एक कर्तव्य के रूप में होना पाया जाता है। मुख्य रूप में जिनका जन्मदिनोत्सव मनाया जाता है उनका उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजन सम्बन्धी मूल्यांकन पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान आकर्षित करने का कार्यक्रम जन्मदिनोत्सव का प्रधान उद्देश्य और कार्यक्रम है। इस प्रकार जन्मदिनोत्सव के सम्पूर्ण अवयव स्पष्ट हो जाता हैं। इसी के साथ यह भी परस्पर प्रेरणा का आधार होता है कि जन्मदिनोत्सव जिनका मनाया जाता है उस समय उनका साथी, मित्र, भाई सब अपने-अपने सत्यापन विधि को अपनाना मानव परंपरा के लिये आवश्यकीय मौलिक प्रयोजन सिद्घ होना सहज है। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर:280-281)
  • जिस समय में शिक्षा-संस्कार सम्पन्न हो जाते हैं उस समय में जागृति का प्रमाण सभा, उत्सव सभा के बीच हर पारंगत नर-नारी अपने को स्वायत्त मानव के रूप में सत्यापित करने, परिवार मानव के रूप में कर्तव्य और दायित्वशील होने और अखण्ड समाज-सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने में अपने निष्ठा को सत्यापित करने के रूप में उत्सव समारोह को सम्पन्न किया रहना मानव परंपरा में एक आवश्यकता है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 285)
  • ...इसके उपरान्त विवाहोत्सव के मार्गदर्शक व्यक्ति के अनुसार सुखासन पर बैठे हुए वधु-वर दोनों पारी-पारी से बैठे हुए स्वयं को स्वायत्त मानव के रूप में होने का सत्यापन करेंगे और परिवार मानव के रूप में जीने के संकल्प को दृढ़ता से घोषित करेंगे। इसके उपरान्त
1. दोनों अपने-अपने माता-पिता का नाम सहित व्यवस्था मानव के रूप में जीने का संकल्प लेगें।
2. परिवार मानव के रूप में जीने का संकल्प करेंगे।
3. दोनों बारी-बारी से कायिक-वाचिक-मानसिक, कृत कारित, अनुमोदित सभी कार्य-व्यवहार विचारों में एक दूसरे के पूरक होने का संकल्प करेंगे।
4. परिवार तथा अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी का दायित्व कर्तव्यों को निर्वाह करने का संकल्प करेंगे।
5. तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग-सुरक्षा करने का संकल्प करेंगे।
6. सम्बन्ध-मूल्य-मूल्यांकन-उभयतृप्ति को प्रमाणित करने का संकल्प करेंगे।
7. मानवीयतापूर्ण आचरण में पूर्ण निष्ठा बरतने का संकल्प करेंगे। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 291-292)
  • ग्राम-मुहल्ला सभा से मनोनीत-अनुशासित पाँच समितियों का कार्यरत रहना स्वराज्य व्यवस्था का वैभव है। इन वैभव के सफलताओं को देखने सुनने के लिये पूरे ग्राम मुहल्लावासी को उत्सुक रहना आवश्यक है। ग्राम सभा से निश्चित नियंत्रित विधि से एक-एक समिति का मूल्यांकन कार्यक्रम का तौर-तरीका जो अपनाये गये थे उसके आधार पर सफलता का समारोह सम्पन्न करना आवश्यक रहता ही है। इसका समयावधि ग्राम सभा के समयानुसार सम्पन्न होना व्यवहारिक है। इसी के अनुसार न्याय-सुरक्षा समिति के सफलताओं को समीक्षा कर पूरा ग्रामवासियों को अवगाहन कराने का कार्य सम्पन्न किये जाने के रूप में देखने को मिलता है। इससे सम्पूर्ण ग्रामवासी न्याय-सुरक्षा सुलभ होने में विश्वस्त एवं आश्वस्त होने का अवसर समारोह समय में स्वाभाविक रूप में देखने को मिलता है। इसी उमंग के साथ भविष्य के प्रति भरोसा करना स्वाभाविक होता है। वर्तमान तक की सफलता भविष्य के प्रति आश्वस्तता का हर संगम स्थिति, गति, उत्साह और प्रसन्नता के स्वरूप में ही प्रमाणित होना देखा गया है। इसी प्रकार उत्पादन-कार्य समिति, विनिमय-कोष समिति, स्वास्थ्य-संयम कार्य समिति, मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार समितियों का वर्तमान तक के सफलता, भविष्य में आश्वस्त होने का सफल योजना के अवगाहन तक का समारोह प्रसन्नता में अभिभूत होना, स्वाभाविक है। ऐसी अभिभूति के साथ ही हर्ष ध्वनि सफलता का कीर्ति गायन, भविष्य में सफलता का आकांक्षा, सम्भावना सहित कर्तव्यों और दायित्वों की स्वीकृति और उसका उद्गार सहित हर्ष ध्वनि गीत-संगीत का वातावरण बनाया जाना समारोह-वैभव का प्रतिष्ठा रहेगा। अस्तु, ग्राम सभा बनाम पाँचों समितियों सहित सफलता का आंकलन अग्रिम योजनाओं का प्रकाशन समारोह का सारतत्व रहेगा। यही व्यवस्था मूलक समारोहों की महिमा है। इसी प्रकार हर स्तरीय समितियों में समारोह कार्य सम्पन्न होना स्वाभाविक रहेगा। यह विश्व परिवार पर्यन्त व्यवहारान्वयन होना देखने को मिलता है। सम्पूर्ण मानव इस धरती मे समारोह और उत्साहपूर्वक संतुष्ट होते हैं । इसकी नित्य समीचीनता जागृति परंपरा पर्यन्त बनी ही रहेगी। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर: 295-296)
  • समाज शास्त्र में प्रधानत: मूल्यांकन समाज और व्यवस्था का ही होना पाया जाता है। समाज गति मूलत: नियम और न्याय के समान में होना देखा गया है। इसका संतुलन रूप व्यवस्था के रूप में अपने-आप प्रमाणित होना देखा गया है। क्योंकि नियम और न्याय के तृप्ति बिन्दु में ही समाधान का होना पाया जाता है। नियम और न्यायपूर्वक ही कर्तव्य और दायित्व होता है। यह व्यवस्था कार्य में और व्यवहार कार्य में वर्तमान होना आवश्यक देखा गया है। (अध्याय: 10, पृष्ठ नंबर: 297)
  • मनुष्य का सम्पूर्ण वर्चस्व स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में मूल्यांकित हो जाता है। जो मानवीयतापूर्ण आचरण का ही प्रमाण है। दूसरा समझे हुए को समझाने की विधि में अर्थात् जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन को विवेक, विज्ञान, व्यवहार सूत्रों सहित समझाने की विधि से, समझा हुआ प्रमाणित होता है। इस प्रकार हर विद्यार्थी अपने में समझा हुआ को समझाकर प्रमाणित होने की व्यवस्था मानवीय शिक्षा-संस्कारों में सर्वसुलभ होता है। एक विद्यार्थी दूसरे को समझाने के उपरान्त समझाया हुआ को स्वयं ही मूल्यांकित करेगा। फलस्वरूप सभी विद्यार्थियों में पारंगत विधि होना स्पष्ट हो पाता है। तीसरे में किया हुआ को कराने की विधि से भी हर विद्यार्थी प्रमाणित होना उसका मूल्यांकन स्वयं करना मानवीय शिक्षा संस्थान में सहज रूप में रहता ही है। इसका मूलभूत स्वायत्त मानव परिवार मानव के रूप में कार्य-व्यवहार करता हुआ शिक्षक, आचार्य, विद्वान ही शिक्षा सहज वस्तु प्रक्रिया, प्रणाली, पद्घति, नीति का धारक-वाहक होना पाया जाता है। इसकी अक्षुण्णता बना ही रहता है। इस प्रकार शिक्षा का धारक-वाहक रूपी आचार्यों से शिक्षित होने के उपरान्त हर विद्यार्थी अपना मूल्यांकन करने की स्थिति में उभयतृप्ति का होना देखा जाता है। यथा-विद्यार्थी और आचार्यों के परस्परता में यह स्पष्ट हो जाता है। इस मूल्यांकन प्रणाली में दायित्व और कर्तव्य बोध सुदूर आगत तक स्वीकृत होना स्वाभाविक होता है। यही संस्कार का मौलिक स्वरूप है। इसी सार्वभौम आधार पर हर शिक्षित व्यक्ति मौलिक अधिकारों को स्वतंत्रतापूर्वक प्रयोग करने में सफल हो जाता है। (अध्याय: 10, पृष्ठ नंबर:300-301)
  • न्याय-सुरक्षा का मूल्यांकन - मूल्यों का मूल्यांकन क्रम में न्याय-सुरक्षा स्वाभाविक रूप में सार्थक होना पाया जाता है। सम्बन्धों का पहचान के साथ ही मूल्यों का निर्वाह करना स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह जागृत मानव का सार्वभौम प्रमाण है। मूल्यों का निर्वाह क्रम में अर्पण, समर्पण, पोषण, संरक्षण सहज रूप में ही प्रमाणित हो पाता है। जागृत का ही जागृतिशील इकाई को पहचानना-निर्वाह करना एक दायित्व है। इसी दायित्व के आधार पर जिनके साथ सम्बन्धों का निर्वाह होता है। ऊपर कहे चार सूत्रों में से कोई न कोई सूत्र सह-अस्तित्व सहज वर्तमान रहता ही है। इसलिये परस्पर सुरक्षा समीचीन रहता है और प्रमाणित रहता है। सुरक्षा का तात्पर्य यही हुआ अर्पण, समर्पण, पोषण, संरक्षण। यह चारों सूत्र विधि से प्रमाण, समाधान, समृद्घि सम्पन्न परिवार मानव से ही प्रावधानित होना पाया जाता है। अर्पण, समर्पण तब तक भावी रहता है जब तक संतान अपने स्वायत्तता और परिवार मानव प्रतिष्ठा को प्रमाणित नहीं करता है। अर्पण-समर्पण का दूसरा स्थिति कोई दूसरा रोगी हो जाए उसके साथ अर्पण, समर्पण होने का सूत्र क्रियाशील होना पाया जाता है। तीसरा स्थिति यही है किसी देश में प्राकृतिक प्रकोप जैसे-चक्रवात, भूकंप, तूफान, ज्वालामुखी, उल्कापात, शिलापात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, से पीड़ित लोगों के साथ अर्पण-समर्पण का सूत्र क्रियाशील होना पाया जाता है। ऐसे अर्पण-समर्पण से किसी का पोषण और संरक्षण प्रमाणित होता है यही सुरक्षा का तात्पर्य है। इस प्रकार पोषण शरीर पक्ष को, संरक्षण मानसिकता विचार पक्ष को विश्वस्त कर देता है। यही परस्परता में समाधान, समृद्घि, सम्पन्न मानव परंपरा में होने वाली सुरक्षा कार्य विधि अपने-आप स्पष्ट है। (अध्याय: 10, पृष्ठ नंबर: 301)
  • यह तथ्य पहले स्पष्ट हो चुका है कि स्वायत्त मानव शिक्षा-संस्कार पूर्वक विधिवत् दीक्षित होना, सर्वसुलभ होना यह जागृत मानव परंपरा का देन के रूप में विदित हो चुकी है। यही प्रधान रूप में शिक्षा-संस्कार पूर्वक सार्वभौमता को प्रमाणित करता है। यही स्वायत्तता को प्रमाणित करता है। इसी के साथ-साथ यह भी सर्वेक्षित तथ्य है कि हर मानव संतान में स्वायत्तता की आवश्यकता शैशव अवस्था से ही प्रकाशित रहता है क्योंकि हर मानव संतान न्याय का अपेक्षा रखता ही है, सही कार्य-व्यवहार करना चाहता ही है और सत्यवक्ता होने में निष्ठा प्रदर्शित करता ही है। यही बुनियादी अभीप्सा का द्योतक है। बुनियादी अभीप्सा की तुष्टि बिन्दु जागृति, प्रामाणिकता के रूप में सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य बोध सहित प्रमाणित होना देखा गया है। सार्वभौमता (अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था) में भागीदारी से ही सही कार्य-व्यवहार करने का प्रमाण होना देखा गया है। समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सुलभता के रूप में न्याय सुलभता के वैभव को देखा गया है। इस प्रकार शैशव अवस्था से ही जीवन सहज अभीप्सा प्रकाशित होता ही है। इसके लिये आवश्यकीय स्रोत, प्रक्रिया, प्रणाली और नीति मानव परंपरा में सुलभ होने के आधार पर ही हर मानव संतान का अभीप्सा सफलीभूत होना सहज और समीचीन है। इस प्रकार स्वायत्त मानव, परिवार मानव अपने परिभाषा में ही सार्वभौमता में भागीदारी का स्वरूप ही है। अतएव  ऐसी भागीदारी दायित्व और कर्तव्य में परिगणित होने के कारण हर व्यक्ति भागीदार होने का अर्हता को बनाये रखता है। ऐसी भागीदारी का स्वयं स्फूर्त होना ही जागृति की महिमा है। इस प्रकार विनिमय कोष कार्य में भागीदारी के फलस्वरूप समाधान और उसकी निरंतरता का प्रमाण होना स्वाभाविक है। यही व्यवस्था में भागीदार होने का अथवा समग्र व्यवस्था में भागीदार होने का फल है अथवा वैभव है। इस विधि से भी विनिमय कोष आवर्तनशील विधि के साथ अपने को सफल बनाना सहज सिद्ध होता है। (अध्याय:10 , पृष्ठ नंबर: 311-313)


स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी

दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : आवर्तनशील अर्थशास्त्र

आवर्तनशील अर्थशास्त्र (संस्करण:2009)
  • ...उक्त विधि से सह-अस्तित्व सहज रूप में ही नित्य प्रभावी होना पाया जाता है फलस्वरूप सार्वभौम शुभ परस्पर पूरक होना सहज है। समाधान का प्रमाण मानव के सर्वतोमुखी शुभ की अभिव्यक्ति में, संप्रेषणा में और प्रकाशन में सम्पन्न होने वाली फलन है। सर्वाधिक रूप में यही अभी तक देखने में मिला है कि मानव ही मानव के लिए समस्या का प्रधान कारण है। व्यक्तिवादी समुदायवादी विधि से प्रत्येक मानव समस्याओं को पालता है, पोषता है और वितरण किया करता है। परिवार मानव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति समाधान को पालता है पोषता है और वितरित करता है, क्योंकि जो जिसके पास रहता है वह उसी को बंटन करता है। स्वायत्त मानव ही परिवार मानव के रूप में प्रमाणित हो पाता है। स्वायत्त मानव का तात्पर्य स्वयं स्फूर्त विधि से व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी, होने की अर्हता से है। यह प्रत्येक व्यक्ति में सह-अस्तित्व दर्शनज्ञान जीवन ज्ञान जैसी परम ज्ञान, अस्तित्व-दर्शन जैसी परम-दर्शन और मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी परम आचरण अध्ययन और संस्कार विधि से स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक और व्यवसाय में स्वालंबन के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है, पाया गया है। इसी विधि से परिवार मानव का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इसे अध्ययन विधि से लोकव्यापीकरण करना मानवीयतापूर्ण परंपरा का कर्तव्य और दायित्व है। इसी क्रम में आवर्तनशील अर्थव्यवस्था अवश्यंभावी है। (अध्याय: 2, पृष्ठ नंबर: 29-30)
  • मानवीय शिक्षा-संस्कार से स्वायत्त मानव, स्वायत्त मानवों से स्वायत्त परिवार, स्वायत्त परिवार व्यवस्था से स्वायत्त ग्राम परिवार व्यवस्था, ग्राम समूह परिवार व्यवस्था क्रम में विश्व परिवार व्यवस्था को पाना सहज है। मानवीयतापूर्ण शिक्षा की संपूर्णता अपने आप में जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है। अपने आप का तात्पर्य मानव अपना ही निरीक्षण-परीक्षणपूर्वक ज्ञान सम्पन्न, दर्शन सम्पन्न, आचरण सम्पन्न होने से है। दूसरी विधि से अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में परमाणु में विकास, गठनपूर्णता, जीवनी क्रम, जीवन का कार्यकलाप, जीवन जागृति क्रम, जीवन जागृति, क्रियापूर्णता उसकी निरंतरता और प्रामाणिकता (जागृति पूर्णता) उसकी निरंतरता दृष्टापद से है। इस प्रकार मानवीय शिक्षा का तथ्य अथ से इति तक समझ में आता है। इसी समझदारी के आधार पर हर मानव अपने में परीक्षण, निरीक्षण करने में समर्थ होता है। फलस्वरूप स्वायत्त परिवार व्यवस्था से विश्व परिवार व्यवस्था तक हम अच्छी तरह से सार्वभौमता, अक्षुण्णता को अनुभव कर सकते हैं। इस विधि से सेवा, व्यवस्था के अंगभूत कर्तव्य के रूप में, व्यवस्था दायित्व के रूप में, उत्पादन आवश्यकता, उपयोगिता, सदुपयोगिता के रूप में, परिवार व्यवहार सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन अर्पण, समर्पण और उभयतृप्ति के रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। यह अधिकांश मानव में अपेक्षा भी है। इसी विधि से धरती की संपदा संतुलन विधि से सदुपयोग होना स्वाभाविक है, अर्थ का सदुपयोग होना ही आवर्तनशीलता है। (अध्याय:5 , पृष्ठ नंबर:190-191)
  • व्यवस्था क्रम में ही परिवार और समाज अपने अखण्डता को पूर्ण विश्वास, सह-अस्तित्व, समृद्घि, समाधान सहित प्रमाणित कर पाता है। उपर कहे हुए सम्पूर्ण सभाओं के स्वरूप और विस्तार के आधार पर कर्तव्य और दायित्व, परिवार व्यवहार परंपराएँ मानवीयतापूर्ण विधि से निर्वाह होना स्वाभाविक है। निर्धारित होना, स्वीकृत होना जागृति के आधार पर होता है। जागृति का स्रोत जागृत मानव परंपरा ही होना निश्चित है। इसी से अर्थात् इस जागृत परंपरा विधि से ही संग्रह, द्वेष, भोग-लिप्सा, शोषण, घूसखोरी, बिचौलियापन, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्घि सभी विधाओं से आंकलित असमानताएँ सर्वथा दूर होकर मानवत्व के आधार पर हर मानव के साथ सम्पूर्ण मानव का समानता, स्वायत्त परिवार के आधार पर समाधान, समृद्घि सहज तृप्ति में समानता, विश्व मानव परिवार में भागीदारी के आधार पर सह-अस्तित्व और वर्तमान में विश्वास, सार्थक हो जा जाता है। फलत: ग्राम और क्षेत्रादि धरती, उससे होने वाली सम्पूर्ण साधन स्रोतों का निर्धारण के आधार पर कितने संख्या में जीने योग्य ग्राम और क्षेत्र हैं अथवा समृद्घि पूर्वक जीने योग्य ग्राम और क्षेत्र हैं, यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है। इसी के साथ-साथ जन बल पर और तकनीकी बल पर आधारित युद्घ विचार का उन्मूलन होगा, अभयता पूर्ण अर्थात् वर्तमान में विश्वासपूर्ण विधि से सर्वमानव जीने देने और जीने की विधि समीचीन है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर:191-192)
  • उपयोगिता सहज प्रवृत्ति, कार्य और प्रयोजन ऊपर कहे  हुए तथ्यों के आधार पर स्पष्ट हो चुकी है और उक्त विश्लेषणों से और तथ्यों को निर्देशित करने के प्रयासों से यह भी स्पष्ट हुई है कि मानव में, से, के लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन है। मानव का सार्थक स्वरूप समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व एवं उसकी निरंतर गति ही है। मानव परंपरा का नित्य गरिमा और महिमा स्वरूप अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था ही है। इन्हीं में भागीदारी प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए दायित्व और कर्तव्य रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही प्रत्येक मानव वर्तमान में विश्वासपूर्वक जीने की कला है। अतएव यही निष्कर्ष सुस्पष्ट है स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के क्रम में ही अर्थशास्त्र का चिन्तन होना, अध्ययन होना और जिसका लोकव्यापीकरण होना मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा के लिए अनिवार्य स्थिति है। मानव से सम्पादित होने वाली अर्थात अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन के रूप में व्यक्त होने वाले संपूर्ण व्यवहार कार्यकलाप, जीने की कला है। ऐसे जीने की कला में उपयोगिताएं आवश्यकता के आधार पर प्रसवित  होता है। प्रसवित होने का तात्पर्य स्वयं से, स्वयं में, स्वयं के लिए स्फूर्त होने की क्रिया से है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर:193-194)
  • उत्पादन-कार्य सम्बन्धी परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है मानव अपने कर्ता पद को प्रयोग करने में समर्थ है। सम्पूर्ण कार्य कर्ता पद प्रतिष्ठा सहज वैभव है। प्राकृतिक ऐश्वर्य पर ही श्रम नियोजन पूर्वक उत्पादन का अर्थ सार्थक होना पाया जाता है। इसके साथ मानव के कर्ता पद की महिमा और उसका संयोग ही है कि प्रत्येक मानव में कर्तव्य (करने का प्रमाण) नित्य प्रभावी है अर्थात् नित्य प्रकाशमान है और वर्तमान है। (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 243)
  • विनिमय कार्य विधि की यह सही बेला है। मानव ने पहले भी एक बार विनिमय का प्रयास किया। उस प्रयास में उत्पादन कार्य के मूल्यांकन का आधार श्रम मूल्य नहीं रहा। उसके विपरीत लाभ मानसिकता उस समय में भी व्यापारी में बना रहा। लाभ मानसिकताएँ शोषण मूलक होते ही हैं। इसमें संग्रह-सुविधा का पुट रहता ही है। यह आज भी स्पष्टतया दिखाई पड़ता है। इस आधार पर मानव अपने व्यवस्था का अंगभूत अथवा  समग्र व्यवस्था के अंगभूत रूप में अर्थ और आर्थिक गति को पहचानने की स्थिति में यह पता लगता है कि अस्तित्व में सम्पूर्ण विकास सहज सीढ़ियाँ आवर्तनशीलता और पूरकता विधि सम्पन्न है। सह-अस्तित्व में निरंतर पूरकता और विकास ही समाधान के रूप में स्पष्ट है। इसी क्रम में मानव अपने दृष्टा पद प्रतिष्ठा को पहचानने के उपरांत ही स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने की आवश्यकता को अनुभव किया और जागृतिमूलक विधि से ही परिवार मूलक स्वराज्य मानव सहज पद होना मानव का अभिलाषित, आकांक्षित और आवश्यकता के रूप में पहचाना गया। सर्वशुभ सर्वसुलभ होने के लिए आवर्तनशील अर्थव्यवस्था की समग्र व्यवस्था के अंगभूत कार्यक्रम होना देखा गया है। इसी विधि से पहला आर्थिक असमानताएँ समाप्त होते हैं और समृद्घि के आधार पर हर समझदार परिवार में प्रमाण सुलभ होना सहज है। दूसरा, प्रतीक मूल्य से छूटकर प्राप्त मूल्यों से तृप्त होने का सूत्र सहज रूप में रहा है उसमें जागृति प्रमाणित होती है। तीसरा, संग्रह का भूत संघर्ष के साथ शोषण के साथ जुड़ा ही रहता है, यह सर्वथा दूर होकर परिवार मानव के रूप में हर व्यक्ति अपने दायित्व, कर्तव्यों का निर्वाह करने का उत्सव सम्पन्न होने का अवसर सर्वदा समीचीन रहता ही है। चौथा, परिवार मानव विधि से ही स्वराज्य व्यवस्था उसके अंगभूत आवर्तनशील अर्थव्यवस्था गतिशील होने के क्रम में ही विश्व परिवार और व्यवस्था के साथ सूत्रित होने का कार्यक्रम मानव जागृति सहज वैभव के रूप में होना समझा गया। और यह इस तथ्य का द्योतक है समुदायों के सीमाओं में स्वीकृत प्रत्येक मानव दिशाविहीनता, लक्ष्यविहीनता फलत: सार्वभौम कर्तव्य विमूढ़ता से ग्रसित हो गया है। इस पीड़ा से छूटने का सर्वसुलभ कार्यक्रम और मार्ग प्रशस्त होना समीचीन है। (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर:250-251)
  • विकास (जागृति) के लिए किये गये व्यवहार को पुरूषार्थ, निर्वाह के लिए किये गये प्रयास को कर्तव्य तथा भोग के लिए किये गये व्यवहार को विवशता के नाम से जाना गया है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर:254)
  • भोगरुपी आवश्यकताओं की पूर्ति इसलिए संभव नहीं है कि वह अनिश्चित एवं असीमित है। कर्तव्य की पूर्ति इसलिए संभव है कि वह निश्चित व सीमित है। यही कारण है कि कर्तव्यवादी प्रगति शांति की ओर तथा भोगवादी प्रवृत्ति अशांति की ओर उन्मुख है। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर: 254)
  • कार्य शैली:- प्रत्येक ग्राम सभा, ‘‘ग्राम स्वराज्य व्यवस्था’’ को स्थापित करने के लिए निम्न 5 समितियों का गठन करेगी :-
1. मानवीय शिक्षा-संस्कार समिति
2. उत्पादन-कार्य व सलाहकार समिति
3. लाभ-हानि मुक्त सहकारी विनिमय-कोष समिति
4. स्वास्थ्य-संयम समिति
5. मानवीय न्याय-सुरक्षा समिति
उपर्युक्त समितियाँ ग्राम सभा के मार्गदर्शन के आधार पर कार्य करेंगी। उपरोक्त समितियाँ क्रम से ग्राम में शिक्षा-संस्कार व्यवस्था, उत्पादन-कार्य व्यवस्था, विनिमय-कोष व्यवस्था, स्वास्थ्य-संयम व्यवस्था व न्याय सुरक्षा व्यवस्था को स्थापित करेंगी। उपरोक्त समिति के सदस्यों का मनोनयन ग्राम सभा करेगी। प्रत्येक मनोनीत सदस्य इन समितियों का अंशकालिक सदस्य होगा व वह अपनी समिति का कर्तव्य एवं दायित्वों का निर्वाह अपने निजी  व्यवसाय के अलावा करेगा।...(अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 262)
  • कर्तव्य व दायित्व :-
1. ग्राम सभा पूर्ण रूप से ग्रामवासियों के प्रति उत्तरदायी होगी। साथ ही वह ‘‘ग्राम समूह सभा’’ के प्रेरणा व उनके द्वारा दिए गए सुझावों पर निर्णय लेगी।
2. सर्वेक्षण, आंकलन व अध्ययन के आधार पर प्रत्येक परिवार के लिए समयबद्घ स्वराज्य कार्य योजना बनाएगी व क्रियान्वयन के लिए विभिन्न समितियों को आवश्यक निर्देश देगी।
3. ग्राम की पाँचो समितियों के साथ उनके अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करने में पूर्ण सहयोग देगी व उनके लिए जो भी सुविधायें, तकनीकी ज्ञान आदि की आवश्यकता होगी उसे उपलब्ध करायेगी।
4. ‘‘विनिमय कोष’’ व सरकारी बैंक के बीच संयोजन (एजेन्सी) का कार्य करेगी।
5. पाँचों समितियों के कार्यों का समय-समय पर मूल्यांकन करेगी व उन्हें आवश्यक निर्देश देगी।
6. सर्वेक्षण, आंकलन, अध्ययन व प्राथमिकताओं के आधार पर ग्राम में सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था करेगी। इस दिशा में यदि किसी समिति व अन्य संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता हुई तो उसे प्राप्त करेगी।
7. निम्न सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था ग्रामसभा द्वारा की जायेगी –
1. प्रत्येक परिवार के लिए आवास का प्रावधान। इसके लिए स्थानीय व्यक्तियों व वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग किया जावेगा।
2. शोधन विधि द्वारा शुद्घ व पवित्र पीने के पानी की व्यवस्था।
3. पेयजल व मल जल की व्यवस्था करना।
4. कृषि के साथ पशु पालन आवश्यक होने के कारण ‘‘गोबर गैस प्लांट’’ द्वारा, गोबर गैस गाँव में सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध कराना। प्राकृतिक गैस उपलब्ध होने की स्थिति में, उसका सर्वाधिक उपयोग करने की, प्रणाली को विकसित करना।
5. गोबर खाद व कम्पोस्ट खाद के लिए व्यापक व्यवस्था करना।
6. सौर-ऊर्जा का सर्वाधिक प्रयोग करने की प्रणाली विकसित करना ताकि उसका उपयोग, पानी पंप करने, खाना पकाने, वाष्पीकरण, अनाज सुखाने, ठंडा या गर्म करने में किया जा सके, जिससे लकड़ी, कोयला आदि परंपरागत ईंधनों को जलाने से रोका जा सके। इसी संदर्भ में पवन चक्की व जल प्रवाह शक्ति की उपयोगिता की संभावना का पता लगाना व यदि संभव हुआ तो क्रियान्वयन करना।
7. प्रत्येक घर के साथ शौचालय व सामूहिक शौचालय की व्यवस्था करना।
8. सड़क मार्ग, रेल, यातायात-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना व निकट की मंडियों व बाजारों की सड़कों से जोड़ना।
9. दूरभाष व दूरसंचार सेवा, डाक घर, बैंक आदि की व्यवस्था करना।
10. ग्राम के लिए पाठशाला, चिकित्सा केन्द्र, विनिमय-कोष के लिए भवन, गोदाम, बहुद्देश्यीय भवन की व्यवस्था करना जो न्याय सभा, संबोधन सभा, सांस्कृतिक-सभा, विवाह व मिलन-सभा, प्रार्थना सभा, स्वागत सभा व छाया के अंदर खेलने के लिए उपयोगी रहेगा।
परिवार समूह व परिवार प्रतिनिधि के कर्तव्य एवं दायित्व :-1. परिवार प्रतिनिधि, सदस्यों के साथ व्यवहार, आचरण, स्वास्थ्य, उत्पादन व उत्पादन संबंधी साधनों के संदर्भ में स्वयं प्रमाणिक रहते हुए, उनके अनुरूप सभी सदस्यों को होने के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने रहेंगे।
2. परिवार प्रतिनिधि, परिवार के अन्य सदस्यों का मूल्यांकन करेंगे। परिवार प्रतिनिधि का मूल्यांकन, परिवार समूह सभा करेगा। आचरण के लिए मूल्यांकन का आधार स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष व दया पूर्ण कार्य रहेगा।
व्यवहार के मूल्यांकन का आधार मानव व नैसर्गिक संबंधों व उनमें निहित मूल्यों की पहचान व निर्वाह से है। साथ ही तन,मन, धन रूपी अर्थ के सदुपयोग, सुरक्षा के आधार पर नैतिकता का मूल्यांकन किया जायेगा।
3. परिवार में किसी से गलती होने की स्थिति में सुधारने का कर्तव्य, परिवार के सभी सदस्यों का होगा। इसमें परिवार प्रतिनिधि उभय पक्षीय प्रेरक का कार्य करेगा।
4. परिवार सम्बन्धी समस्त जानकारी, जिसके आधार पर परिवार के सदस्यों को शिक्षा-संस्कार, उत्पादन कार्य आदि में लगाना है, के लिए सभी तथ्यों को एकत्रित कर, ग्राम सभा को उपलब्ध कराने का कर्तव्य, परिवार प्रतिनिधि का होगा। परिवार में यदि कोई व्यक्ति, किसी विशेष योग्यता, हस्तकला, हस्त-शिल्प, कृषि व अन्य तकनीकी या साहित्य कला में माहिर है तो यह जानकारी भी, ग्राम की सम्बन्धित समिति को उपलब्ध कराएगा।
5. परस्पर परिवारों के विवादों व उत्पन्न कठिनाइयों के निवारण का दायित्व उन परिवार के प्रतिनिधि व परिवार समूह सभा का होगा। परिवार समूह सभा द्वारा विवाद हल न होने की स्थिति में ही विवाद ‘‘न्याय सुरक्षा-समिति’’ के पास जायेगा। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर: 264-268)
  •  गाँव से सभी प्रकार की कर वसूली का दायित्व विनिमय कोष का होगा। कर निर्धारण का कार्य ग्राम सभा करेगी। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 282)
  • स्वास्थ्य-संयम व्यवस्था - ग्राम के सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं संयम की जिम्मेदारी, ग्राम स्वास्थ्य-संयम समिति की होगी। यह समिति शिक्षा-संस्कार समिति के साथ मिलकर कार्य करेगी। स्वास्थ्य-संयम संबंधी पाठ्यक्रम और कार्यक्रम को तैयार कर शिक्षा में सम्मिलित कराएगी। ग्राम चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था, योगासन, व्यायाम, अखाड़ा खेल कूद व्यवस्था, स्कूल के अलावा खेल मैदान (स्टेडियम), सांस्कृतिक भवन, क्लब आदि व्यवस्था का दायित्व, ग्राम स्वास्थ्य समिति का होगा समिति स्थानीय रुप से उपलब्ध जड़ी-बूटियों द्वारा औषधि बनाने के लिए आवश्यकीय व्यवस्था करेगी। इसके साथ ही पशु चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था का दायित्व भी स्वास्थ्य समिति का होगा। समिति ‘‘समन्वित चिकित्सा’’ (आयुर्वेद, एलोपैथी, होमियोपैथी, यूनानी, योग प्राकृतिक, मानसिक) के उन्नयन की व्यवस्था करेगी। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 284)
  • मानव के नैसर्गिक सम्बन्ध तीन प्रकार से गण्य है :- 
  1. पदार्थावस्था के साथ सम्बन्ध। 
  2. प्राणावस्था (अन्य, वनस्पति) के साथ सम्बन्ध। 
  3. जीवावस्था (पशु पक्षी आदि मानवेतर जीवों) के साथ सम्बन्ध। 
        उपरोक्त संबंधों में उपयोगिता मूल्य दो प्रकार से गण्य है:- 
          1. परस्पर उपयोगिता पूरकता, उदात्तीकरण के रूप में रचना-विरचना क्रम में उपयोगिता। 
          2. परमाणु में विकास क्रम में उपयोगिता। 
              उपयोगिता का स्वरूप निम्न है:-
                1. प्राकृतिक सम्पदा (खनिज, वनस्पति) का उसके उत्पादन के अनुपात में उपयोग संतुलन के अर्थ में। 
                2. प्राकृतिक सम्पदा के उत्पादन में विघ्न न डालना एवं प्राकृतिक सम्पदा के उत्पादन में सहायक बनना। (नैसर्गिक पवित्रता को समृद्घ बनाए रखे बिना, मानव स्वयं समृद्घ नहीं हो सकता।)
                3. उत्पादन में न्याय
                1. प्रत्येक व्यक्ति द्वारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना।
                2. प्रत्येक व्यक्ति में आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य कुशलता व निपुणता को स्थापित करना, जिसका दायित्व शिक्षा-संस्कार समिति को होगा। 
                3. उत्पादन के लिए व्यक्ति में निहित क्षमता योग्यता के अनुरूप उसे प्रवृत करना जिसका दायित्व ‘‘उत्पादन कार्य सलाहकार समिति’’ का होगा।
                4. उत्पादन के लिए आवश्यकीय साधनों को सुलभ करना इसका दायित्व ‘‘ सहकारी विनिमय कोष समिति’’ का होगा। 
                5. उत्पादन कार्य सामान्य आकांक्षी (आहार, आवास, अलंकार) महत्वाकांक्षी (दूर दर्शन, दूर गमन, दूर श्रवण) सम्बन्धी वस्तुओं के रुप में प्रमाणित होना। 
                6. ‘‘ उत्पादन कार्य सलाह समिति’’ व ‘‘विनिमय कोष समिति’’ संयुक्त रुप से सम्पूर्ण ग्राम की उत्पादन सम्बन्धी तादात, गुणवत्ता व श्रम मूल्यों का निर्धारण करेगी।  (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 289-290)
                • ग्राम सुरक्षा :-
                ग्राम सीमा में निहित भूमि का क्षेत्रफल और उस भू-भाग में निहित वन, खनिज, कृषि योग्य भूमि, बंजर भूमि, जल, जल स्रोत, जल संरक्षण, भूमि संरक्षण, सामान्य सुविधा आदि कार्य को सदुपयोग के आधार पर सुरक्षित करना ग्राम सुरक्षा का तात्पर्य है।
                ग्राम से संबंधित वन क्षेत्र और ग्राम की (सरकारी) भूमि और स्वामित्व की भूमि, ग्राम सभा के अधिकार व कार्य क्षेत्र में रहेगी। यदि कोई वन क्षेत्र व भू-खण्ड, किसी गाँव से सम्बद्घ न हो ऐसी स्थिति में उसको किसी न किसी गाँव से सम्बद्घ करने की व्यवस्था रहेगी। ऐसे ग्राम क्षेत्र की सुरक्षा का दायित्व भी ‘‘न्याय सुरक्षा समिति’’ का होगा। 
                          उत्पादन और विनिमय सुरक्षा :-
                उत्पादन सुरक्षा :-
                1. गाँव में जितने भी प्रकार का उत्पादन सम्बन्धी मौलिकताएँ प्रमाणित होंगी उन सबकी सुरक्षा का दायित्व न्याय सुरक्षा समिति का होगा। जैसे किसी उत्पादन कार्य में विशेष प्रकार की मौलिकता अथवा मौलिक प्रणाली अथवा मौलिक औजार मौलिक विधि जो परंपरा में नहीं रही है, ऐसी स्थिति में उन सबको सुरक्षित किया जाएगा। इन सबसे सम्बन्धित मूल वाङ्ग्मय, (डिजाइन) चित्रण, नक्शा प्रक्रिया, प्रणाली और विधियों को लिपि बद्घ, सूत्रबद्घ कर सुरक्षित करेगा। आवश्यकता पड़ने पर पुरस्कार की व्यवस्था करेगा। 
                2. औषधियों का अनुसंधान, वनस्पतियों की पहिचान, ज्योतिष सम्बन्धी अनुसंधान, हस्तरेखा व सामुद्रिक शास्त्र सम्बन्धी साहित्य का अनुसंधान जो परंपरा में नहीं रहा है, उसको उपयोगिता के अनुसार उसकी सुरक्षा का दायित्व ‘‘सुरक्षा समिति’’ का होगा।... (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 292)

                स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी

                दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान

                मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान (संस्करण:2008)
                • १. भक्ति - २. तन्मयता
                परिभाषा - भक्ति : भजन और सेवा की संयुक्त अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन क्रिया कलाप को भक्ति के नाम से जाना जाता है। भजन का तात्पर्य भय से मुक्त होने के क्रिया-कलाप से है। इसका सकारात्मक स्वरूप विश्वास पूर्ण विधि से, कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत कारित, अनुमोदित प्रणालियों से किया गया क्रिया-कलाप।
                सेवा का तात्पर्य है - आवश्यकता, उपकार, कर्तव्य, दायित्व प्रणालियों से किया गया कार्यकलाप। इसमें सेवनीय वस्तु, विश्वास और सभी मूल्यों के साथ परावर्तित रहता है। ऐसी सहजता और विश्वास निरंतरता की पुष्टि है। यह तन्मयता का भी आधार है। तन्मयता रसों में तदाकार होना पाया जाता है। सम्पूर्ण मूल्य ही रस स्वरूप हैं, जिनका आस्वादन मन में होना, एक स्वाभाविक क्रिया है।
                विश्वास एक साम्य मूल्य है। सम्पूर्ण सम्बंधों में, सहज विश्वास ही, वर्तमान में सुख पाने की विधि है। निरंतर समझदारी सहित आवश्यकताओं, उपकारों, कर्तव्यों, दायित्वों में भागीदारी को निर्वाह करने के क्रम में, विश्वास प्रमाणित होना पाया जाता है। यह निरंतर उत्सव के स्वरूप में स्पष्ट है। ऐसा विश्वास पूर्ण होने के क्रम में, जागृति ही इष्ट है। इष्ट के साथ ही भक्ति का प्रवाह होना पाया जाता है। ऐसा बहने वाला विश्वास का, एक स्वाभाविक वातावरण अथवा प्रभाव क्षेत्र बनना सहज है, फलत: तन्मयता प्रमाणित होना पाया जाता है। (अध्याय: 5.1, पृष्ठ नंबर: 43)
                • 11. स्वामी (साथी) - 12. दायित्व
                सहयोगी = दायित्व कर्तव्य साथी = दायित्व-कर्तव्य। सहयोगी - कर्तव्य दायित्व।
                परिभाषा : (स्वामी) साथी :- (1) सर्वतोमुखी समाधान प्राप्त व्यक्ति। ऐसे व्यक्ति का ही, किसी और व्यक्ति के अभ्युदय के लिए, साथी होना संभव है। अभ्युदय ही सर्वजन आकांक्षा है। इसे सफल बनाना, मानव परम्परा है। इसमें (अर्थात अभ्युदय में) पारंगत व्यक्ति दूसरों को अभ्युदयशील, अभ्युदयपूर्ण प्रमाणित करने के क्रम में, साथी (स्वामी)  का पद पाता है। (2) “स्वयं ईक्षयतेति सा स्वामी’’ स्वयं स्फूर्त विधि से दृष्टा पद में हो। “इच्छयेते इति सा स्वामी”। स्वयं को जो पहचान चुका है, जान चुका है, मान चुका है, वे निर्वाह करने के क्रम में साथी (स्वामी) कहलाते हैं।
                दायित्व :- परस्पर व्यवहार, व्यवसाय एवं व्यवस्थात्मक सम्बंधों में निहित, मूल्यानुभूति सहित, शिष्टता पूर्ण निर्वाह। 
                साथी (स्वामी) एक नामकरण है जिसकी सार्थकता परिभाषा में ही इंगति हो चुकी है। अस्तित्व ही सह-अस्तित्व है, यह विदित हो चुका है। इसी क्रम में सम्बन्धों को पहचानना निर्वाह करना, जानना मानना संभव है  और यह प्रमाणित होता है। श्रेष्ठता का गुणानुवादन सुनकर, श्रेष्ठता के लिए साथी (स्वामी) का वर्णन, मनुष्य सहज (की) संभावना है। साथी (स्वामी) शब्द के साथ ही अपेक्षाएं, श्रेष्ठता एवं शुभ के वांछित स्रोत के रूप में ही भास-आभास हो पाता है। ऐसे साथी (स्वामी) अभ्युदय के अर्थ में- समाधान, समृद्घि, अभय एवं सह-अस्तित्व के सफल होने के लिए, दिशादर्शन करते हैं। सहयोगियों में स्वयं स्फूर्त होने के लिए, पूरक विधि से, प्रमाणित हो पाते हैं। जागृति सूत्र विधि से, प्रत्येक व्यक्ति में सर्वतोमुखी समाधान सहज अभ्युदय को, प्रमाण रूप में विधि विहित प्रक्रियाओं से पारंगत बनाना, साथी (स्वामी) का ही दायित्व है।
                अभ्युदय ही सर्वशुभ होने के कारण, सभी सम्बन्धों में सूत्र प्रभावित रहते हैं, यह स्वाभाविक है। सेवक अथवा सहयोगी साथी का अर्थ, जागृति और सर्वतोमुखी समाधान ही होता है। इसमें साथी (स्वामी) और सहयोगी (सेवक) के आशय, समान होने के कारण, पूरकता ही, स्वामी का काम है। पूरकता को स्वीकारना ही, सेवक (सहयोगी) का कार्य बन जाता है। पूरक विधि से ही, सह-अस्तित्व वैभवित है। इसी क्रम में मानव का एक मात्र मार्ग है, सह-अस्तित्व क्रम में, प्रत्येक मनुष्य, किसी न किसी के लिए पूरक होता ही है और किसी न किसी से पूरकता पाता ही है। ऐसी पूरकता वश जागृत होना, प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए अवश्य ही सफल होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
                13. सेवक (सहयोगी) - 14. कर्तव्य
                परिभाषा : सहयोगी :- पूर्णता अथवा अभ्युदय के अर्थ में मार्गदर्शक अथवा प्रेरक के साथ-साथ अनुगमन करना, स्वीकार पूर्वक गतित होना।
                कर्तव्य :- (1.) प्रत्येक स्तर में प्राप्त सम्बंधों एवं सम्पर्कों और उनमें निहित मूल्यों का निर्वाह। (2.) जिस कार्य को करने के लिए स्वीकार किए रहते हैं, उसे करने में निष्ठा को बनाए रखना।
                प्रत्येक व्यक्ति किसी का सहयोगी या किसी का साथी है ही। सम्पूर्ण मूल्यों और सम्बंधों का निर्वाह स्वयं स्फूर्त सेवा है। इस तथ्य के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति का परस्परता में सम्बंध व मूल्यों का निर्वाह करना ही कर्तव्य है। इसी विधि से प्रत्येक व्यक्ति किसी के लिए साथी है, किसी के लिए सहयोगी है। इस प्रकार दायित्व और कर्तव्य सहज निर्वाह ही सेवा है। यही मूल्यों का आस्वादन भी है। दायित्व के रूप में साथी (स्वामी) कर्तव्य के रूप में सहयोगी (सेवक) का स्वरूप स्पष्ट है। दायित्व का व्यवहार कार्य रूप स्वयं स्फूर्त विधि से होना पाया जाता है। हर कार्य-व्यवहार लक्ष्य सहित सम्बंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय-तृप्ति संतुलन, नियंत्रण के रूप में सार्थक होना पाया जाता है। कर्तव्य के रूप में सेवा को पूर्ण कर पाना, सहयोगी के संतोष का स्रोत है। इस कर्तव्य में, निष्ठा का पालन हो, यही सहयोगी, के लिये प्राप्त मार्गदर्शन की सफलता है। मानवीय सम्बंधों व मूल्यों की पहचान व निर्वाह के रूप में सेवा है। स्वयं स्फूर्त होने तक के लिए मार्गदर्शन पाना, आवश्यक है, स्वयं स्फूर्त कर्तव्य निष्ठा का द्योतक है। सम्पूर्ण सेवाओं में उसका स्वत: स्फूर्त होना व उसके मार्गदर्शन की आवश्यकता, उसके अंत: बाह्य कर्तव्यों में सहज गति के रूप में पाया जाता है।
                सामाजिक सम्बन्ध (अर्थात मानव सम्बंधों) के आधार पर, व्यवसाय सम्बन्ध, सफल होने की व्यवस्था है। केवल व्यवसाय सम्बंध के आधार पर, मानव सम्बन्ध एवं मूल्यों की पहचान नहीं हो पाती। व्यवसाय सम्बन्ध के लिए रासायनिक भौतिक वस्तुएं हैं जो मूलत: प्राकृतिक अथवा रूपात्मक अस्तित्व में, से निश्चित अवस्था के रूप में वर्तमान है। उस पर श्रम नियोजन पूर्वक, उत्पादित वस्तुओं में उपयोगिता अथवा कला मूल्य को स्थापित किया जाता है। वर्तमान तक लाभोन्मादी मानसिकता के आधार पर सम्पूर्ण व्यवसाय के निर्भर होने के फल स्वरूप (अथवा प्रलोभन मूल्यांकन के फलस्वरूप) यह विफल होते आया। जबकि अस्तित्व में लाभ से इंगित वस्तु नहीं हैं और न ही उस भय और प्रलोभन की सत्ता है। अस्तित्व में सम्पूर्ण व्यवस्था नियम- निरंतर, नियम प्रवर्तन, नियम-नियंत्रण, नियम-न्याय संतुलन, मूल्यों का निर्वाह और मूल्यांकन के रूप में, सार्वभौम है। 
                इसी के साथ पूरकता विधि क्रम में, उदात्तीकरण, विकास, जागृति देखने को मिलती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सभी समुदाय परंपराएं भ्रमवश ही लाभ, प्रलोभन तथा भय के दलदल में फंस गई हैं। इसका समाधान मूल्यों पर आधारित मूल्यांकन है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन है, संग्रह के स्थान पर आवर्तनशील अर्थव्यवस्था है, सुविधा, भोग, अतिभोग के स्थान पर उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयता है। इस आधार पर साथी सहयोगियों का कर्तव्य व दायित्व, व्यवहृत होना ही है, जो समीचीन है। (अध्याय:5.1, पृष्ठ नंबर: 61- 62)
                • १५.स्वायत्त - १६ समृद्घि (आवश्यकता से अधिक उत्पादन)
                परिभाषा :- स्वायत्त = समृद्घि का अनुभव ही स्वायत्त है।
                मूल्यांकन, आवश्यकता से अधिक होने के बिन्दु में ही तृप्ति का अनुभव होना पाया गया है। इसे हर व्यक्ति अपने में जाँच सकता है। ऐसा जाँचने के क्रम में इस तथ्य का भी मूल्यांकन होता है कि हम आवश्यकता से अधिक उत्पादन किये है या नहीं। आवश्यकता से अधिक उत्पादन परिवार की सीमा में ही मूल्यांकित होता है। परिवार में सभी सम्बन्धों का सम्बोधन जागृत मानव प्रकृति को जाँचने के लिए एक आवश्यकता है।
                इस विधि से सोचा जाय तो पता लगता है कि १० व्यक्तियों के बीच में सीमित, संयत संतानों के साथ सर्वाधिक सम्बन्धों का सम्बोधन परिवार में सुलभ हो जाता है, फलस्वरूप हर के साथ कर्तव्य और दायित्व स्फुर्त होना पाया जाता है। स्वयं स्फुर्ति सदा-सदा जागृति के आधार पर सम्पन्न होना पाया गया। जागृति समझदारी के अर्थ में सार्थक है। इस प्रकार समझदार मानव ही सम्बन्ध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति करने में सक्षम है। इसकी आवश्यकता हर मानव में रहती ही है। इसे सार्थक रूप देना मानव परम्परा का अभीष्ट है। जागृति सर्वमानव को स्वीकृत है, इस विधि से समझदारी, लोक व्यापीकरण होने का स्रोत मानव परम्परा ही है उसमे भी शिक्षा-संस्कार विधा ही प्रबल प्रभावी स्रोत है। (अध्याय:5.1 , पृष्ठ नंबर: 63)
                • मानव व्यवहार, कर्म, अभ्यास एवं अनुभव परम्परा में ही, मनुष्य के उत्साहित रहने से, हँसी खुशी के साथ, नित्य सफलता समीचीन रहती है। भ्रमवश ही विघटित परिवार और समाज, आवेशों अवमूल्यन को उत्साह मानता और साथ ही अवमूल्यन कार्यों को मानता है। यह भय व प्रलोभन का रूप है। भय-प्रलोभन मनुष्य का भ्रमवश लिया गया निर्णय है। यह मानव कुल के लिए अव्यवहारिकता का कारण हुआ। अन्य अव्यवहारिकताएं, द्रोह-विद्रोह, शोषण, युद्घ में देखने को मिलती हैं। यह मानव कुल में आवेश का साक्ष्य है। जबकि समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सर्वमानव का स्वत्व एवं स्वभाव गति है। इसकी संभावनाएं, यथार्थता के आधार पर स्पष्ट होती हैं। इस प्रकार हास उल्लास का आधार मानवीयतापूर्ण व्यवहार, आचरण, व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में उत्सवित है और मानव को हर मानव का जागृति सहित कर्तव्यों, दायित्वों के अर्थ में उत्सवित करना ही उल्लास व हास का वास्तविक अर्थ में प्रयोजन, सार्थकता, नित्य आवश्यकता है।(अध्याय:5.1 , पृष्ठ नंबर: 71)

                • मानवीयता पूर्ण अमानवीयता पूर्ण                                                                   प्रवर्तन कार्य                            प्रवर्तन कार्य
                     (1) शुभकामना                        कामावेश
                सन्तुलन प्रवृत्ति व कार्य भोग प्रवृत्ति व क्रिया

                     (2) स्नेह विश्वास                   क्रोधावेश
                सह-अस्तित्व प्रवृत्ति व कार्य हिंसक प्रवृत्ति व क्रिया

                     (3) उदारता                           लोभावेश
                दायित्व कर्तव्य में अर्पण- संग्रह प्रवृत्ति व क्रिया                                                              समर्पण

                    (4) मूल्य व मूल्यांकन               मोहावेश
                कर्तव्य दायित्व का निर्वाह             अव्याप्ति दोष, प्रवृत्ति व कार्य

                     (5) नियम पालन                     मदावेश
                बौद्घिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्वयं के प्रति अधिमूल्यन                                                                     प्रक्रिया व कार्य

                     (6) पूरकता व दयापूर्ण कार्य मात्सर्य आवेश
                व्यवहार, विन्यास,  जागृति अवमूल्यन प्रवृत्ति व कार्य
                पूर्वक तन, मन, धन का 
                नियोजन सभी सम्बन्धों में।

                उपरोक्त वर्णित चित्रण से, मानवीयता पूर्ण पद्घति से भाई व मित्र सम्बन्ध सफल और अमानवीयता पूर्वक असफल होना स्पष्ट है। मानवीयता के प्रकाशन में, सभी सम्बन्ध सहज रूप में दिखाई देते हैं। उसके निर्वाह करने का मार्ग प्रशस्त होता है। (अध्याय:5.1 , पृष्ठ नंबर: 85-86)
                • ...यही उपयोगिता-सदुपयोगिता का मापदण्ड है। सम्बन्ध व मूल्यों में, जीवन जागृति का लक्ष्य समाया रहता है। सदुपयोगिता का आधार मापदण्ड यही है कि परिवार मानव (अथवा मानव परिवार) तन, मन, धन रूपी अर्थ को सम्बंधों में अर्पित-समर्पित कर, प्रसन्नता और समाधान का अनुभव करता है। प्रसन्नता और समाधान का प्रमाण प्रस्तुत करता है। प्रयोजनीयता का प्रमाण, जीवन जागृति सहज, स्वानुशासन है। समझदारी का प्रमाण, मानवीय कर्तव्यों व दायित्वों का निर्वाह करना ही है। यही उपयोगिता एवं सदुपयोगिता का प्रमाण है। मानवीयता का मार्गदर्शक, अतिमानव रूपी देव मानव व दिव्य मानव ही है। यही प्रयोजन है। (अध्याय:5.21 , पृष्ठ नंबर: 135)
                • 27 संयम - 28.नियम
                परिभाषा : संयमता :- मानवीयतापूर्ण विचार, व्यवहार एवं व्यवसाय में नियंत्रित होना।
                नियम :- नियंत्रणपूर्वक स्वयं स्फूर्त विधि से, व्यवस्था में जीते हुए समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने की प्रवृत्ति और प्रमाण।
                संयम, नियम, नियंत्रण, सन्तुलन और जागृतिपूर्वक दायित्व और कर्तव्य निर्वाह होना पाया जाता है। इन प्रक्रियाओं को नियम के नाम से जाना जाता है। नियम, मनुष्य सहज रूप में, दायित्वों के प्रति होने वाली उदात्तीकरण, स्वयं स्फूर्त संप्रेषणा, प्रकाशन कार्य व्यवहार है। ऐसे संयम व नियम, व्यवहार कार्यों व्यवस्था के अर्थ में सार्थक होना सहज है। जबकि अक्षय बल व अक्षय शक्ति सहज जागृति की अभिव्यक्तियां हैं। मानव सहज बहुमुखी अभिव्यक्ति, वृत्तियों-प्रवृत्तियों का होना पाया जाता है। इसी क्रम में, जागृति पूर्ण एक प्रक्रिया, पद्घति, प्रणाली और नीति को पहचानना सहज है, अध्ययन की सार्थकता है। (अध्याय:5.21 , पृष्ठ नंबर: 155)
                • इन सम्बन्धों के प्रति निर्भ्रम होने के उपरान्त सहज ही विश्वमानव व्यवस्था की आवश्यकता व स्वरूप समझ में आता है, फलत: कर्तव्य व दायित्व निश्चित होता है। इस प्रकार सम्बन्धों व मूल्यों को, पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में, मूल्यों की मूल्यांकन विधि अपने आप स्पष्ट होती है। किसी भी संबंध को, चाहे माता-पिता, पुत्र-पुत्री, गुरू-शिष्य, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, मित्र-मित्र सम्बन्ध सभी हो अथवा एक से अधिक हो उनमें विश्वास साम्य मूल्य है। इसका निर्वाह होना ही विश्वास की गवाही है। यद्यपि सम्बन्धों के अनुरूप कृतज्ञता, गौरव, श्रद्घा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, स्नेह ये जो स्थापित मूल्य सार्थक होता है। फलत: सम्बंधों का स्वरूप, कर्तव्य व दायित्व की महिमा व निर्वाह सहज वर्तमान होता है। इसके योगफल में न्याय अपने आप सूत्रित, व्याख्यायित व वैभवित होता है। यही न्याय सुलभता का तात्पर्य है। (अध्याय: 5.21, पृष्ठ नंबर:180)
                • परिवार में परस्पर प्रवृत्तियों को, कर्तव्य दायित्वों को आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य में एक दूसरे को पहचानते है। इसकी आवश्यकता बना ही रहता है। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर: 198)
                • हर जागृत परिवार में परस्पर मानव (नर-नारी) स्वीकृतियों अर्थात समझदरियों कर्तव्यों के साथ स्मृति श्रुति पूर्वक मूल्यांकन करते है। हर मानव परिवार की आवश्यकता है। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर: 199)
                • गुणात्मक परिवर्तन के संदर्भ में, से, के लिए ही दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होते हैं। अनुभव क्षमता से सम्पन्न होने पर्यन्त दायित्व एवं कर्तव्यबोध का मूल्यांकन होता है। उसके अनंतर वह स्वभावगत होता है। अमानवीयता से मानवीयता में अनुगमन करने के लिए नियंत्रण पूर्वक, दायित्व एवं कर्तव्य प्रमाणित होता है। मानवीयता से अतिमानवीयता में अनुगमन करने के लिए छ: प्रकार के स्वभाव से कर्तव्य एवं दायित्व को प्रमाणित करते हैं। धीरता से परिपूर्ण होना ही, वीरता का होना है। वीरता से परिपूर्ण होना ही उदारता का होना है। उदारता से परिपूर्ण होना ही दया का होना है। दया से परिपूर्ण होना ही कृपा का होना है तथा कृपा से परिपूर्ण होना ही करुणा का होना प्रमाणित है। दया, कृपा, करुणा की संयुक्त अभिव्यक्ति ही प्रेम है। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर:225)
                • प्रेमानुभूति योग्य जन-मानस का निर्माण करने के लिए मानवीय शिक्षा संस्कार की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। शिक्षा ही जीवन विश्लेषण पूर्वक, यथार्थताओं वास्तविकताओं पर आधारित, जीवन के कार्यक्रम को स्पष्ट करती है। यही प्रत्येक मनुष्य में पाई जाने वाली कामना एवं उसकी आवश्यकता है। यही शिक्षा का दायित्व है। शिक्षा ही जीवन में गुणात्मक परिवर्तन का स्रोत है चरितार्थ होने का आधार है। अंततोगत्वा यही अनुभव के लिए प्रेरणा है। वरिष्ठ अनुभूति, प्रेमानुभूति ही है। यही पूर्णतया सामाजिक एवं व्यवहारिक है। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर: 229)
                • प्रेमानुभूति लोकव्यापीकरण होने के अर्थ में सम्पूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न होना ही मानव कुल में उसकी जागृति सहज चरितार्थता है। जागृत मानव कुल में चरितार्थता, सफलता एवं उज्जवलता सहज समाधान, समृद्घि अभयता एवं सह-अस्तित्व ही है। सदुपयोग सुरक्षा के अर्थ में सुविधाओं की तारतम्यता उसकी व्यवहारिकता सार्थकता को प्रमाणित कर देता है। स्थापित मूल्य सहित सम्पूर्ण मूल्यों का मूल्यांकन योग्य कार्यक्रम, मानवीयता सहज विधि से चरितार्थ होता है, सार्थक होता है। यही जागृति का प्रमाण है। ऐसी जागृत परम्परा को स्थापित, प्रस्थापित, गतित, सार्थक करना ही सम्पूर्ण शिक्षा, शिक्षण, राष्ट्र, राज्य, समाज, समाज सेवी, धर्म, कर्म, प्रायश्चित उद्धारकारी, प्रौद्योगिकी और व्यापार संस्थाओं तथा व्यक्तियों का सहज कर्तव्य है। ऐसे कर्तव्य को पहचानने के लिए ऐसी सभी संस्थाओं और सभी व्यक्तियों को जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज समझदारी में पारंगत होना अपरिहार्य स्थिति है। ऐसे सार्वभौम समझदारी को ‘हम’ पा चुके है। ‘हम’ का तात्पर्य हम जितने नर-नारी जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत हो चुके है, से है। हमारी प्रतिज्ञा ही है कि समझदारी को लोकव्यापीकरण करना। यही प्रेममय अभिव्यक्ति का साक्षी भी है। अस्तु, मानव कुल प्रेम और अनन्यता सहज विधि से कार्य, व्यवहार विन्यास, सर्वमानव सुलभ हो, ऐसी कामना है। इसे सार्थक बनाने का कार्यक्रम है। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर:229-230)
                • सम्पूर्ण सम्बंध मानव की जिज्ञासा के अनुसार सम्बंधों का संबोधन प्रचालित है। इन सभी सम्बंधों में शुभेच्छा ही सर्वाधिक लोगों में आकलित होता है। मानव सहज प्रयोजनों के अर्थ में सम्बंधों की दृढ़ता में निरंतरता रहता ही है। ऐसी दृढ़ता के आधार पर ही जागृति पूर्वक निष्ठा सहज स्वीकार होना पाया जाता है। सम्पूर्ण निष्ठा में मानव अपने दायित्व कर्तव्यों को स्वीकारने की स्थिरता होना पाया जाता है फलस्वरूप व्यवस्था और व्यस्था में भागीदारी सहज हो जाता है। वात्सल्य सहज सम्बंधों का निर्वाह प्रमाणिकता के आधार पर ही सफल होना पाया गया है। हर बड़े बुजुर्ग, आचार्य, गुरू, मित्र, परिवार, समाज व्यवस्था सम्बंधों के साथ अपेक्षाएं श्रेष्ठता के अर्थ में ही बना रहता है। इसी प्रकार बड़े बुजुर्ग, आचार्य अभिभावक भी वात्सल्य प्रेरित मानव संतान को भावी श्रेष्ठ स्वरूप के अर्थ में ही अपेक्षा बनाये रखते है। ये उभयपक्षी अपेक्षाएं सार्थक होने का जहाँ तक प्रमाण बिंदु है वहाँ तक पहुँचने में बड़े बुजुर्ग, आचार्य अभिभावकों का ही दायित्व प्रधान रहता है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर आते है कि परम्परा ही आगे पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक है। लक्ष्योन्मुखी प्रवृत्ति के लिए दायित्व पीछे पीढ़ी के साथ जुड़ा रहता है। अतएव परम्परा जागृति होने के बाद ही परम्परा अपने सभी आयामों में जागृत होने के उपरांत ही भविष्य की पीढ़ियाँ जागृत होना और प्रमाणित होना पाया जाता है। (अध्याय:5.31, पृष्ठ नंबर:231-232)
                • ...इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक जागृत परिवार मानव के लिए अपने में स्वस्थता और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के क्रम में, प्रमाणिकता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। यही सार्थकता का तात्पर्य है। हर मानव सार्थक बनना ही चाहता है। यह विकास और जागृति सहज स्वर है। जागृत मानव परम्परा का सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज के रूप में अभिव्यक्ति संप्रेषित प्रकाशित होना परम्परा का गौरव है। ऐसी गौरवमय परम्परा को पाने के क्रम में सर्वमानव में, से, के लिए कर्तव्य दायित्व समीचीन है। उसके लिए मानवत्व को पहचानना एक अनिवार्य स्थिति है। यही सर्वमानव परम्परा में मौलिक बिंदु है। इसे लोकव्यापीकरण करने के लिए मानव को अस्तित्व मूलक, मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान को हृदयंगम करना होगा। (अध्याय: 5.31, पृष्ठ नंबर:237)

                स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी 

                दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव संविधान सूत्र व्याख्या

                मानवीय संविधान सूत्र व्याख्या (संस्करण:प्रथम, मुद्रण:2007)
                • राष्ट्रीयता 
                1. न्याय प्रदायी क्षमता योग्यता, पात्रता सहित कार्य-व्यवहार सहित सहअस्तित्व सहज प्रमाण परम्परा ।
                2. मानवीयतापूर्ण आचरण, व्यवहार, विचार का वर्तमान और उसकी परंपरा ज्ञान, विवेक, विज्ञान सहित किया गया दायित्व व कर्त्तव्य निर्वाह । (अध्याय:2 , पृष्ठ नंबर: 19)
                • जागृत मानव परिवार प्रवृत्ति
                प्रत्येक जागृत मानव परिवार में एक दूसरे को सम्बन्धों के अर्थ में संबोधन कार्य, कर्त्तव्य, दायित्व, मूल्यों का निर्वाह, परिवार सहज प्रमाण सहित समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में अपना पहचान प्रस्तुत किए रहते हैं। ऐसे एक दूसरे के सभी प्रकार के पहचानों को सत्यापित करते हैं। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर: 50-51)
                • कर्त्तव्य सहज अधिकार
                हर नर-नारी जागृति सहज प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन को प्रमाणित करना सर्वमानव सहज मौलिक अधिकार सहित कर्त्तव्य है । 
                जागृत मानव प्रतिभा- (ज्ञान, विवेक, विज्ञान सम्पन्नता)
                1. स्वयं में विश्वास
                2. श्रेष्ठता सहज सम्मान में विश्वास
                3. ज्ञान-विवेक-विज्ञान रूपी प्रतिभा में विश्वास
                4. मानवीयता पूर्ण आहार-विहार-व्यवहार रूपी व्यक्तित्व में विश्वास 
                5. व्यवहार में अखंड सामाजिक होने में विश्वास 
                6. उत्पादन कार्य रूपी व्यवस्था, परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने में विश्वास 
                उपरोक्त सभी का अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन हर नर-नारी में, से, के लिए मौलिक कर्त्तव्य व अधिकार है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:66-67) 
                • साथी-सहयोगी - कर्त्तव्य दायित्वों को निष्ठापूर्वक निर्वाह करने के अर्थ में संबंधों का निर्वाह करना मौलिक अधिकार है । (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 74)
                • सम्बन्ध सहज पहचान -
                ♦    पोषण प्रधान संरक्षण के रूप में माता का दायित्व-कर्तव्य के रूप में प्रमाण ।
                ♦ संरक्षण प्रधान पोषण रूप में पिता का दायित्व कर्त्तव्य प्रमाण मौलिक अधिकार है। (अध्याय:6, पृष्ठ नंबर: 75)
                • मानवीय संस्कृति सभ्यता का अधिकार
                अनुभव मूलक अभिव्यक्ति संप्रेषणा
                सम्बन्ध-मूल्य                निर्वाह परम्परा 
                मूल्यांकन-उभयतृप्ति     निर्वाह परम्परा
                व्यवस्था सहज -            निर्वाह परम्परा
                दायित्व -                       निर्वाह परम्परा इन्हें कलात्मक विधि
                कर्त्तव्य सहज-              निर्वाह परम्परा से प्रस्तुत करना  
                पूर्णता के अर्थ में किया गया निर्वाह परम्परा
                जागृति पूर्वक जीने की कला व कृतियों के रूप में निर्वाह परम्परा
                क्रिया पूर्णता, मानव मूल्य, चरित्र, नैतिकता सहित सर्वतोमुखी समाधान प्रमाण के रूप में वर्तमान होना-रहना ही है । 
                जागृत मानव जीने का प्रमाण परम्परा ही मानव संस्कृति सभ्यता सहज मौलिक अधिकार है।(अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर:86)
                • हवा के साथ मानव का सम्बन्ध बना ही है । प्राण वायु अर्थात् मानव तथा जीव-संसार जिस प्रकार के हवा के कारण सांस ले पाते हैं , इसकी प्रचुरता-पवित्रता को बनाये रखना मानव कुल का कर्त्तव्य है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:88)
                • धरती पर अन्न, वन, वनस्पतियों, वन्य प्राणियों और जीवों का सम्बन्ध एवं वन ही इनके आवास स्थली के रूप में धरती पर वर्तमान है। मानव सहज वैभव होने का आधार भी धरती है, इसलिए इसका सन्तुलन आवश्यक है । धरती अपने शून्याकर्षण स्थिति-गति स्वरूप में संतुलित होने के आधार पर ही प्राणावस्था के सम्पूर्ण प्रकार की वनस्पतियाँ, जीव-संसार और ज्ञानावस्था में मानव का होना पाया जाता है । इनमें सन्तुलन बनाये रखना जागृति है । यह विज्ञान विधा का महत्वपूर्ण दायित्व है । (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 88) 
                • जीव संसार की सुरक्षा व नियंत्रण-संतुलन मानव परंपरा के लिए अनिवार्य कर्त्तव्य है। (अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर:89)
                • ज्ञान-विवेक-विज्ञान पूर्ण विधि से सामाजिक अखण्डता व्यवस्था सहज सार्वभौमता के अर्थ में सोच-विचार-निर्णय सहित कर्त्तव्य -दायित्व पालन पूर्वक व्यवहार करने का अधिकार। (अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर:95)
                • उद्देश्य-दायित्व- कर्त्तव्य
                मानव का कर्त्तव्य जागृति के पश्चात प्रारंभ होता है। हर नर-नारी जागृति सम्पन्न होने का स्त्रोत शिक्षा-संस्कार कार्य परंपरा है । जागृत मानव होने से ही कर्त्तव्य दायित्व सार्थक होता है। जो देश काल परिस्थिति के आधार पर तय होता है। मूलत: मौलिक अधिकार जागृत मानव का कर्त्तव्य है जो स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति,  समाज के प्रति, समग्र व्यवस्था के प्रति वरीयता सहित भागीदारी पूर्वक सार्थक होता है । 
                  हर नर-नारी जागृति सहज प्रतिभा और व्यक्तित्व को प्रमाणित करना सर्वमानव सहज मौलिक अधिकार सहित दायित्व कर्त्तव्य है ।
                    1. सभा में भागीदारी हर नर-नारी करने में समानता मानव-लक्ष्य सर्व सुलभ होना और होने में-से-के लिए सभी सदस्य समान रूप में दायी है । 
                    2. हर परिवार में  हर सदस्य समझदार-ईमानदार-जिम्मेदार-भागीदार होना, रहने का उद्देश्य व सफल बनाने का दायित्व समान है ।
                    3. सहअस्तित्व दर्शन-ज्ञान, जीवन-ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान पूर्वक व्यवस्था गति को बनाये रखने का दायित्व समान है । 
                    4. सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्नता से ही परिवार से विश्व-परिवार में प्रमाणित होना ईमानदारी व दायित्वहै । 
                    5. मानवीयता पूर्ण आचरण प्रवृत्ति जिम्मेदारी का दायित्व होना समान है । 
                    6. अखण्ड समाज के अर्थ में दस सोपानीय सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी का दायित्व समान है । 
                    7. मानव लक्ष्य परंपरा में प्रमाणित होने का दायित्व समान है । 
                    8. मानवीय शिक्षा-संस्कार, न्याय-सुरक्षा, उत्पादन कार्य  सुलभता, विनिमय-कोष  सुलभता, स्वास्थ्य-संयम सुलभता, यही प्रधानत: कार्य सहज उद्देश्य-दायित्व- कर्त्तव्य है। इनमें समानाधिकार है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर:97)
                                  • आवश्यकताओं की पूर्ति इसलिए संभव नहीं है कि वह अनिश्चित एवं असीमित है। कर्तव्य की पूर्ति इसलिए संभव है कि वह निश्चित व सीमित है। यही कारण है कि कर्तव्यवादी प्रगति शांति की ओर तथा आवश्यकतावादी प्रगति अशांति की ओर उन्मुख है। (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:98)
                                  •  परिवार सभा का स्वरूप :-
                                  दस समझदार मानव जिसमें हर नर-नारी सह-अस्तित्व सहज समझदारी-ईमानदारी-जिम्मेदारी-भागीदारी में समानता, जिसका अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन करने में समान अधिकार सम्पन्न परिवार है। 
                                  शिक्षा संस्कार कार्य व्यवस्था, न्याय सुरक्षा कार्य व्यवस्था, परस्परता में उत्पादन कार्य व्यवस्था, आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य व्यवस्था,  विनिमय कार्य व्यवस्था-श्रममूल्य के आधार पर लेन-देन रूप में विनिमय कार्य व्यवस्था, स्वास्थ्य संयम कार्य व्यवस्था सहज समान कर्त्तव्य दायित्व अधिकार रहेगा ।
                                  अस्तित्व में इकाइयों के होने का प्रमाण सर्वतोमुखी प्रतिबिम्ब है। परस्पर पहचान ही प्रक्रिया प्रमाण है । 
                                  परस्परता में पहचान कार्य-व्यवहार का आधार है एवं प्रेरणा सहित कर्त्तव्य व दायित्व सूत्र व्याख्या है । पूरकता उपयोगिता सहज प्रमाण है । 
                                  नेत्रों में सहअस्तित्व सहज प्रतिबिंब आंशिक रूप समायी है । जबकि हर नर नारी में पूरा समझना अध्ययन विधि से सहज है। (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 100-101)
                                  • ...सम्पूर्ण मानव ज्ञान सम्पन्नता में होना हर जागृत मानव में-से-के लिये दृष्टव्य-ज्ञातव्य कर्त्तव्य बोध होना पाया जाता है। फलस्वरूप न्याय व सुरक्षा सर्व सुलभ होता है । (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर:110)
                                  • हर परिवार-समूह-सभा कार्य कर्त्तव्य रत हर सदस्य आत्म निर्भर रहना न्याय है।   (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:129)
                                  • सभायें समितियों की कार्य प्रणालियों व कर्त्तव्यों का निर्धारण-निर्देशन करेगी । उसे हर समितियाँ स्वीकार पूर्वक कार्य व मूल्यांकन करने तथा निरीक्षण करने के अधिकार से सम्पन्न रहेगी, यह न्याय है। (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर:131)
                                  • व्यवहार-कार्य में ही भागीदारी, दायित्व- कर्त्तव्यों का निर्वाह का प्रमाण है । यह न्याय है । (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर:133)
                                  • मानवीय शिक्षा का प्रयोजन संस्कार मानवीयता में-से-के लिए स्वीकृति को कार्य-व्यवहार में, कार्य-व्यवहार सामाजिक अखण्डता व सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होता है । यह दायित्व हर सदस्यों में समान रहेगा, यही सर्वशुभ है । यही न्याय है। (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 134)
                                  • ज्ञान-विवेक-विज्ञान पूर्वक दायित्वों की स्वीकृति निश्चय निर्वाह करने में स्वतंत्रता (स्वयं स्फूर्त होना), दायित्व के साथ कर्त्तव्यों का निर्वाह करना न्याय है ।  (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर:134)
                                  • दायित्व 
                                  मानवीय शिक्षा स्वीकृति अर्थात् सहअस्तित्व तथ्य को सहज रूप में जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करने के रूप में दायित्व होना न्याय है । 
                                  स्वीकृतियाँ जानने व मानने के रूप में, सोच-विचार-निर्णय विवेक-विज्ञान के रूप में, आचरण (कार्य-व्यवहार) मानवीयता के रूप में पहचान-निर्वाह के रूप में, व्यवस्था स्वयं स्फूर्त कर्त्तव्य -दायित्व रूप में, संस्कृति उत्सव के रूप में, स्वीकृतियाँ जागृत समाज परस्पर अर्पण समर्पण के रूप में, सभ्यता व्यवस्था में भागीदारी के रूप में, संविधान आचरण के अर्थ में, व्यवस्था सार्वभौमता (सर्व शुभ व स्वीकृति) के रूप में न्याय है । (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:135-136)
                                  • दायित्व 
                                  जिन सदस्यों ने न्यूनतम से अधिक राशि खाते में रखी है, उनकी सहमति से, विनिमय कार्य के लिए आवश्यकता पड़ने पर, विनिमय कोष, उस धन राशि का उपयोग करेगा व अन्य राष्ट्रीय कृत बैंक से जो ब्याज मिलता है वह उनको देगा। यह विधि तब तक रहेगी, जब तक बैंक विनिमय-प्रणाली अलग-अलग रहेगी ।
                                  गाँव से सभी प्रकार की कर वसूली का दायित्व विनिमय कोष का होगा। कर निर्धारण का कार्य ग्राम सभा करेगी।
                                  उपरोक्त बैंक का गारन्टीदार राष्ट्रीय कृत सहकारी बैंक होगा जो आरंभ से उसे कार्यशील पूंजी व अन्य ऋण देगा,  हानि की भरपाई करेगा । विनिमय कोष ही आगे अपने सदस्यों को ऋण देगा वह उत्पादित वस्तुओं के रूप में विनिमय बैंक का ऋण लौटा देगा ।
                                  विनिमय कोष शनै:-शनै: सरकारी बैंक से ली गई पूंजी को लौटाता रहेगा। इस तरह सरकारी बैंक के रूपये का ज्यादातर उपयोग होगा । (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 161) 
                                  • स्वास्थ्य संयम कार्य व्यवस्था समिति
                                  ग्राम स्वास्थ्य समिति : कार्य एवं दायित्व 
                                  ग्राम के सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं संयम की जिम्मेदारी ग्राम स्वास्थ्य समिति की होगी । यह समिति शिक्षा संस्कार समिति के साथ मिलकर कार्य करेगी । आवश्यकतानुसार  स्वास्थ्य संयम संबंधी पाठ्यक्रम और कार्यक्रम को तैयार कर शिक्षा में सम्मिलित कराएगी । ग्राम में चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था, योगासन, व्यायाम, अखाड़ा, खेल कूद व्यवस्था, स्कूल के अलावा खेल मैदान (स्टेडियम), सांस्कृतिक भवन क्लब आदि व्यवस्था का दायित्व ग्राम स्वास्थ्य समिति का होगा। समिति स्थानीय रूप से उपलब्ध जड़ी-बूटियों द्वारा औषधि बनाने के लिए आवश्यकीय व्यवस्था करेगी। इसके साथ ही पशु चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था का दायित्व भी स्वास्थ्य समिति का होगा । समिति ‘‘समन्वित चिकित्सा’’ (आयुर्वेद, एलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी, योग, प्राकृतिक, मानसिक) के उन्नयन की व्यवस्था करेगी । 
                                  सब ग्राम वासियों को स्वास्थ्य, व्यवहार, आचरण सम्बन्धी मूल्यों का मूल्यांकन, उपयोगिता व प्रयोजन मूलक पद्घति से समिति व्यवस्था प्रदान करेगी । अलंकार, प्रसाधन कार्य, शरीर स्वच्छता, महिलाओं व बच्चों को रोग-निरोधी उपाय, और सीमित व संतुलित परिवार के रूप में व्यवहृत होने के लिए व्यवस्था प्रदान करेगी । ऐसी जागृति के लिए व्यापक कार्यक्रम को समिति संचालित करेगी । सामान्य रूप में घटित अस्वस्थता को दूर करने के लिए, घरेलू चिकित्सा में प्रत्येक परिवार को अथवा प्रत्येक परिवार में एक व्यक्ति को प्रवीण बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाएँगे । घरेलू चिकित्सा से रोग शमन न होने की स्थिति में स्थानीय केन्द्र द्वारा चिकित्सा होगी । वहाँ राहत न मिलने की स्थिति में, निकटवर्ती चिकित्सा केन्द्र में पहुँचाने और चिकित्सा सुलभ कराने की व्यवस्था ग्राम स्वास्थ्य समिति करेगी । चिकित्सा केन्द्र, चिकित्सालय, मातृत्व केन्द्र, प्रसवोत्तर केन्द्र की स्थापना यथा सम्भव ग्राम समूह परिवार सभा द्वारा किये जावेंगे । (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 163)
                                  • कार्यशैली :- 
                                  प्रत्येक ग्राम सभा, ‘‘ग्राम स्वराज्य व्यवस्था” को स्थापित करने के लिए निम्न 5 समितियों का गठन ग्राम सभा से मनोनीत सदस्य करेंगे :-
                                  1. मानवीय शिक्षा  संस्कार समिति
                                  2. उत्पादन कार्य व सलाहकार समिति
                                  3. वस्तु विनिमय कोष समिति
                                  4. स्वास्थ्य संयम समिति
                                  5. मानवीय न्याय सुरक्षा समिति

                                  उपर्युक्त समितियां ग्राम सभा के मार्ग दर्शन के आधार पर कार्य करेंगी । उपरोक्त समितियां क्रम से ग्राम में शिक्षा संस्कार व्यवस्था, उत्पादन कार्य व्यवस्था, विनिमय कोष व्यवस्था, स्वास्थ्य संयम व्यवस्था व न्याय सुरक्षा व्यवस्था को सर्व सुलभ करेगी। उपरोक्त समिति के सदस्यों का मनोनयन ग्राम सभा  करेगी। प्रत्येक मनोनीत सदस्य इन समितियों  के लिए  अंश-कालिक  सदस्य होगा एवं वह अपनी समिति का कर्तव्य एवं दायित्वों का निर्वाह अपने निजी व्यवसाय के अलावा करेगा । वयोवृद्घ स्त्री व पुरुष, जो जीवन-विद्या व वस्तु-विद्या में पारंगत होंगे, उनको समितियों के अंश  कालिक व पूर्ण कालिक सदस्य होने का अवसर रहेगा । प्रत्येक समिति का विस्तृत कार्यक्रम अगले खंडों  में विस्तार से दिया गया है । ग्राम स्वराज्य व्यवस्था के लक्ष्य निम्न होंगे :- 
                                  1. गाँव के प्रत्येक नर-नारी को मानवीय शिक्षा-संस्कार से संपन्न करना । 
                                  2. प्रत्येक नर-नारी को तकनीकी में निपुणता-कुशलता को सजह  सुलभ करना । 
                                  3. प्रत्येक नर-नारी को व्यवहार में सामाजिक होने के लिए ज्ञान-विवेक-विज्ञान सहज शिक्षा संस्कार सर्व सुलभ करना जिससे न्याय सुरक्षा प्रमाणित हो। 
                                  4. प्रत्येक नर-नारी को किसी न किसी उत्पादन कार्य में प्रवृत्त प्रोत्साहित करना । 
                                  5. उत्पादित वस्तुओं को विनिमय-कोष द्वारा लाभ-हानि मुक्त पद्घति से लेन-देन करने की व्यवस्था प्रदान करना और ग्राम वासियों के लिए आवश्यकीय वस्तुओं को उपलब्ध कराना  विनिमय कोष कर्त्तव्य रहेगा । 
                                  6. प्रत्येक नर-नारी को न्याय व सुरक्षा सहज सुलभ कराना । साथ ही सुधारवादी-प्रक्रिया से गलती व अपराध प्रवृत्तियों का निराकरण करना । 
                                  7. प्रत्येक नर-नारी को अपने स्वास्थ्य के प्रति आश्वस्त रहने का अवधारणापूर्वक संकल्प बद्घ करना, व्यायाम  व खेलों के लिए प्रोत्साहित करना, संक्रामक रोग-निरोधी उपायों की उपयोगिता से अवगत कराना । साथ ही हर परिवार में सहज व उपकारी चिकित्सा  की व्यवस्था करना । 
                                  8. प्रत्येक नर-नारी में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, ग्राम जीवन, परिवार-व्यवस्था के प्रति विश्वास व निष्ठा उत्पन्न करना । प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन रहने में निष्ठा स्थापित करना । 
                                  9. प्रत्येक नर-नारी / परिवार अपनी आवश्कता से अधिक उत्पादन करे, ऐसा सुनिश्चित उपाय करना। 
                                  10. ग्राम के लिए सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था करना । 
                                  11. व्यक्तित्व व प्रतिभा का संतुलित उदय हो, ऐसा सुनिश्चित उपाय करना । इसके लिए समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, भागीदारी पूर्वक जीने में निष्ठा सम्पन्न करना । 
                                  12. प्रत्येक परिवार में भौतिक समृद्घि व बौद्घिक समाधान साक्षित होने का उपाय करना, समस्त ग्राम वासियों की परस्परता में अभयता व सह-अस्तित्व चरितार्थ होने का सभी उपाय करना।(अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर:166-168)
                                  • ग्राम मोहल्ला परिवार सभा सदस्यों का कर्तव्य व दायित्व
                                  1. समझदारी से समाधान एवं श्रम से समृद्घि सिद्घांत पर ग्राम सभा कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करेगा । 
                                  2. ग्राम सभा पूर्ण रूप से ग्रामवासियों के प्रति उत्तरदायी होगी। साथ ही वह ‘‘ग्राम समूह सभा’’  के प्रेरणा व उनके द्वारा दिए गए सुझावों पर निर्णय लेगी । 
                                  3. सर्वेक्षण, आंकलन व अध्ययन के आधार पर चिन्हित प्रयोजनार्थ प्रत्येक परिवार के लिए  समयबद्घ स्वराज्य व्यवस्था सहज कार्य योजना बनाएगी व क्रियान्वयन के लिए विभिन्न समितियों को आवश्यक निर्देश देगी ।
                                  4. ग्राम की पाँचों समितियों के साथ उनके अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करने में पूर्ण सहयोग देगी व उनके लिए जो भी सुविधायें, तकनीकी ज्ञान, विज्ञान आदि की आवश्यकता होगी उसे उपलब्ध कराएगी। 
                                  5. ‘‘विनिमय कोष’’ आवश्यकता के आधार पर  राष्ट्रीयकृत बैंक के बीच संयोजन (एजेंसी) का कार्य करेगी । 
                                  6. पाँचों समितियों के कार्यों का समय-समय पर मूल्यांकन करेगी व उन्हें आवश्यक निर्देश देगी । 
                                  7. सर्वेक्षण, आंकलन, अध्ययन व प्राथमिकताओं के आधार पर ग्राम में सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था करेगी । इस दिशा में यदि किसी समिति व अन्य संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता हुई तो उसे प्राप्त करेगी । 
                                  8. निम्न सामान्य सुविधाओं की व्यवस्था ग्राम सभा द्वारा की जायेगी- 
                                  1. प्रत्येक परिवार के लिए आवास का प्रावधान। इसके लिए स्थानीय व्यक्तियों व वस्तुओं का अधिक से अधिक उपयोग किया जावेगा । 
                                  2. सस्ती शोधन विधि द्वारा शुद्घ व पवित्र पीने के पानी की व्यवस्था । 
                                  3. जल-मल निकास की व्यवस्था करना एवं कृषि-बगीचा के लिए उपयोग करना।  
                                  4. कृषि के साथ पशुपालन आवश्यक होने के कारण ‘‘गोबर-गैस प्लांट’’ द्वारा, गोबर-गैस गाँव में सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध कराना । प्राकृतिक गैस उपलब्ध होने की स्थिति में उसका सर्वाधिक उपयोग करने की प्रणाली को विकसित करना । 
                                  5. गोबर खाद का कंपोस्ट खाद के लिए व्यापक व्यवस्था  करना ।
                                  6. सौर-ऊर्जा का सर्वाधिक प्रयोग करने की प्रणाली विकसित करना ताकि उसका उपयोग पानी पंप करने, खाना पकाने, वाष्पीकरण, अनाज सुखाने, ठंडा या गर्म करने में किया जा सके, जिससे लकड़ी, कोयला  आदि परंपरागत ईधनों को जलाने से रोका जा सके । इसी संदर्भ में पवन चक्की व जल प्रवाह शक्ति की उपयोगिता  की संभावना का पता लगाना व क्रियान्वयन करना, बॉयोडीजल स्थानीय स्रोतों से सम्पन्न करना, विविध विधि से ऊर्जा संतुलन होना।  
                                  7. प्रत्येक  घर के साथ शौचालय व सामूहिक शौचालय की व्यवस्था करना । शौचालय से बहते पानी को कृषि उद्यान में उपयोग करना । 
                                  8. सड़क मार्ग, रेल यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना व निकट की मंडियों व बाजारों को सड़कों से जोड़ना। 
                                  9. दूरभाष व दूर संचार सेवा, डाक घर, बैंक, चिकित्सा आदि की व्यवस्था करना । 
                                  10. ग्राम के लिए पाठशाला, चिकित्सा केन्द्र विनिमय-कोष के लिए भवन, गोदाम, बहुद्देशीय  भवन की व्यवस्था  करना जो न्याय सभा,  संबोधन सभा, सांस्कृतिक सभा, विवाह व मिलन सभा, प्रार्थना सभा, स्वागत सभा व छाया के अंदर खेलने के लिए उपयोगी रहेगा ।            (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 168-170)
                                  • समझदार परिवार समूह व परिवार सदस्य के कर्तव्य व दायित्व :-
                                  1. परिवार सदस्य, सदस्यों के साथ व्यवहार, आचरण, स्वास्थ्य, उत्पादन व उत्पादन संबंधी साधनों के संदर्भ में स्वयं प्रामाणिक रहते हुए, उनके अनुरूप सभी सदस्यों को होने के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे । 
                                  2. परिवार प्रधान, परिवार के सभी सदस्यों का मूल्यांकन करेंगे। परिवार प्रधान का मूल्यांकन, परिवार समूह सभा करेगा । आचरण के लिए मूल्यांकन का आधार स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष व दया पूर्ण कार्य रहेगा ।
                                  व्यवहार के मूल्यांकन का आधार मानव व नैसर्गिक संबंधों व उनमें निहित मूल्यों  की पहचान व निर्वाह से है । 
                                  3. परिवार में किसी से गलती होने की स्थिति में सुधारने का कर्त्तव्य परिवार के सभी सदस्यों का होगा । इसमें परिवार प्रधान उभय पक्षीय प्रेरक का कार्य करेगा । उभय पक्ष का तात्पर्य परिवार सदस्य व परिवार समूह सदस्य। 
                                  4. परिवार संबंधी समस्त जानकारी, जिसके  आधार पर परिवार के सदस्यों को शिक्षा-संस्कार, उत्पादन कार्य आदि प्रवृत्त व सभी तथ्यों को  एकत्रित कर परिवार समूह सभा व ग्राम सभा को उपलब्ध कराने का कर्त्तव्य परिवार प्रधान  का होगा । परिवार में यदि कोई व्यक्ति, किसी विशेष योग्यता , हस्तकला,   हस्त-शिल्प,   कृषि   व   अन्य   तकनीकी  या साहित्य-कला में माहिर है, तो यह जानकारी भी  ग्राम की संबंधित समिति को उपलब्ध कराएगा । 
                                  5. परस्पर परिवारों के विवादों  व उत्पन्न कठिनाइयों के निवारण का दायित्व उन परिवार के प्रधानों व परिवार समूह सभा का होगा । परिवार समूह सभा द्वारा विवाद हल न होने की स्थिति में ही विवाद ‘‘न्याय सुरक्षा समिति’’ के पास होगा। (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर:170-172)
                                  • न्याय पूर्ण व्यवहार (कर्तव्य व दायित्व) सर्व विदित रहेगा । (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर:176)
                                  • उत्पादन में न्याय :-
                                  1. प्रत्येक व्यक्ति द्वारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना। 
                                  2. प्रत्येक व्यक्ति में आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य कुशलता व निपुणता को स्थापित करना, जिसका दायित्व शिक्षा संस्कार समिति को होगा । 
                                  3. उत्पादन के लिए व्यक्ति में निहित क्षमता योग्यता के अनुरूप उसे प्रवृत्त करना जिसका दायित्व ‘‘उत्पादन कार्य सलाह समिति’’ का होगा ।
                                  4. उत्पादन के लिए आवश्यकीय साधनों को सुलभ करना इसका दायित्व ‘‘विनिमय कोष समिति’’ का होगा । 
                                  5. उत्पादन कार्य सामान्य आकाँक्षा (आहार, आवास, अलंकार) महत्वाकाँक्षा (दूर दर्शन, दूर गमन, दूर श्रवण) सम्बन्धी वस्तुओं के रूप में प्रमाणित होना । 
                                  6. ‘‘उत्पादन कार्य सलाह समिति’’ व ‘‘विनिमय कोष समिति’’ संयुक्त रूप में सम्पूर्ण ग्राम की उत्पादन सम्बन्धी तादाद, गुणवत्ता व श्रम मूल्यों का निर्धारण करेगी । (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 182)
                                  • ग्राम सुरक्षा :- 
                                  ग्राम सीमा में निहित भूमि का क्षेत्रफल और उस भू-भाग में निहित वन, खनिज, कृषि योग्य भूमि, बंजर भूमि, जल, जल- स्रोत, जल संरक्षण, भूमि संरक्षण, सामान्य सुविधा कार्य को सदुपयोग के आधार पर सुरक्षित करना ग्राम सुरक्षा का तात्पर्य है । 
                                  ग्राम से संबंधित वन क्षेत्र और उपयोगी भूमि और स्वामित्व की भूमि ग्राम सभा के अधिकार व कार्य क्षेत्र में रहेगी । यदि कोई वन क्षेत्र व भू-खण्ड किसी गाँव से सम्बद्घ न हो ऐसी स्थिति में उसको किसी न किसी गाँव से सम्बद्घ करने की व्यवस्था रहेगी। ऐसे ग्राम क्षेत्र की सुरक्षा का दायित्व भी ‘‘न्याय सुरक्षा समिति’’ का होगा। (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 184)
                                  • उत्पादन और विनिमय सुरक्षा :- 
                                  1. उत्पादन सुरक्षा :- गाँव में जितने भी प्रकार के उत्पादन सम्बन्धी मौलिकताएँ प्रमाणित होंगी उन सबके सुरक्षा का दायित्व न्याय सुरक्षा समिति का होगा । जैसे किसी उत्पादन कार्य में विशेष प्रकार की मौलिकता अथवा मौलिक प्रणाली अथवा मौलिक औजार, मौलिक विधि जो परंपरा में नहीं रही है, ऐसी स्थिति में उन सबको सुरक्षित किया जाएगा । इन सबसे सम्बन्धित मूल वाङ्ग्मय, डिजाइन, चित्रण, नक्शा, प्रक्रिया, प्रणाली और विधियों को लिपि बद्घ, सूत्र बद्घ कर सुरक्षित करेगा । आवश्यकता पड़ने पर लोकव्यापीकरण कराएगा व पुरस्कार की व्यवस्था करेगा । 
                                  2. औषधियों का अनुसंधान, वनस्पतियों का पहचान, ज्योतिष सम्बन्धी अनुसंधान, हस्तरेखा व सामुद्रकि शास्त्र सम्बन्धी साहित्य का अनुसंधान जो परंपरा में नहीं रहा है, उसको उपयोगिता के अनुसार उसकी सुरक्षा का दायित्व ‘‘सुरक्षा समिति’’ का होगा । 
                                  3. साहित्य, कला, संगीत, शिल्प में परंपरा की श्रेष्ठता का अनुसंधान, जो परंपरा में नहीं थी, ऐसी प्रस्तुति होने की स्थिति में उसका यथावत् संरक्षण करेगा । 
                                  4. खेलकूद, व्यायाम, अभ्यास में परंपरा से अधिक श्रेष्ठता और अनुसंधानों को संरक्षित करेगा । 
                                  5. उपरोक्त कार्य के लिए ‘‘न्याय सुरक्षा समिति’’ क्रम से उत्पादन कार्य सलाह समिति, ‘‘स्वास्थ्य संयम समिति’’ ‘‘शिक्षा संस्कार समिति’’ के सहयोग से मूल्यांकन प्रक्रिया सम्पादित करेगा । (अध्याय:8 , पृष्ठ नंबर: 184)
                                  • विनिमय में सुरक्षा :- 
                                  1. श्रम मूल्यों को उपयोगिता व कला मूल्य के आधार पर पहचानने की दिशा में ‘‘सुरक्षा समिति’’ निरंतर सजग रहेगी । एक श्रम मूल्य का आंकलन जो कुछ भी ग्राम स्वराज्य स्थापना दिवस में प्रमाणित रहेगा, उसकी गति के प्रति सतर्क रहेगा । निपुणता, कुशलता, कार्य गति, समय व साधन के कुल संयोग से श्रम का मूल्यांकन होगा। जैसे किसी एक वस्तु के निर्माण कार्य से, जिसका फलन स्थापना दिवस पर यदि एक रहा और बाद में यदि दो, तीन या चार हो गया, ऐसी अर्हता को ग्राम में सर्व सुलभ कराने का दायित्व ‘‘सुरक्षा समिति’’ का होगा । इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु के सम्बन्ध में उत्पादन गति में वृद्घि करने और विनिमय में उसकी समृद्घि के अर्थ को सार्थक बनने का दिशा में कार्य सुरक्षा समिति करेगा। 
                                  2. लाभ-हानि के सम्बन्ध में सतर्क रहना । (अनावश्यक लाभ और असहनीय हानि न होने के लिए सतर्क होना) उसके लिए सभी व्यवस्था प्रदान करना । 
                                  3. वस्तु की उत्पादन के आधार पर मूल्यांकन करने में सतर्क रहना व कार्य रूप  देना ।
                                  4. सभी विनिमय की संभावना को बनाए रखने में सतर्क रहना व प्रोत्साहित करना । (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 185)
                                  • स्वास्थ्य संयम कार्य व्यवस्था समिति
                                  ग्राम स्वास्थ्य समिति : कार्य एवं दायित्व
                                  ग्राम के सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं संयम की जिम्मेदारी ग्राम स्वास्थ्य समिति की होगी । यह समिति शिक्षा संस्कार समिति के साथ मिलकर कार्य करेगी । आवश्यकतानुसार  स्वास्थ्य संयम संबंधी पाठ्यक्रम और कार्यक्रम को तैयार कर शिक्षा में सम्मिलित कराएगी । ग्राम में चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था, योगासन, व्यायाम, अखाड़ा, खेल कूद व्यवस्था, स्कूल के अलावा खेल मैदान (स्टेडियम), सांस्कृतिक भवन क्लब आदि व्यवस्था का दायित्व ग्राम स्वास्थ्य समिति का होगा। समिति स्थानीय रूप से उपलब्ध जड़ी-बूटियों द्वारा औषधि बनाने के लिए आवश्यकीय व्यवस्था करेगी। इसके साथ ही पशु चिकित्सा केन्द्र की व्यवस्था का दायित्व भी स्वास्थ्य समिति का होगा । समिति ‘‘समन्वित चिकित्सा’’ (आयुर्वेद, एलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी, योग, प्राकृतिक, मानसिक) के उन्नयन की व्यवस्था करेगी। 
                                  सब ग्राम वासियों को स्वास्थ्य, व्यवहार, आचरण सम्बन्धी मूल्यों का मूल्यांकन, उपयोगिता व प्रयोजन मूलक पद्घति से समिति व्यवस्था प्रदान करेगी । अलंकार, प्रसाधन कार्य, शरीर स्वच्छता, महिलाओं व बच्चों को रोग-निरोधी उपाय, और सीमित व संतुलित परिवार के रूप में व्यवहृत होने के लिए व्यवस्था प्रदान करेगी । ऐसी जागृति के लिए व्यापक कार्यक्रम को समिति संचालित करेगी । सामान्य रूप में घटित अस्वस्थता को दूर करने के लिए, घरेलू चिकित्सा में प्रत्येक परिवार को अथवा प्रत्येक परिवार में एक व्यक्ति को प्रवीण बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाएँगे । घरेलू चिकित्सा से रोग शमन न होने की स्थिति में स्थानीय केन्द्र द्वारा चिकित्सा होगी । वहाँ राहत न मिलने की स्थिति में, निकटवर्ती चिकित्सा केन्द्र में पहुँचाने और चिकित्सा सुलभ कराने की व्यवस्था ग्राम स्वास्थ्य समिति करेगी । चिकित्सा केन्द्र, चिकित्सालय, मातृत्व केन्द्र, प्रसवोत्तर केन्द्र की स्थापना यथा सम्भव ग्राम समूह परिवार सभा द्वारा किये जावेंगे । (अध्याय: 8, पृष्ठ नंबर: 189)
                                  • कार्यक्रम सत्यापन घोषणा
                                  इस भाग में विभिन्न समितियों द्वारा किये जाने वाले कार्यक्रमों को समिति आधार पर सत्यापन किया जायेगा। 
                                  कार्यक्रम -1
                                  1. समितियों का गठन कार्यकर्ताओं की पहचान व घोषणा। 
                                  2. कार्यकर्ताओं में कार्य का बोध होने का सत्यापन ।
                                  3. कार्यकर्ताओं में दायित्व, कर्त्तव्य, उद्देश्य बोध प्रवृत्ति व निष्ठा का सत्यापन । (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर:193)
                                  • गाँव में अपरिचित व्यक्ति से परिचय प्राप्त करना । परिचय होने के स्थिति में सूचना ग्राम-परिवार-समूह-सभा सदस्यों को ऐसे व्यक्ति सहित प्रस्तुत करना यह हर ग्रामवासी का कर्त्तव्य होगा। (अध्याय:9, पृष्ठ नंबर:200)
                                  • हर परिवार का अपने-अपने निवास व दरवाजा सड़क को पवित्र एवं हरियाली शोभनीय रूप में बनाये रखना कर्त्तव्य । 
                                  आये हुए आगन्तुकों, अपरिचितों का परिचय प्राप्त करना कर्त्तव्य । 
                                  आगंतुक :- अपरिचित व्यक्ति की उपस्थिति अपेक्षाओं के अनुसार में पहचानना, मार्गदर्शन ।
                                  अभ्यागत :- अभ्युदयार्थ आमंत्रित नर-नारी का आगमन, सम्मान विधि से स्वागत करना ।
                                  अतिथि :- आतिथ्यार्थ आवाहित नर-नारियों का आगमन में सेवा, सम्मान विधि से स्वागत करना।
                                  आतिथ्य :- शिष्टता सहित अपने वस्तु व सेवा का अर्पण-समर्पण। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर:200)
                                  • जागृति सुलभता सहज घोषणा
                                  ♦ हर जागृत मानव परिवार में शरीर सहज आयु अनुसार श्रम व कार्य करना, यह स्वयं स्फूर्त होना, स्वत्व-स्वतंत्रता-अधिकार के आधार पर है। 
                                  ♦ शिशु काल तीन से पाँच वर्ष तक            - 3 से 5 वर्ष तक 
                                   कौमार्य अवस्था पाँच से बारह वर्ष तक   -  5 से 12 वर्ष तक
                                  युवावस्था बारह से बीस वर्ष तक            - 12 से 20 वर्ष तक 
                                  प्रौढ़ावस्था                                            -  20 से 30 वर्ष तक 
                                  परिपक्वावस्था                                     -  30 से 70 वर्ष 
                                  परिपक्वावस्था सत्तर वर्ष के अन्तर      -  70 वर्ष के अनन्तर
                                  वृद्घावस्था में निहित ज्ञान विवेक विज्ञान
                                  में भागीदारी में प्रखर होना शरीर में 
                                  क्रमिक शिथिलता
                                  परिपक्वावस्था                                   -  परिपक्वता की
                                  यही पीढ़ी से पीढ़ी उन्नत होने का            निरंतरता ही
                                  प्रेरणा स्रोत जागृत परंपरा के अर्थ            परंपरा
                                  में आयु आवश्यकता कर्त्तव्य घोषणा (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 201)
                                  • शिशु काल से जागृति यात्रा घोषणा
                                  1. शिशु कालीन लालन-पालन, पोषण-संरक्षण कार्यों का दायित्व व कर्त्तव्य अभिभावकों का है। 
                                  2. मानव सन्तान का लालन-पालन, पोषण-संरक्षण का कार्य अभिभावक का है । इस परंपरा में उत्सव, प्रसन्नता, खुशियाली है। शैशवकाल के अनंतर पड़ोसी बन्धुओं का मानव संस्कार पक्ष में दायित्व  रहेगा ।
                                  3. मानव में सभी सम्बन्धों मे सम्बोधन सभी परिवार-परंपरा में प्रचलित है । इसे अखण्डता सहज प्रयोजन सार्थकता के अर्थ में प्रमाणित करना जागृति है । (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर: 202)
                                  • 5. सम्बन्धों का सम्बोधन, शिष्टता का दिशा निर्देशन सम्बोधन के साथ प्रयोजन भाव-भंगिमा, मुद्रा, अंगहार विधि से सन्तानों को निर्देशित करना हर अभिभावकों, पड़ोसी बन्धु, मित्रजनों का कर्त्तव्य -दायित्व होता है। (अध्याय: 9, पृष्ठ नंबर:203)
                                  • 7. कौमार्य काल में ग्रामवासी, शिक्षा-संस्था व अभिभावकों का संयुक्त रूप में जीने के आधार पर सफल बनाने का कर्त्तव्य -दायित्व रहेगा । (अध्याय: 99, पृष्ठ नंबर:203)
                                  • 13. कम से कम सोलह-अठ्ठारह अधिक से अधिक बीस वर्ष की अवस्था में श्रम-साध्य कार्यों को करने का दायित्व-कर्तव्य होना आवश्यक है । (शिशु काल से जागृति यात्रा घोषणा) (अध्याय: , पृष्ठ नंबर:204)
                                  • न्याय-सुरक्षा सर्व सुलभ होने का घोषणा
                                  1. ग्राम में रहने वाले सभी परिवारों में न्याय-सुरक्षा सुलभता का परीक्षण, निरीक्षण कार्य समिति-सदस्य, परिवार-समूह-सभा के सदस्यों का संयुक्त कर्त्तव्य रहेगा । ग्राम मोहल्ला परिवारों में हुए न्याय सुरक्षा सुलभता सफलता का हर परिवार में-से-के लिए सत्यापन और शोध संभावना आवश्यकताओं पर कार्य गोष्ठी परिवार समूह सभा के द्वारा निर्णयों को लिपिबद्घ करना। (अध्याय:9 , पृष्ठ नंबर:211)
                                  • विश्व परिवार सभा में मौलिक अधिकार के रूप में बाकी अन्य नौ परिवार सभाओं में से सात परिवार सभाओं में पाँचों आयामों का कार्य गति अधिकार, दायित्व, कर्त्तव्य वर्णित है । यह सभी विश्व परिवार सभा में समाहित रहेगा ही । इसके साथ-साथ विश्व परिवार सभा के निकटवर्ती प्रधान राज्य सभा में प्रमाणित कार्यकलापों को पूर्णत: निरीक्षण परीक्षण पूर्वक अपने निष्कर्षों से अवगत कराने का अधिकार रहेगा । साथ में आवश्यकीय प्रस्ताव रखने का अधिकार भी रहेगा । जिस पर कार्य गोष्ठी पूर्वक स्वीकार करने का व्यवस्था रहेगा । (अध्याय: 10, पृष्ठ नंबर:224-225)
                                  • सेवक (सहयोगी ) की सार्थकता कर्त्तव्य निर्वाह से है। 
                                  स्वामी (साथी) की सार्थकता दायित्व निर्वाह करने में से है। (अध्याय: 12, पृष्ठ नंबर:250)
                                  • परिवार सम्बन्धों को पहचानना, दायित्व व कर्त्तव्य का निर्वाह करना मानवत्व है। (अध्याय: 12, पृष्ठ नंबर:300) 
                                  • अनुपातीय रूप में खनिज वनस्पतियों का सुरक्षित किया जाना मानवत्व है। दश सोपानीय परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, यथा विश्व परिवार सभा से परिवार सभा का कर्त्तव्य और दायित्व है।परिवार सभा से यह विश्व राज्य परिवार-सभा का कर्त्तव्य और दायित्व है। शिक्षा में इसका सार्थक अध्ययन आवश्यक है। यह मानवत्व है। (अध्याय: 12, पृष्ठ नंबर: 303)
                                  • मानवीय शिक्षा-संस्कार का दायित्व- कर्त्तव्य परिवार-सभा से विश्व परिवार-सभा में दायित्व- कर्त्तव्य रूप में निहित रहता है। इसका निर्वाह योग्य होना मानवीयता है। (अध्याय: 12, पृष्ठ नंबर: 303)
                                  • शिक्षा-संस्कार सर्वतोमुखी समाधानकारी ज्ञान-विवेक-विज्ञान सम्पन्न होने का प्रमाण मानवत्व है। यह परंपरा का कर्त्तव्य हर मानव संतान का अधिकार है। यह मानवत्व है।  (अध्याय: 12, पृष्ठ नंबर: 303)     

                                  स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                                  प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी 

                                  दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : जीवन विद्या – एक परिचय

                                  जीवन विद्या –एक परिचय (संस्करण: 2010, मुद्रण-2017)
                                  • दूसरा महत्वपूर्ण कारण है ‘धर्म संविधान’। सम्पूर्ण धरती के जितने भी धर्म संविधान हैं उसमें यह माना गया है आदमी जो मूलत: पापी, अज्ञानी, स्वार्थी होता है। जबकि वास्तविकता इससे भिन्न होती है। तो पापी को तारने के लिए, अज्ञानी को ज्ञानी बनाने के लिए, स्वार्थी को परमार्थी बनाने के लिए सभी धर्म संविधान अपने-अपने ढंग की युक्तियाँ, चरित्र, कर्तव्य, दायित्व और कर्मकाण्ड आदि कुछ भी बनाये है। यह भी एक बहुत स्पष्ट घटना है। इनका परिणाम क्या हुआ ? अभी तक कोई अज्ञानी ज्ञानी हो गया ऐसा मानव जाति ने पहचाना नहीं। स्वार्थी परमार्थी हो गया ये भी प्रमाण मिला नहीं। पापी पाप से मुक्त हो गया यह भी प्रमाण नहीं मिला। (अध्याय: 1, पृष्ठ नंबर:12)
                                  • मैं जीतने सम्बन्धों में जीता हूँ अपने दायित्व कर्तव्यों के साथ सार्थक जीता हूँ। (अध्याय: 1, पृष्ठ नंबर: 17)
                                  • संवेदनशीलता की भंगुरता मानव के जागृत होने के लिए घंटी है, मानव जागृति के लिए प्रेरणा है, मानव जागृति के लिए दिशा है। मेरे लिए, आपके लिए। ये कब उद्गमीट हो कब आप इसको सत्यापित करेंगे ये आप ही सोचेंगे। इसका दायित्व आपका ही है मेरे लिए सब आ गया। तो रोमांचित होना स्वाभाविक है। (अध्याय:4, पृष्ठ नंबर: 117)

                                  स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                                  प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी 

                                  दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : संवाद भाग १

                                  संवाद भाग - १ (संस्करण: प्रथम, मुद्रण: 2011) 
                                  • समझदारी से संपन्न होने के बाद यह आता है हम समाधान समृद्धि पूर्वक दायित्वों को भी पूरा कर सकते हैं। जीव चेतना में चले संसार को झेलने के बाद ही हम समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए स्वयं तैयार हो पाते हैं। उसको घायल बनाकर, काट कर कोई रास्ता नहीं है हम जब पूरा समझ जाते हैं हमको अपने में समृद्धि पूर्वक जीने की तमीज आ जाती है। उसमें परिवार जनों की भी संतुष्टि हो जाती है इसीलिए हम अच्छे कामों में लग सकते हैं। यह बात हर व्यक्ति के पकड़ में आ सकता है। मेरे पकड़ में यह आ सकता है तो बाकी लोगों की पकड़ में कैसे नहीं आएगा साधना? साधना काल में मैं विरक्ति विधि से ही रहा।  55 वर्ष की आयु में मैं समाधि संयम से उठने के बाद समृद्धि के कार्यक्रम बनाने में लगा आज की स्थिति में उससे सभी अच्छे ही हैं।(अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 3)
                                  • “होना” सभी अवस्थाओं का कर्तव्य है! अस्तित्व में हर इकाई नियति क्रम में अपने प्रगटन के अनुसार अपने “होने” को प्रगटन करने के लिए बाध्य है। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर: 9)
                                  • प्रश्नः पानी को अभी हम जीव चेतना में पहचानते हैं,क्या इसका मतलब है क्या हमको पानी का साक्षात्कार हुआ है?
                                  उत्तरः नहीं। जीव चेतना में पानी को मानव उसे अपने लिए उपयोग के अर्थ में ही पहचानता है। जीव चेतना में मानव पानी के साथ अपने सम्बन्ध, पानी के स्वभाव और धर्म को नहीं पहचानता। यही कारण है मानव जीव चेतना में जीते हुए पानी के साथ अपने कर्तव्य को नहीं निभा पाता। समझदारी के बाद मानव को पानी के साथ अपने कर्तव्य का बोध होता है। पानी को संरक्षित करने का दायित्व निर्वाह समझदारी के बाद ही होता है। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर: 52-53)
                                  • मैंने जो अध्ययन पूर्वक अनुभव किया वह मेरे अकेले के परिश्रम का फल नहीं है, यह समग्र मानव जाति के पुण्य का फल है यह मैंने स्वीकार लिया । इसलिए इसको मानव जाति को आपने का दायित्व मैंने स्वीकारा । मैंने जैसा अध्ययन जिया वैसा ही उसको शब्दों में रखने का कोशिश किया। शब्द परंपरा के हैं परिभाषा मैंने दी है। (अध्याय: , पृष्ठ नंबर:128) 
                                  • इस आधार पर अध्ययन के मुद्दे पर आप को इंगित करना चाहा “हर शब्द का अर्थ होता है।”  वह अर्थ शब्द नहीं है। अर्थ मानव को समझ में आता है दूसरे किसी को समझ में आएगा नहीं। पत्थर को हम बोलेंगे वह समझेगा नहीं। शब्द का प्रभाव पत्थर पर भी होता है। वनस्पतियों पर भी होता है। जानवरों पर भी होता है। मानव पर भी होता है मानव पर होने के बाद इसका अर्थ खोजने की इच्छा मानव में बनी हुई है। हर मानव में कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता प्रभावशील है। आज पैदा हुए बच्चे में भी और कल मर जाने वाले वृद्ध में भी यह प्रभाव शील है। कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता इसके आधार पर हर मानव में कहे गए शब्द के अर्थ तक पहुंचने की इच्छा बनी हुई है। यही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अध्ययन कराने का स्त्रोत है। सर्वप्रथम मानव में अध्ययन करने का स्रोत बना हे कि नहीं यह सोचना मेरा दायित्व था। उसमें पता लगा हर व्यक्ति में यह पूंजी रखी हुई है। क्या पूंजी? कुछ भी सुनेगा तो पूछेगा इसका मतलब क्या है इस और जाने का अधिकार सब में रखा है। सर्व मानव में रखी हुई इस कल्पनाशीलता कर्मस्वतंत्रता की पूंजी को समझ करके ही मैंने अध्ययन होने पर विश्वास किया।(अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 152)
                                  • मध्यस्थ क्रियाकलाप को मानव परंपरा के संदर्भ में देखें तो मानव परंपरा में शैशव, कौमार्य,यौवन, प्रौढ़  और वृद्ध अवस्थाओं के रूप में परिलक्षित है। मानव परंपरा में व्यवहार इसके साथ सुस्पष्ट होता है। हर मानव संतान जन्म से ही न्याय का याचक होता है, सत्य वक्ता होता है और सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक होता है। मानव संतान का अपने अभिभावको के साथ “व्यवहार” होता ही है। मानव संतान स्वभाविक रूप में अपने अभिभावको का अनुसरण अनुकरण करता ही है। इस व्यवहार का प्रयोजन है अभिभावको द्वारा संतान में न्याय प्रदाई क्षमता स्थापित हो, सत्य का बोध हो और सही कार्य व्यवहार करना सिखाया जाए। ऐसा करना अभिभावको का दायित्व है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए अभिभावकों का पहले से उस के योग्य बने रहना आवश्यक है। इस प्रकार हर मानव संबंध में दायित्वों को निर्वाह करने के लिए उसके लिए आवश्यक ज्ञान, विवेक, विज्ञान से संपन्न रहना आवश्यक है। (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 231)
                                  • इस अध्ययन की क्या वस्तु है?
                                  इस अनुसंधान के फलस्वरूप “मानव व्यवहार दर्शन” नामक पुस्तिका तैयार हुआ जिसको “शोध ग्रंथ” भी कह सकते हैं।  मानव व्यवहार दर्शन में मानव चेतना विधि से व्यवहार का क्या स्वरूप होता है? न्याय का क्या स्वरूप होता है? इसका वर्णन है। उसको अध्ययन कराते हैं। “मानव व्यवहार दर्शन” में मानव के कर्तव्य और दायित्व को तय किया। मानव का कर्तव्य और दायित्व तय होना ज़रूरी है या नहीं है इस पर आप ही निर्णय लीजिये। यह निर्णय लेना हर व्यक्ति का अधिकार है। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर: 257)

                                  स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                                  प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी 

                                  दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : संवाद भाग २

                                  संवाद भाग २ (संस्करण:2013)
                                  • पूरा इसको लिखने के बाद मैंने यह निर्णय किया जो इसको समझना चाहते हैं, उनके पास इसको जाना चाहिए। उससे समझने वालों को खोजना शुरु किया। धीरे धीरे लोगों की इसमें स्वीकृति और प्रयासों से शिक्षा के स्वरुप पर हमारा विश्वास हुआ। अखंड समाज होने के लिए इस शिक्षा का सारे विश्व में लोकव्यापीकरण होना होगा। एक गांव में हर परिवार यदि समाधान समृद्धि पूर्व जीता है तो यह व्यवस्था का एक प्रारूप बनता है। हर गांव में ऐसे सबको बनाने का दायित्व अध्यापकों का है हर गांव में अध्यापक होंगे ही हर गांव में जरुरत है या नहीं? गांव में सभी समझदार होने पर ग्राम स्वराज्य व्यवस्था की शुरुआत होती है। हर परिवार इस तरह सभ्यता और संस्कृति का धारक वाहक होता है, और परिवार और परिवार सभा में इस तरह पूरकता का अंतर संबंध है। हर नर नारी यदि समझदार होते हैं तो परिवार में ही न्याय होता है। (अध्याय: 1.2, पृष्ठ नंबर: 28)
                                  • इस तरह अपने पराये से मुक्त, भय मुक्त और समाधान समृद्धि पूर्वक जीने पर उपकार प्रवृत्ति का उदय होता है। समाधान समृद्धि से कम में कोई उपकार नहीं करेगा। अभी तक यह मानते रहे, किसी भूखे को खाना दे दिया तो उपकार कर दिया। किसी के पास कपड़ा नहीं है, उसको कपड़ा दे दिया, तो उपकार हो गया।
                                  यह गलत हो गया। यह उपकार नहीं है। यह कर्तव्य है। उसी तरह हमारा अड़ोस पड़ोस, गाँव, धरती के साथ कर्तव्य बना रहता है। कर्तव्य और उपकार में फर्क है। उपकार में दूसरे को अपने जैसा बनाने की बात होती है। जैसे हम समाधानित हैं, समृद्ध हैं वैसा ही दूसरे को बना देने से उपकार होता है। उसके पहले कोई उपकार नहीं होता यह मेरी घोषणा है। यह मेरा अनुभव है। उपकार करने के क्रम में ही मैं  यहाँ आपके सम्मुख प्रस्तुत हूँ। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर: 47)
                                  • उत्तेजित होकर समझा नहीं जा सकता। शांतिपूर्वक ही समझा जा सकता है। सत्ता सहज सर्वत्र विद्यमानता, सर्वत्र पारदर्शीयता और सर्वत्र पारगामीयता ज्ञान गोचर है। इन तीनों बातों पर “ध्यान” देना होता है। सबसे ज्यादा ज्ञान गोचर कुछ है तो वह यही है। इस भाषा का क्या अर्थ है उसका शोध करने का दायित्व आपका स्वयं का है। इसीलिए ध्यान देने के लिए कह रहे हैं। समझने के लिए ध्यान देना होता है, समझने के बाद ध्यान बना ही रहता है। ध्यान का मतलब विधिवत अध्ययन करना ही है। इसके अलावा पूर्णता पाने के लिए दूसरा रास्ता समाधि संयम पूर्वक अनुसंधान है जो अंधेरे में हाथ मारने जैसा है। मिल जाए तो ठीक है, नहीं तो और हाथ मारते रहो। भौतिकवादी विधि से यांत्रिकता हाथ लगती है यांत्रिकता गलत है ऐसा मैंने नहीं कहा है। यांत्रिकता गलत है ऐसा मैंने नहीं कहा है।  संज्ञानीयता यांत्रिकता की सीमा में नहीं है। (अध्याय: 2.1, पृष्ठ नंबर: 118) 
                                  • प्रश्न : क्या अनुभव के बाद, उदाहरण के लिए, शरीर को स्वस्थ रखने के बारे में जो मैं जानना चाहता हूँ, वह भी प्राप्त हो जाएगा?
                                  उत्तर : नहीं। वह कला है, जो ‘‘सीखने’’ की वस्तु है। कला अनुभव की वस्तु नहीं है। कला कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा करने के अर्थ में है। सीखने में प्रयोग करना पड़ेगा। रासायनिक भौतिक संसार संबंधी सभी ज्ञान अर्जन के लिए प्रयोग आवश्यक है। कर्म अभ्यास उसी का नाम है,जिसके अनेक आयाम हैं। उदाहरण के लिए गाय की सेवा करना कर्म अभ्यास है, कृषि करना कर्म अभ्यास है, औषधियों को पहचानना और बनाना कर्म अभ्यास है। अनुभव के बाद हर कला को जल्दी सीखा जा सकता है। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर:349)
                                  • प्रश्न : ‘‘संयम काल में आप के सम्मुख प्रकृति प्रस्तुत हुई’’ ऐसा आपसे सुनने पर ऐसा लगता है कि प्रकृति में ‘‘कर्ता भाव’’ है? 
                                  उत्तर : प्रकृति में कार्य भाव है। कर्ता भाव के लिए चेतना चाहिए। चेतना जीव प्रकृति और मानव प्रकृति में है। जीव प्रकृति कार्य भाव के साथ कर्तव्य भाव में रह गया। मानव प्रकृति में कार्य भाव, कर्तव्य भाव और फल परिणाम भाव ये सभी हैं। जैसा मैंने प्रस्तुत किया है वैसे ही प्रकृति मेरे सम्मुख प्रकट हुई। मैंने उसमें कोई जोड़ घटाव नहीं किया है। उसी को आपको अध्ययन पूर्वक साक्षात्कार करना है, बोध करना है, अनुभव करना है। अनुभव होता है तो प्रमाण होगा। प्रमाण का स्वीकृति बुद्धि में होता है। प्रमाण की स्वीकृति के बाद प्रमाणित ‘‘करने’’ के लिए चिन्तन होता है, चित्रण होता है, तुलन होता है। न्याय, धर्म, सत्य के तुलन के साथ यदि हमारा मन जुड़ जाता है, तो कार्य व्यवहार में मूल्य मूल्यांकन विधि से हम जियेंगे ही। 
                                  परंपरागत साधना विधि से मैंने प्रकृति को सीधे सीधे देख लिया। देखे हएु को मैंने अक्षर बद्ध कर दिया। वह आपके लिए अध्ययन की वस्तु है। अब ‘अध्ययन’ ही ‘साधना’ है। (अध्याय:, पृष्ठ नंबर: 357)

                                    स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
                                    प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी