Thursday, 18 January 2018

दायित्व और कर्तव्य/ कर्त्तव्य

परिभाषा: 
दायित्व   
  • संबंधों की पहचान सहित मूल्यों का निर्वाह।
  • परस्पर व्यवहार, व्यवसाय एवं व्यवस्थात्मक संबंधों में निहित मूल्यानुभूति सहित शिष्टतापूर्ण निर्वाह।
  • सम्बन्धों में ज़िम्मेदारी स्वीकारना, उत्तरदायित्व का वहन, निष्ठा का बोध।  (स्रोत- परिभाषा संहिता, संस्करण : 2012, मुद्रण: 14 जनवरी 2016, पेज नंबर: 89)  
कर्त्तव्य  
  • उत्पादन कार्य में प्रमाणित होने की प्रक्रिया  और सेवा कार्य सहित उत्पादित वस्तुओं का सदुपयोग प्रायोजित करना।
  • प्रत्येक स्तर में प्राप्त संबंधों एवं सपर्कों और उनमें निहित मूल्य निर्वाह।
  • दायित्व का निर्वाह, पूरा करना।  (स्रोत- परिभाषा संहिता: संस्करण: 2012 : मुद्रण: 2016, पृष्ठ नंबर:55)
अन्य संदर्भ परिभाषा संहिता से (संस्करण : 2012 मुद्रण: 14 जनवरी 2016)
  • कर्त्तव्य बुद्धि - उत्पादन कार्य में कुशलता निपुणता को नियोजित करने की विधि सहज प्रवृत्ति। (पृष्ठ नंबर:55)
  • कर्त्तव्यवादी  - उत्पादन संबंधी व्यवहार को पूरा करने में कटिबद्धता। (पृष्ठ नंबर: 55)
  • कर्त्तव्य निष्ठा
- ''त्व'' सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी।
- समृद्धि सम्पन्नता का प्रमाण।
- मानवीयतापूर्ण शिक्षा, संस्कार, आचरण, व्यवहार में निष्ठा। स्वतंत्रता स्वराज्य में निष्ठा।
- उत्तरदायित्व का वहन। (पृष्ठ नंबर: 55)
(दायित्व और कर्तव्य पर बाबा जी के साथ राकेश भैया जी का संवाद )

(दायित्व और कर्त्तव्य को लेकर मध्यस्थ दर्शन वाङ्ग्मय में आये सन्दर्भों को निम्न क्रम से संकलित किया गया है।  नीचे दिये गए प्रत्येक लिंक पर जाकर आप संकलन देख सकते हैं।)


  1. मानव व्यवहार दर्शन 
  2. मानव कर्म दर्शन 
  3. मानव अभ्यास दर्शन
  4. मानव अनुभव दर्शन
  5. समाधानात्मक भौतिकवाद
  6. व्यवहारात्मक जनवाद
  7. अनुभवात्मक अध्यात्मवाद
  8. व्यवहारवादी समाजशास्त्र 
  9. आवर्तनशील अर्थशास्त्र
  10. मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान
  11. मानवीय संविधान सूत्र व्याख्या
  12. जीवन विद्या –एक परिचय 
  13. विकल्प  
  14. जीवन विद्या- अध्ययन बिन्दु  
  15. संवाद- 1  
  16. संवाद-2
नोट- (सभी संदर्भ संबन्धित वाङ्ग्मयों के PDF से लिए गए हैं कोई भी अंतर होने पर कृपया मूल वाङ्ग्मय को ही सही माना जाए। ) 


स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज

दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : जीवन विद्या -अध्ययन बिन्दु

जीवन विद्या- अध्ययन बिन्दु (अध्याय:, संस्करण:2011, मुद्रण:2016 )
  • साथी-सहयोगी (संबंध) -  दायित्व-कर्तव्य (क्रिया) (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 21)
  • ममता - स्वयं में, से,के लिए प्रतिरूपता सहज स्वीकृति, उत्सव निरंतरता 
उदारता – प्रतिफलापेक्षा विहीन कर्तव्य दायित्व वहन, तन मन धन अर्पण (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 23)
  • साथी सहयोगी के साथ विश्वास  निर्वाह की निरंतरता
स्नेह, ममता, दया, सहज निष्ठा, उदारता, दायित्व का कर्तव्य सहित वस्तु व सेवा प्रदान करने के रूप में। (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 24)
  • अस्तित्वमूलक मानव केंद्रित चिंतन पूर्वक सहअस्तित्ववादी व्यवस्था विधि से मोहल्ला, ग्राम, परिवार सभा 
दस परिवार समूह सभा में से निर्वाचित प्रतिनिधि
दस जन प्रतिनिधि परिवार सभा से मनोनीत पाँच समितियाँ, यथा -
i) मानवीय शिक्षा-संस्कार समिति
ii) मानवीय न्याय-सुरक्षा समिति
iii) मानवीय उत्पादन-कार्य समिति
iv) मानवीय विनिमय-कोष समिति
v) मानवीय स्वास्थ्य-संयम समिति
मोहल्ला, ग्राम परिवार सभा सहज प्रयोजनों के अर्थ में - और दस परिवार समूह सहज आवश्यकता के अनुसार समिति में कार्यरत व्यक्ति का दायित्व निश्चयन रहेगा (अध्याय: , पृष्ठ नंबर: 24, 30, 31, 34, 35, 36)

स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी 

Thursday, 11 January 2018

दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव व्यवहार दर्शन

मानव व्यवहार दर्शन (संस्करण: 2011, मुद्रण- 2015)
  • सामाजिकता का निर्वाह कर्त्तव्य एवं निष्ठा से है, जिससे अखंडता- सार्वभौमता रूप में सामाजिकता का विकास तथा अन्यथा से ह्रास है.
निर्वाह: - समाधान, समृद्धि सहित उपयोग, सदुपयोग व प्रयोजनों को प्रमाणित करना अथवा परस्पर पूरक सिद्ध होना।
कर्त्तव्य: - मानवीयता पूर्ण विधि से करने योग्य कार्य-व्यवहार एवं मूल्य-निर्वाह क्रिया ही कर्त्तव्य है.
निष्ठा: - कर्त्तव्य एवं दायित्व के निर्वाह की निरंतरता ही निष्ठा है. (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर:20)
  • मानव द्वारा प्राप्त कर्तव्यों का, सुख के पोषणवादी रीति व नीति का पालन करना ही धर्म नीति है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर: 53) 
  • परिवार, समाज तथा व्यवस्था दत्त भेद से कर्त्तव्य को स्वीकारने तथा इसे निष्ठा, नियम एवं सत्यतापूर्वक पालन करने पर ही मानव में विशेष प्रतिभा का विकास हर स्तर पर है अर्थात पारिवारिक, सामाजिक तथा व्यवस्था के साथ सफलताएं इसके विपरीत स्थिति में प्राप्त प्रतिभा तथा सफलता भी निरस्त होती है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर: 53)
  • कर्ता द्वारा कार्य का संपादन आवश्यकता की पूर्ति हेतु अथवा कर्त्तव्य के पालन हेतु किया जाता है. (अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर: 56)
  • मानव द्वारा मानवीयता के प्रति कर्त्तव्य-बुद्धि को अपनाए बिना जागृति, जागृति के बिना समाधान- समृद्धि, समाधान-समृद्धि के बिना मानवत्व- समत्व,मानवत्व- समत्व के बिना पूर्ण फल, पूर्ण फल के बिना परंपरा में स्फुरण या प्रेरणा और स्फुरण या प्रेरणा के बिना कर्त्तव्य बुद्धि प्राप्त नहीं होती है. (अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर: 57)
  • मानवीयतापूर्ण बुद्धि द्वारा निश्चित कर्त्तव्य के परिपालन से मानव सफल एवं सुखी हुआ है. (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 57)
  • कर्त्तव्य की ओर अग्रेषित संवेग को स्फुरण तथा प्रेरणा एवं विवशता पूर्वक प्राप्त बौद्धिक प्रयास एवं शारीरिक चेष्टा को प्रतिक्रांति की संज्ञा है.  श्रेष्ठता की ओर  क्रांति और नेष्ठता की ओर प्रतिक्रांति संज्ञा है.(अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 60)
  • मानव की परस्परता में जो संपर्क एवं सम्बन्ध है वह निर्वाह के लिए, विकास (जागृति) के लिए, तथा भोग के भेद से है। जागृति के लिए जो संपर्क एवं सम्बन्ध का प्रयास है, वह सामाजिकता के लिए है.  निर्वाह के लिए जो संपर्क एवं सम्बन्ध का प्रयास है, वह कर्त्तव्य पालन करते हुए वर्तमान को संतुलित रखने के लिए और भोगेच्छा से जो संपर्क एवं सम्बन्ध का प्रयास है, वह मात्र इन्द्रिय लिप्सा एवं शोषण के कारण है. जिससे असंतुलन और समस्या वश पीड़ा होता है. (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर: 61)
  • जागृति के लिए किये गए व्यवहार को पुरुषार्थ, निर्वाह के लिए किये गए प्रयास को कर्त्तव्य तथा भोग के लिए किये गए व्यवहार को विवशता के नाम से जाना गया है. (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर: 61)
  • कर्त्तव्य व आवश्यकता का भाव मानव में है.
कर्त्तव्य: - संबंधों की पहचान सहित निर्वाह क्रिया, जिससे निष्ठा का बोध होता है.
दायित्व: - संबंधों की पहचान सहित मूल्यों का निर्वाह सहित मूल्यांकन क्रिया जिससे तृप्ति का बोध होता है. (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 61)
  • कर्त्तव्य की पूर्ति है, भोग रुपी आवश्यकता की पूर्ति नहीं है. (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:61)
  • कर्त्तव्य की पूर्ति इसलिए संभव है कि वह निश्चित व सीमित है. (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर:61)
  • भोग रुपी आवश्यकताएं (सुविधा संग्रह) की पूर्ति इसलिए संभव नहीं है क्योंकि वह अनिश्चित व असीमित है. 
यही कारण है कि कर्त्तव्यवादी प्रगति शान्ति की ओर तथा भोगवादी प्रवृत्ति अशांति की ओर उन्मुख है. (अध्याय:7 , पृष्ठ नंबर: 62)
  • समस्त कर्त्तव्य सम्बन्ध एवं संपर्क की सीमा तक ही हैं. (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर: 62)
  • कर्त्तव्य की पूर्ति के बिना मानव का जीवन सफल नहीं है. (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:62)
  • सह-अस्तित्व में विरोध का विजय अथवा शमन, विरोध शमन से जागृति, जागृति से सहज जीवन, सहज जीवन से स्वर्गीयता, स्वर्गीयता से सह-अस्तित्व में अनुभव, अनुभव से कर्त्तव्य -निष्ठा, कर्त्तव्य निष्ठा से सफलता, सफलता से विज्ञान एवं विवेक, विज्ञान एवं विवेक से स्वयंस्फूर्त जीवन, और स्वयंस्फूर्त जीवन से ही सह-अस्तित्व प्रमाणित होता है. (अध्याय:12 , पृष्ठ नंबर: 86)
  • जन्म-सिद्ध अधिकार, प्रदत्त अधिकार तथा समयोचित अधिकार भेद से मानव कर्त्तव्य-पालन के लिए अधिकार प्राप्त करता है.  (अध्याय:14 , पृष्ठ नंबर: 92)
  • प्रदत्त अधिकार कुटुंब, समाज, तथा व्यवस्था-दत्त भेद से हैं. 
कुटुंब-दत्त अधिकार कुटुंब में कर्तव्यों-दायित्वों के पालन, चरित्र-संरक्षण, प्राण-पोषण व अर्थोपार्जन के लक्ष्य भेद से है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 92-93)
समाज-दत्त अधिकार समाज-दत्त कर्तव्यों के पालन, गरिमापूर्ण व्यक्तित्व एवं सार्थक शास्त्र प्रचार तथा सिद्धांतों के शोध के आशय भेद से है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 93)
व्यवस्था-दत्त अधिकार व्यवस्था-दत्त कर्तव्यों के पालन, शास्त्र सिद्धांतों का कुशलता, निपुणता, पांडित्य पूर्वक अध्ययन, व्यवहार व कर्माभ्यास में परिपूर्णता और अधिकार पूर्ण व्यक्तित्व पर निर्भर करता है, जिससे सफलता है, अन्यथा में असफलता है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 93)
  • प्राप्त कर्त्तव्य वांछित, प्रेरित व सूचित भेद से हैं.  (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 94)
  • प्राप्त कर्त्तव्य का निश्चयपूर्वक किया गया मनन, चिंतन, विचार, चेष्टा, प्रयोग, प्रयास, व्यवसाय, व अनुसंधान क्रिया ही ‘निष्ठा’ है.  अन्य शब्दों में निश्चित क्रिया की पूर्णता के लिए पाए जाने वाले वैचारिक व शारीरिक योग की निरंतरता ही निष्ठा है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 94)
  • प्रतिक्रांति से भ्रान्ति तथा कर्त्तव्य से शान्ति है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 103)
  • न्याय से पद, उदारता से धन, दया पूर्वक बल, सच्चरित्रता से रूप, विज्ञान व विवेक से बुद्धि, निष्ठा से अध्ययन, कर्त्तव्य से सेवा, संतोष से तप, स्नेह से लोक, प्रेम से लोकेश, आज्ञा पालन से रोगी एवं बालक की सफलता एवं कल्याण सिद्ध है. (अध्याय: 14, पृष्ठ नंबर: 103)
  • अवसरवादी मानव प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ से ग्रसित तथा व्यवहार में दिखावा करते हैं.  जिनसे असंतुष्टि, व्याकुलता, व अनिश्चयता की पीड़ा ही उपलब्ध होती है, क्योंकि अज्ञान की मान्यताएं शीघ्र परिवर्तनशील हैं.  अवसरवादी मानव के कर्त्तव्य का लक्ष्य भी सुख है, पर वह इस प्रणाली से सफल नहीं होता. (अध्याय: 15, पृष्ठ नंबर: 104)
  • भ्रान्ति के विपरीत में निर्भ्रमता है.  निर्भ्रमता ही न्याय का कारण है.  निर्भ्रमता के फलस्वरूप समाधान, मनोबल, सुख, कर्त्तव्य में निष्ठा, स्नेह, अनुराग, शान्ति, संतोष, प्रेम, सहजता, सरलता, उत्साह, आह्लाद तथा आनंद सहज उपलब्धि है.  यह सब अनन्य रूप में संबद्ध हैं। 
समाधान: - क्यों, कैसे की पूर्ति अथवा क्रिया से अधिक ज्ञान की ‘समाधान’ संज्ञा है.
मनोबल: - केंद्रीकृत मन:स्थिति अर्थात समझदारी को प्रमाणित करने में मनोयोग स्थिति की     ‘मनोबल’ संज्ञा है.
सुख: - न्याय में दृढ़ता की सुख संज्ञा है.
कर्त्तव्य में निष्ठा: - उत्तरदायित्व का वहन ही कर्त्तव्य में निष्ठा है.
स्नेह: - न्याय, धर्म एवं सत्य की निर्विरोधता ही ‘स्नेह’ है.
अनुराग: - निर्भ्रमता से प्राप्त आप्लावन की ‘अनुराग’ संज्ञा है.
शान्ति: - वेदना विहीन जागृत वैचारिक स्थिति.
संतोष: - अभाव का अभाव (समृद्धि, समाधान) अथवा अभाव से अभावित चित्रण विचार सम्पन्नता.
प्रेम: - दिव्य-मानव, देव मानव सान्निध्यता, सामीप्यता, सारूप्यता तथा सालोक्यता प्राप्त करने हेतु अंतिम संकल्प की ‘प्रेम’ संज्ञा है.  दया, कृपा, करुणा की संयुक्त अभिव्यक्ति ही प्रेम है.
सहजता: - जागृति सहज मानसिक, वैचारिक, चिंतन स्थिति में संगीत है, उसकी ‘सहजता’ संज्ञा है.
               :- रहस्यता से रहित जो मानसिक स्थिति है उसकी ‘सहजता’ संज्ञा है।
सरलता: - जागृति सहज स्वभावपूर्ण व्यवहार की ‘सरलता’ संज्ञा है.  कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में नियमों को वचन पूर्वक प्रमाणित करना.
आनंद: - सह-अस्तित्व में अनुभूति की आनंद संज्ञा है.
पूर्णता: - सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्नता ही ‘पूर्णता’ है.
निर्भ्रमता: - न्याय, धर्म, एवं सत्यतापूर्ण व्यवहार, भाषा, भाव, बोध, संकल्प व अनुभूति की ‘निर्भ्रमता’ संज्ञा है.
* विचार का प्रतिरूप ही भाव, भाषा, एवं व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है.
* न्याय, धर्म, एवं सत्यानुभूति योग्य क्षमता से व्यवहार, भाव, व भाषा संयमित और परिमार्जित होता है. (अध्याय:15 , पृष्ठ नंबर:111-112)
  • पवित्र विचार ही मनोबल( अर्थात पवित्र विचारों का व्यवहार में प्रमाणित होना), मनोबल ही कर्त्तव्य निष्ठा, कर्त्तव्य निष्ठा ही समाधान-समृद्धि, समाधान-समृद्धि ही सह-अस्तित्व तथा सह-अस्तित्व ही पवित्र विचार है, जिससे न्यायवादी व्यवहार प्रतिष्ठित और अवसरवादी व्यवहार अप्रतिष्ठित है. (अध्याय:15 , पृष्ठ नंबर:112)
  • संबंध एवं संपर्क के विषय में एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है। इन दोनों में दायित्व का निर्वाह आदान प्रदान के आधार पर होता है परंतु दोनों में भेद यह है कि संबंध की परस्परता में प्रत्याशाएं पूर्व निश्चित रहती है तथा इसके अनुरूप ही आदान व प्रदान होता है। संपर्क में आदान एवं प्रदान परस्परता में पूर्व निश्चित नहीं रहता। इसलिए संपर्क में आदान व प्रदान क्रियाएँ एच्छिक रूप में अवस्थित है। संबंध दायित्व प्रधान एवं संपर्क कर्तव्य प्रधान है। संपर्क में परस्परता में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष दयापूर्ण कार्य व्यवहार की अपेक्षा रहती है। मानव अथवा इससे विकसित तक ही संबंध है जबकि समस्त इकाइयाँ परस्पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क में है ही। (अध्याय: 16, पृष्ठ नंबर:116)     
  • सम्पूर्ण  संबंधों के मूल में मूल्यांकन आवश्यक है। मूल्यांकन मौलिकता का ही  होता है। मौलिकता के आधार पर ही कर्तव्य का निर्धारण तथा निर्वाह होताहै। दायित्वों का निर्वाह जिस इकाई के प्रति होना है उस इकाई के प्रति न होने से उसका पोषण अवरूद्ध होता है अथवा शोषण है साथ ही जिस इकाई द्वारा दायित्व का निर्वाह  होना है उसे, न होने की स्थिति में प्रतिफल के रूप में अविश्वास ही मिलेगा । अविश्वास ही द्रोह, विद्रोह तथा आतंक का कारण बनता है जो शोषण की ओर प्रेरित करता है।  (अध्याय:16 , पृष्ठ नंबर:117)
  • मानव के लिए पोषण युक्त संपर्कात्मक एवं संबंधात्मक विचार एवं तदनुसार व्यवहार से ही मानवीयता की स्थापना संभव है, अन्यथा, शोषण और अमानवीयता की ही पीड़ा है ।
शोषण एवं पोषण कुल तीन ही प्रकार से होता है :-
* दायित्व का निर्वाह करने से पोषण अन्यथा शोषण है। प्राप्त दायित्वों में नियोजित होने वाली सेवा को नियोजित न करते हुए मात्र स्वार्थ के लिए जो प्रयत्न है एवं दायित्व को अस्वीकारने की जो प्रवृत्ति है, उसको दायित्व का निर्वाह न करना कहते हैं।
* दायित्व को निर्वाह न करने पर स्वयम् का विकास, जिसके साथ निर्वाह करना है, उसका विकास तथा इन दोनों के विकास से जिन तीसरे पक्ष का विकास हो सकता है वह सभी अवरुद्घ हो जाते हैं।  विकास को अवरुद्ध करना ही शोषण है।
* दायित्व का अपव्यय अथवा सद्व्यय करना :- दायित्व के निर्वाह में आलस्य एवं प्रमाद-पूर्वक प्राप्त प्रतिभा और वर्चस्व  का न्यून मूल्य में उपयोग करना ही दायित्व का अपव्यय है।
* दायित्व का विरोध करना अथवा पालन करना:- मौलिक मान्यताएँ, जो संबंध एवं संपर्क में निहित हैं उसके विरोध में ह्रास के योग्य मान्यता को प्रचारित एवं प्रोत्साहित करना ही दायित्व का विरोध करना है । दायित्वों का विरोध अभिमानवश या अज्ञानवश किया जाता है।(अध्याय: 16, पृष्ठ नंबर:117-118)
          • माता पिता की पहचान हर मानव संतान किया ही करता है.  शिशुकाल की स्वस्थता का यह पहचान भी है।  अतएव माता-पिता जिन मूल्यों के साथ प्रस्तुत होते हैं, वह ममता और वात्सल्य है.  ममता मूल्य के रूप में पोषण प्रधान क्रिया होने के रूप में या कर्त्तव्य होने के रूप में स्पष्ट है.  इसलिए माँ की भूमिका ममता प्रधान वात्सल्य के रूप में समझ आती है.  ममता मूल्य के धारक-वाहक ही स्वयं में माँ है तथा पिता वात्सल्य प्रधान ममता के रूप में समझ में आता है। (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:122)
          • माता एवं पिता हर संतान से उनकी अवस्था के अनुरूप प्रत्याशा रखते हैं.  उदाहरणार्थ शैशव-अवस्था में केवल बालक का लालन-पालन ही माता-पिता का पुत्र-पुत्री के प्रति कर्त्तव्य एवं उद्देश्य होता है तथा इस कर्त्तव्य के निर्वाह के फलस्वरूप वह मात्र शिशु की मुस्कुराहट की ही अपेक्षा रखते हैं।  कौमार्यावस्था में किंचित शिक्षा एवं भाषा का परिमार्जन चाहते हैं.  इसी अवस्था में आज्ञापालन प्रवृत्ति, अनुशासन, शुचिता, संस्कृति का अनुकरण, परंपरा के गौरव का पालन करने की अपेक्षा होती है। कौमार्यावस्था के अनंतर संतान में उत्पादन सहित उत्तम सभ्यता की कामना करते हैं.  सभ्यता के मूल में हर माता-पिता अपने संतान से कृतज्ञता (गौरवता) पाना चाहते हैं तथा केवल इस एक अमूल्य निधि को पाने के लिए तन, मन एवं धन से संतान की सेवा किया करते हैं.  संतान के लिए हर माता-पिता अपने मन में अभ्युदय, समृद्धि की ही कामना रखते हैं, इन सबके मूल में कृतज्ञता की वांछा रहती है.  जो संतान माता-पिता एवं गुरु के कृतज्ञ नहीं होते हैं, उनका कृतघ्न होना अनिवार्य है, जिससे वह स्वयं क्लेश परंपरा को प्राप्त करते हैं और दूसरों को भी क्लेशित करते हैं। (अध्याय:16-(i) , पृष्ठ नंबर: 122)
          • साथी-सहयोगी सम्बन्ध: -एक दूसरे के लिए पूरक विधि से सार्थक होना पाया जाता है.  यह सम्बन्ध सहयोगी की कर्त्तव्य निष्ठा से व साथी के दायित्व निष्ठा से सार्थक होना पाया जाता है.  यह परस्पर पूरक सम्बन्ध है.  इनमे मूल मुद्दा दायित्व को निर्वाह करना, कर्तव्यों को पूरा करने में ही परस्परता में संगीत होना पाया जाता है.  यह जागृत परंपरा की देन है.  इसमें मुख्यतः विश्वास मूल्य रहता ही है.  गौरव, सम्मान, स्नेह मूल्य अर्पित रहता है.  सहयोगी के प्रति सम्मान मूल्य विश्वास के साथ अर्पित रहता है। इस विधि से मंगल मैत्री होना स्वाभाविक है. (अध्याय:16-(i) , पृष्ठ नंबर:126)
          • विकास के लिए जो मान्यताएं हैं वे अंतरंग में अभ्यास एवं जागृति के लिए प्रेरणा स्त्रोत तथा बहिरंग में समाजिकता तथा व्यवसाय के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। सामाजिक दायित्व का प्रमाण हर समझदार परिवार में समाधान-समृद्धि पूर्वक जीने में प्रमाणित होता है.  यह क्रमशः सम्पूर्ण मानव का एक इकाई के रूप में पहचान पाना बन जाता है.  पहचानने के फलन में निर्वाह करना बनता ही है.  ऐसी निर्वाह विधि स्वाभाविक रूप में मूल्यों से अनुबंधित रहता ही है। यही व्यवस्था में भागीदारी की स्थिति में परिवार-व्यवस्था से अंतर्राष्ट्रीय या विश्व-परिवार व्यवस्था तक स्थितियों में भागीदारी की आवश्यकता रहता ही है।  ऐसे भागीदारी के क्रम में मानव अपने में, से समझदारी विधि से प्रस्तुत होना बनता है।  समझदारी विधि से ही हर नर-नारी व्यवस्था में भागीदारी करना सुलभ सहज और आवश्यक है।  इसी क्रम से मानव लक्ष्य प्रमाणित होते हैं जो समाधान-समृद्धि-अभय-सह-अस्तित्व के रूप में पहचाना गया है, इसे प्रमाणित करना ही मानवीयता पूर्ण व्यवस्था है। (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर: 126-127)
          • सहयोगी कर्त्तव्य पूर्वक सुखी होता है. (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:128)
          • साथी दायित्व पूर्वक सुखी होता है. (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:128)
          • सहयोगी का जीवन कर्त्तव्य को निर्वाह करने से सफल है. (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:129)
          • साथी का जीवन दायित्वों को निर्वाह करने से सफल है. (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:129)
          • भाई या बहन का जीवन एक दूसरे के अनन्य जागृति की आशा से तथा स्नेह सहित दायित्व वहन करने से है. (अध्याय: 16-(i), पृष्ठ नंबर:129)
          • अध्ययन को सफल बनाने का दायित्व अध्यापक, अध्यापन, तथा शिक्षा-वस्तु और प्रणाली पर है, क्योंकि यह चारों परस्पर पूरक हैं। (अध्याय: 16-(ii), पृष्ठ नंबर: 136)
          • अतः परस्परता में जो व्यतिरेक है उसके उन्मूलन के लिए तथा परस्परता में विश्वास को उत्पन्न करने के लिए, जो जागृति के लिए प्रथम सोपान है, मानवीयतापूर्ण आचरण व सामाजिकता, न्यायपूर्ण व्यवस्था, सत्य प्रतिष्ठित शिक्षा, एवं इसमें विश्वासपूर्वक व्यक्तिगत निष्ठा उत्पन्न करना सबका सम्मिलित दायित्व सिद्ध होता है। (अध्याय: 17, पृष्ठ नंबर: 148)
          • भौतिक, रासायनिक वस्तु व सेवा में आसक्ति से संग्रह, लोभ व कामुकता; प्राण तत्व में आसक्ति से द्वेष, मोह, मद, क्रोध, दर्प; जीवत्व (जीने की आशा) में आसक्ति से अभिमान, अज्ञान, ईर्ष्या, और मत्सर यह अजागृत मानव की प्रवृत्तियां हैं।  सत्य के प्रति निष्ठा से कर्त्तव्य में दृढ़ता, असंग्रह, सरलता तथा अभयता व प्रेमपूर्ण मूल प्रवृत्तियां सक्रिय होती हैं. (अध्याय:17 , पृष्ठ नंबर:152)
          • व्यवहार का ईष्ट-अनिष्ट, उत्थान-पतन, विकास-ह्रास, उचित-अनुचित, लाभ-हानि, न्याय-अन्याय, पुण्य-पाप, विधि-निषेध, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य, समाधान-समस्या, आवश्यक-अनावश्यक, भेद-प्रभेद से तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है.  व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चैतन्य पक्ष की प्रतिभा का ही मूल्यांकन है, क्योंकि चैतन्य इकाई द्वारा ही जड़ पक्ष का चालन, संचालन, प्रतिचालन, प्रतिपालन, परिपालन, परिपोषण, मूल्यांकन, परिवर्धन व परिवर्तन की क्रिया का संपादन हुआ है, जो उसी की इच्छा व विचार का पूर्व रूप है. (अध्याय: 18, पृष्ठ नंबर:157)
          • कर्त्तव्य: - प्रत्येक स्तर पर प्राप्त सम्बन्ध एवं संपर्क के मध्य निहित मानवीयतापूर्ण आशा व प्रत्याशा पूर्वक व्यवहार। सम्बन्धों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह।  (अध्याय: 18, पृष्ठ नंबर: 158)
          • सुसंस्कार के लिए वातावरण एवं अध्ययन ही प्रधान कारण है एवं सहायक भी है.  इसको सुरक्षित तथा परिमार्जित करने का दायित्व मनीषियों पर निर्भर है.  न्यायपूर्ण व्यवहार तथा अखंड सामाजिकता की प्रेरणा सुसंस्कारों के वर्धन में सहायक है। (अध्याय: 18, पृष्ठ नंबर: 160)
          • साथी, दायित्व
          (११) साथी: - सर्वतोमुखी समाधान प्राप्त व्यक्ति।:- स्वयं स्फूर्त विधि से दृष्टा पद में हों।:- स्वयं को जानकर, मानकर, पहचान कर, निर्वाह करने के क्रम में साथी कहलाता है।(१२) दायित्व: - परस्पर व्यवहार, व्यवसाय एवं व्यवस्थात्मक संबंधों में निहित, मूल्यानुभूति सहित, शिष्टतापूर्ण व्यवहार। (अध्याय: 18, पृष्ठ नंबर: 174-175)
          • सहयोगी, कर्त्तव्य
          सहयोगी: - प्रणेता अथवा अभ्युदय के अर्थ में मार्गदर्शक अथवा प्रेरक के साथ-साथ अनुगमन करना, स्वीकार पूर्वक गतित होना.  उत्पादन में सहयोगी होना.
          कर्त्तव्य: - प्रत्येक स्तर में प्राप्त संबंधों एवं संपर्कों और उसमे निहित मूल्यों का निर्वाह (अध्याय:18, पृष्ठ नंबर: 175)

          स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
          प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी

          दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव कर्म दर्शन

          मानव कर्म दर्शन (संस्करण:2010, मुद्रण:2017)
          • मानव के लिये अशेष परिस्थितियाँ उनसे सम्पादित कर्म, उपासना, ज्ञान-योग्य-क्षमता से ही निर्मित होती हैं। यही परिस्थितियाँ  उचित अनुचित वातावरण का रूप धारण करती हैं। 
          जागृत-मानव का आचरण एवं व्यवहार ही व्यवस्था है जो शांति का कारण है।
          जहाँ तक मानव का सम्पर्क है वहाँ तक दायित्व का अभाव नहीं है।
          संबंध में दायित्व का निर्वाह होता ही है।
          संबंध में दायित्व प्रधान कर्त्तव्य और संपर्क में कर्त्तव्य प्रधान दायित्व वर्तमान है। यही सामाजिकता है। (अध्याय: 1, पृष्ठ नंबर: 12)
          • मानवीयता पूर्ण व्यवहार सहज ‘‘नियम-त्रय’’ का आचरण ही व्यक्तित्व है। ऐसे व्यक्तित्व के निर्माण में सक्रिय योगदान ही कर्त्तव्य है। यही पुरूषार्थ है। यही प्रबुद्घता है। (अध्याय:2 , पृष्ठ नंबर:46)
          • उपासना व्यक्ति में व्यक्तित्व तथा कर्त्तव्य का प्रत्यक्ष रूप प्रदान करती है क्योंकि उपासना स्वयं में शिक्षा एवं व्यवस्था है। इसलिये यही प्रबुद्घता है। प्रबुद्घता ही मानव की सीमा में शिक्षा एवं व्यवस्था है। (अध्याय:2 , पृष्ठ नंबर:46)
          • ऐसी स्थिति में ब्रह्माण्डीय किरण जो पानी बनने के लिए संयोजक रहा है, ऐसे प्रदूषण के संयोजन वश इसके विपरीत घटना का कारण (पानी के विघटन का कारण) बन सकता है। ऐसी स्थिति में मानव का क्या हाल होगा? इस भीषण दुर्घटना का धरती के छाती पर हम जितने भी विज्ञानी, ज्ञानी,अज्ञानी  कहलाते हैं, प्रौद्योगिकी संसार के कर्णधार कहलाते हैं, क्या इनके पास इसका कोई उत्तर है। इस बात का उत्तर देने वाला कोई दिखता नहीं। क्योंकि, जिम्मेदारी कोई स्वीकारता नहीं। यही इसका गवाही है। जिम्मेदारी स्वीकारने में परेशानी है, क्योंकि व्यक्ति प्रायश्चित के लिए उत्तर दायी हो जाता है। इसलिए इसके सुधार के लिए प्रयास ही एकमात्र कर्त्तव्य लगता है। इसकी औचित्यता अधिकाधिक लोगों को स्वीकार होता है।(अध्याय: 3-7, पृष्ठ नंबर: 88-89)
          • चौथी विपदा धरती के ताप ग्रस्त होने के आधार पर धरती के चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र का विचलित होना भी एक संभवना है। इस धरती में उत्तर और दक्षिणी ध्रुव के बीच, स्वयं स्फूर्त विधि से चुम्बकीय धारा अथवा चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र बना हुआ है। इस बात को भी स्वीकारा गया है। इसी आधार पर दिशा सूचक यंत्र तंत्र बनाकर प्रयोग कर चुके हैं। इस विधि से जो ध्रुव से ध्रुव अपने संबद्घता को बनाये रखा है, इसके आधार पर ही धरती के ठोस होने का अविरल कार्य संपादित होता रहा। इससे धरती के परत से परत ऊष्मा संग्रहण, पाचन, संतुलनीकरण संपादित होती रही। इससे धरती का स्वास्थ्य, ताप के रूप में संतुलित रहने की व्यवस्था बनी रही है। अभी धरती के असंतुलित होने की घोषणा तो मानव करता है, किन्तु उसके दायित्व को स्वीकारता नहीं, इसलिए उपायों को खोजना बनता नहीं, फलस्वरूप निराकरण होना बनता नहीं। इस क्रम में आगे और धरती में ताप बढ़ने की संभावना को स्वीकारा जा रहा है यह इस बात के लिए आगाह करता है - ध्रुव से ध्रुव तक संबद्घ चुम्बकीय धारा, किसी ताप तक पहुँचने के बाद, विचलित हो सकती है, इससे यह धरती अपने आप में ठोस होने के स्थान पर बिखरने लग जाना स्वभाविक है। यह बिखर जाने के बाद धूल के रूप में मानव की कल्पना में आता है। इसके उपरान्त मानव कहाँ रहेगा, जीव जानवर कहाँ रहेंगे, हरियाली कहाँ रहेगी, पानी कहाँ रहेगा, पानी की आवर्तनशीलता की व्यवस्था कहाँ रहेगा। ये सब विलोम घटनायें मानव के मानस को काफी घायल करने के स्थिति में तो हैं। (अध्याय: 3-7, पृष्ठ नंबर: 89)
          • इसके उपचार का उपक्रम यही है कि कोयले और खनिज तेल से जो-जो काम होना है, उसका विकल्प पहचानना होगा। कोयला और खनिज तेल के प्रयोग को रोक देना ही एकमात्र उपाय है। इसी के साथ विकिरणीय ईंधन प्रणाली भी धरती और धरती के वातावरण के लिए घातक होना, हम स्वीकार चुके हैं। विकिरण विधि से ईंधन घातक है, कोयला, खनिज विधि से ईंधन भी घातक है। इनके उपयोग को रोक देना मानव का पहला कर्त्तव्य है। दूसरा कर्त्तव्य है मानव सुविधा को बनाये रखने के लिए ईंधन व्यवस्था के विकल्प को प्राप्त कर लेना।...  (अध्याय: 3-7, पृष्ठ नंबर:89-90)
          • मानव कुल में से ज्ञान विज्ञान विवेक प्रमाणित होता है। यही निर्विवाद स्वत्व का स्वरुप है। ऐसे स्वत्व परावर्तन में सार्थकता का आंकलन और स्वीकृति के आधार पर ही स्वत्व में आंकलन बनता ही रहता है, निरंतर श्रेष्ठता की ओर हम अपने में से प्रमाणित होना बनता ही है। एक बार प्रमाणित होने के बाद प्रमाण विधि में श्रेष्ठता की श्रृंखला बन जाती है। यह प्रत्यावर्तन में दृढ़ता का सूत्र बनता है। मानव में प्रमाण विधि से ही सार्थक पूंजी, प्रत्यावर्तन विधि से निरंतर प्रखर और वृद्घि होते ही जाता है। वृद्घि मतलब आज एक मुद्दे में प्रमाणित हुए, कल दो मुद्दे में, परसों तीन मुद्दे में प्रमाणित होने की स्वीकृति समाहित होती जाती है। यह प्रत्यावर्तन क्रिया बोध और अनुभव में समाहित होते रहने से है अर्थात् स्वीकृति रहने में है, यही पुन:श्च परावर्तन के लिए पूंजी बना रहता है। ऐसे अनुभव ही बोध में समाधान के रुप में अवस्थित रहता है। फलस्वरूप परावर्तन में हम समाधान को प्रमाणित कर पाते हैं। इस विधि से परावर्तन क्रिया अनुभव के लिए नित्य स्रोत होना प्रत्यावर्तन विधि से स्पष्ट होता है। जागृति को प्रमाणित करने के लिए यही सूत्र और व्याख्या है। हर प्रत्यावर्तन अनुभव सूत्र है। हर परावर्तन अनुभव सूत्र की व्याख्या है। इस विधि से मानव के स्वरुप का प्रमाण प्रत्यावर्तन में ज्ञान विज्ञान विवेक के रुप में, परावर्तन में कार्य व्यवहार व्यवस्था में भागीदारी के रुप में प्रमाणित होता है। यही जागृत परंपरा है। पीढ़ी से पीढ़ी इसको बनाये रखना हर मानव का कर्त्तव्य और दायित्व है। (अध्याय: 3-12, पृष्ठ नंबर: 126)
          • समझदारी के साथ मानव का स्वास्थ्य संयम विधा में भागीदारी करना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। इसके साथ ही शिक्षा संस्कार, न्याय सुरक्षा, उत्पादन कार्य, विनिमय कार्यों में भागीदारी करना सभी समझदार मानव का कर्त्तव्य एवं दायित्व हो पाता है। समझदारी के साथ कर्त्तव्य और दायित्व स्वीकृति सहज रूप में प्रमाणित हो जाता है। समझदारी के अनन्तर अर्थात् सहअस्तित्ववादी ज्ञान, विज्ञान, विवेक संपन्नता के उपरान्त दायित्व और कर्त्तव्य को स्वीकारने में देरी होती ही नहीं, यह स्वयं स्फूर्त विधि से प्रमाणित होती, प्रगट होती है। इन सबको भली प्रकार से परीक्षण, निरीक्षण कर निश्चित किया गया है। हर नर-नारी इसको परीक्षण पूर्वक सत्यापित कर सकते हैं, यह मानव परम्परा के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणा रही है। (अध्याय: 16, पृष्ठ नंबर: 158)
          • साथ में जीने के क्रम में, सर्वप्रथम मानव ही सामने दिखाई पड़ता है। ऐसे मानव किसी न किसी सम्बन्ध में ही स्वीकृत रहता है। सर्वप्रथम मानव, माँ के रूप में और तुरंत बाद पिता के रूप में, इसके अनन्तर भाई-बहन, मित्र, गुरु, आचार्य, बुजुर्ग उन्हीं के सदृश्य और अड़ोस-पड़ोस में और भी समान संबंध परंपरा में है हीं। जीने के क्रम में, संबंध के अलावा दूसरा कोई चीज स्पष्ट नहीं हो पाता है। संबंधों के आधार पर ही परस्परता, प्रयोजनों के अर्थ में पहचान, निर्वाह होना पाया जाता है। इस विधि से पहचानने के बिना निर्वाह, निर्वाह के बिना पहचानना संभव ही नहीं है। इसमें यह पता लगता है कि प्रयोजन हमारी वांछित उपलब्धि है। प्रयोजनों के लिए संबंध और निर्वाह करना एक अवश्यंभावी स्थिति है, इसी को हम दायित्व, कर्त्तव्य नाम दिया। सम्बन्धों के साथ दायित्व और कर्त्तव्य अपने आप से स्वयं स्फूर्त होना सहज है। कर्त्तव्य का तात्पर्य क्या, कैसा करना, इसका सुनिश्चियन होना कर्त्तव्य है। क्या पाना है, कैसे पाना है, इसका सुनिश्चियन और उसमें प्रवृत्ति होना दायित्व कहलाता है। हर संबंधों में पाने का तथ्य सुनिश्चित होना और पाने के लिए कैसा, क्या करना है, यह सुनिश्चित करना, ये एक दूसरे से जुड़ी हुई कड़ी है। ये स्वयं स्फूर्त विधि से, सर्वाधिक संबंधों में निर्वाह करना बनता है। जागृति के अनन्तर ही ऐसा चरितार्थ होना स्पष्ट होता है। भ्रमित अवस्था में संबंधों का प्रयोजन, लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है। भ्रमित परम्परा में सर्वाधिक रूप में संवेदनशील प्रवृत्तियों के आधार पर, सुविधा संग्रह के आधार पर और संघर्ष के आधार पर संबंधों को पहचानना होता है। सुदूर विगत से इन्हीं नजरियों को झेला हुआ मानव परम्परा मन: स्वस्थता के पक्ष में वीरान निकल गया। जबकि सहअस्तित्व वादी विधि से मन:स्वस्थता की संभावना, सर्वमानव के लिए समीचीन, सुलभ होना पाया जाता है। इसी तारतम्य में हम सभी संबंधों को सार्थकता के अर्थ में, प्रयोजनों के अर्थ में और संज्ञानीयता पूर्ण प्रयोजन के अर्थ में पहचान पाते हैं। इसका स्पष्ट रूप सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज के रूप में, इसका स्पष्ट रूप मानवाकाँक्षा; जीवनाकाँक्षा प्रमाणों के अर्थ में स्वीकार सहित और मूल्यांकन सहित कार्य व्यवहार और व्यवस्था और आचरणों को परिवर्तन कर लेना ही सहअस्तित्व वादी ज्ञान, विज्ञान और विवेक का फलन होना पाया जाता है।
          मानवाकांक्षा- समाधान, समृद्धि, अभय सह-अस्तित्व सहज प्रमाण।
          जीवनाकांक्षा- सुख, शांति, संतोष आनंद के रूप में गण्य है। (अध्याय:17, पृष्ठ नंबर: 168-169)

          स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
          प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी

          दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव अभ्यास दर्शन

          मानव अभ्यास दर्शन (संस्करण: द्वितीय, मुद्रण: 2010)
          • प्रत्येक मानव के लिए स्थापित संबंध समान हैं। संबंधों में निहित मूल्य नित्य हैं। किसी का सान्निध्य दूर होने मात्र से, उस संबंध में निहित मूल्य का परिवर्तन नहीं है, इसी प्रकार वियोग में भी। वियोग शरीर का है न कि मूल्यों का, जो प्रत्यक्ष है। जैसे माता-पिता से वियोग। जीवन कालीन वियोग में भी पिता के प्रति जो मूल्य है, उसका परिवर्तन नहीं है।
          प्रत्येक परस्परता में दायित्व समाया हुआ है। यही स्थापित मूल्यों में वस्तु व सेवा को अर्पित करता है। सभी अर्पण, मूल्यों के प्रति समर्पण है। यही अपर्ण प्रक्रिया ही कर्त्तव्य है। व्यवहारपूर्वक यह प्रमाणित होता है कि ऐसा कोई संबंध नहीं है, जिसमें मूल्य न हो और जिसके प्रति दायित्व व कर्त्तव्य न हो। (अध्याय:2 , पृष्ठ नंबर: 26)
          • प्रत्येक मानव में सीमित शक्ति, निश्चित दायित्व - कर्त्तव्य एवं स्थापित संबंध पाये जाते हैं, जिनकी एकसूत्रता ‘‘नियम त्रय’’ एवं मानवीयता पूर्ण पद्घति से प्रमाणित होती है। यही गुणात्मक परिवर्तन का औचित्य और मानव की आचार संहिता है। (अध्याय: 2, पृष्ठ नंबर: 27)
          • संस्कृति को आचरण में लाना ही सभ्यता है। दायित्व व कर्त्तव्य निर्वाह ही उसका प्रत्यक्ष रूप है। (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर: 51)
          • व्यक्तित्व व उत्पादन क्षमता सम्पन्न करने का दायित्व शिक्षा व्यवस्था एवं नीति पर आधारित पाया जाता है। यही व्यवस्था का प्रत्यक्ष स्त्रोत है। प्रचार, प्रकाशन, प्रदर्शनपूर्वक उसे प्रोत्साहित करने का दायित्व विद्वता, कला, कविता सम्पन्न समाज का है जिनसे ही सामान्य जन जाति प्रेरणा पाती है, जो तथ्य है। परस्पर राष्ट्रों में संतुलन सामंजस्य एवं एकसूत्रता को पाने के लिये प्रत्येक राष्ट्र को मानवीयता पूर्वक ‘‘नियम-त्रय’’ का पालन करने के लिए उन्मुख होना ही होगा। सार्वभौमिकता ही सभी राष्ट्रों के अनुमोदन के लिये आधार रहेगा। सामाजिक सार्वभौमिकता अर्थात् अखंडता ही सभी राष्ट्रों का मूल आशय है। उसकी स्पष्ट सफलता न होने का कारण मात्र वर्गीयता है या वर्गीयता का प्रोत्साहन एवं संरक्षण है। यह सभी वर्गीयताएं मानवीयता में ही विलीन होती है न कि अमानवीयता में। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानवीयतापूर्ण जीवन परम्परा ही एकमात्र शरण है। इसी का दश सोपानीय व्यवस्था में निर्वाह करना ही एकसूत्रता, अखंडता एवं समाधान सार्वभौमता है। प्रत्येक संतान को उत्पादन एवं व्यवहार एवं व्यवस्था में भागीदारी करने योग्य बनाने का दायित्व अभिभावकों में भी अनिवार्य रूप में रहता है क्योंकि प्रथम शिक्षा माता-पिता से, द्वितीय परिवार से, तृतीय परिवार के सम्पर्क सीमा से, चतुर्थ शिक्षण संस्थान से, पंचम वातावरण से अर्थात् प्रधानत: प्रचार-प्रकाशन-प्रदर्शन से तथा प्राकृतिक प्रेरणा से अर्थात् भौगोलिक एवं शीत, उष्ण, वर्षामान से प्राप्त होती है। (अध्याय: 4, पृष्ठ नंबर: 57)
          • वाद-त्रय संयुक्त कार्यक्रम ही अभ्युदय है। प्रत्येक व्यक्ति एवं संस्थायें दश सोपनीय व्यवस्था में अभ्युदयार्थ भागीदार होना जागृति हैं। साथ ही उन्हीं स्थितियों में वह ‘‘में, से, के लिये’’दायित्व व कर्त्तव्य निर्वाह करना सहज है। संस्था ही व्यवस्था है, व्यवस्था ही प्रबुद्घता है, प्रबुद्घता ही विधि-नीति व पद्घति है, विधि-नीति व पद्घति ही संस्था है। संस्था की प्रथमावस्था परिवार सभा, द्वितीयावस्था परिवार समूह सभा, तृतीय ग्राम मोहल्ला परिवार सभा, चतुर्थ ग्राम मोहल्ला समूह परिवार सभा, पाँचवाँ क्षेत्र परिवार सभा, छठा मंडल परिवार सभा, सातवाँ मडंल समूह परिवार सभा, आठवाँ मुख्य राज्य परिवार सभा, नवाँ प्रधान राज्य परिवार सभा, दसवाँ विश्व परिवार राज्य परिवार सभा, यही अखण्ड समाज व्यवस्था की दश सोपानीय व्यवस्था स्वरूप है। अखंडता ही समाज का प्रधान लक्षण है। (अध्याय:4 , पृष्ठ नंबर: 62)
          • मानव में स्वभाव और धर्म ही मौलिकता, मौलिकता ही मानव का अर्थ, अर्थ ही प्रकटन, प्रकटन ही स्वभाव है। मानव की मौलिकता ही मानव मूल्य है। मूल्य-सिद्घि मूल्याँकन पूर्वक होती है। मूल्य चतुष्टय ही आद्यान्त प्रकटन है। यही अभ्युदय की  समग्रता है। प्रत्येक व्यक्ति अभ्युदय पूर्ण होना चाहता है। अभ्युदयकारी कार्यक्रम से सम्पन्न होने में जो अंतर्विरोध है (चारों आयामों तथा पाँचों स्थितियों में परस्पर विरोध) वही संपूर्ण समस्यायें है। इसके निराकरण का एकमात्र उपाय मानवीयतापूर्ण पद्घति से ‘‘नियम-त्रय’’ का पालन ही है। यही पाँचों स्थितियों का दायित्व है। अमानवीयतापूर्वक ‘‘नियम-त्रय’’ का पालन सम्भव नहीं है। अमानवीयता हीनता, दीनता और क्रूरता से मुक्त नहीं है। इसी कारणवश अपराध, प्रतिकार, द्रोह, विद्रोह, हिंसा-प्रतिहिंसा, भय-आतंक प्रसिद्घ है।  ये सब मानव के लिये अवांछित घटनायें हैं। यही सत्यता मानवीयतापूर्ण जीवन के लिये बाध्यता है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर: 73)
          • प्रत्येक व्यक्ति परस्परता में कर्तव्य एवं दायित्व निर्वाह की अपेक्षा करता है और स्वीकारता है। (अध्याय:5, पृष्ठ नंबर: 78)
          • ‘‘जागृति सहज अनुमान क्षमता मानव की विशालता को और अनुभव ही पूर्णता को स्पष्ट करता है।’’ सतर्कता एवं सजगता मानव-जीवन में प्रकट होने वाली क्रिया पूर्णताएं है। चैतन्य क्रिया अग्रिम रूप में क्रिया पूर्णता एवं आचरण पूर्णता के लिये तृषित एवं जिज्ञासापूर्वक अपनी विशालता को अनुमान के रूप में प्रकट करती है। ज्ञानावस्था की इकाई का मूल लक्ष्य ही पूर्णता है। पूर्णता के बिना ज्ञानावस्था की इकाईयाँ आश्वस्त एवं विश्वस्त नहीं है। उत्पादन एवं व्यवहार में ही क्रमश: समाधान एवं अनुभव चरितार्थ हुआ है। प्रयोग एवं उत्पादन में ही समस्या एवं समाधान है। व्यवहार एवं आचरण में ही सामाजिक मूल्यों का अनुभव होने का परिचय सिद्घ होता है। आशा, विचार, इच्छा समाधान के लिए ही प्रयोग व उत्पादन-विनिमयशील है। इच्छा एवं संकल्प अनुमानपूर्वक अनुभव के लिए आचरणशील है। आचरण के मूल में मूल्यों का होना पाया जाता है। स्वभाव ही आचरण में अभिव्यक्त होता है। मानवीय स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करूणा ही है। अनुभव आत्मा में  अनुभवमूलक व्यवहार एवं आचरण आत्मानुशासित होता है, आत्मानुभूति ही प्रमाण और वर्तमान है। आत्मानुभूति मूलक व्यवहार समाधान सम्पन्न होता है। तभी परावर्तन एवं प्रत्यावर्तन में संतुलन सिद्घ होता है। अनुभूति आत्मानुषंगी एवं अपरिवर्तनीय है। पूर्णता सहज व्यवहार आत्मानुषंगी एवं अपरिवर्तनीय है यही पूर्णता है। यही पूर्ण सजगता है, पूर्ण सजगता ही सहजता है। समाधान एवं अनुभूति की निरंतरता ही सामाजिक अखण्डता एवं अक्षुण्णता है। अनुभव एवं समाधान के बिना जीवन चरितार्थ नहीं है। चरित्रपूर्वक अर्थ निस्सरण ही चरितार्थता है। आचरण ही स्वभाव के रूप में प्रकट होता है। यही स्वभाव ‘‘तात्रय’’ में स्पष्ट है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में प्रयोग पूर्वक किया गया उत्पादन-विनिमय में सफल हुआ है। व्यवहार एवं उत्पादन का योगफल ही सह-अस्तित्व है। उनमें निर्विषमता ही जागृति है। उसकी निरंतरता ही सामाजिकता की अक्षुण्णता है, जिसके दायित्व का निर्वहन, शिक्षा एवं व्यवस्था करती है। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 87)
          • सामाजिकता का अनुसरण आचरण तब तक संभव नहीं है जब तक मानवीयतापूर्ण जीवन सर्वसुलभ न हो जाय। ऐसी सर्वसुलभता के लिए शिक्षा और व्यवस्था ही एकमात्र दायी है, जिसके लिये मानव अनादिकाल से प्रयासशील है। प्रत्येक मानव को सतर्कता एवं सजगता से परिपूर्ण होने का अवसर है, जिसको सफल बनाने का दायित्व शिक्षा एवं व्यवस्था का ही है। सफलता और अवसर का स्पष्ट विश्लेषण ही शिक्षा है। प्रत्येक मानव सही करना चाहता है और न्याय पाना चाहता है। साथ ही सत्यवक्ता है। ये तीनों यथार्थ प्रत्येक मानव में जन्म से ही स्पष्ट होते हैं। यही अवसर का तात्पर्य है। इन तीनों के योगफल में भौतिक समृद्घि एवं बौद्घिक समाधान की कामना स्पष्ट है। यह भी एक अवसर है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अवसर का सुलभ हो जाना ही व्यवस्था की गरिमा है। न्याय प्रदान करने की क्षमता एवं सही करने की योग्यता की स्थापना ही शिक्षा की महिमा है।  (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 93)
          • परम्परा की स्वीकृति ही प्रतिबद्घता है। मानवीयतापूर्ण परम्परा ही सामाजिक एवं स्वस्थ परंपरा होती है। वर्गीय एवं परिवारीय व व्यक्तिवादी परंपरा संघर्ष से मुक्त नहीं है फलत: सामाजिक नहीं है। सामाजिकता सीमा नहीं अपितु अखंडता है। प्रतिबद्घताएं संकल्प पूर्ण प्रवृतियों के रूप में प्रकट होती है जो उनके आहार, विहार, आचरण, व्यवहार, उत्पादन, उपभोग, वितरण और दायित्व, कर्त्तव्य, निर्वाह के रूप में प्रत्यक्ष होती है। संकल्प में परिवर्तित होना ना होना ही अवधारणा है। ऐसी अवधारणा भास, आभास पूर्वक ही होती है जबकि धारणा संक्रमण ज्ञानपूर्वक स्वीकृति है। जिसे शिक्षा ही स्थापित करती है। प्रथम शिक्षा माता-पिता, द्वितीय शिक्षा परिवार, तृतीय शिक्षा केन्द्र, चतुर्थ शिक्षा व्यवस्था सहज वातावरण है जिसमें प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन प्रक्रिया भी हैं। यही शिक्षा मानव में अवधारणा स्थापित करती है। फलत: मानव ‘‘ता-त्रय’’ के रूप में अपने आचरण को प्रस्तुत करता है। यही मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता है। (अध्याय:6 , पृष्ठ नंबर: 95-96)
          • ‘‘विवाह मानव के लिए अवांछित घटना नहीं है।’’ विधिवत् वहन करने के लिए की गई प्रतिज्ञा ही विवाह है। मानवीयता में ही विधिवत् जीवन का विश्लेषण हुआ है, जिसमें विवेक-विज्ञान सम्पन्न जीवन सुसम्बद्घ होता है। जिसका प्रत्यक्ष रूप कायिक-वाचिक-मानसिक, कृत-कारित-अनुमोदित भेद से किए सभी क्रियाकलापों में अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा ही है। यही वैध सीमा की सीमा है। विवाह घटना में दो जागृत मानव द्वारा समान संकल्प के क्रियान्वयन की प्रतिज्ञा है। यह समाज गठन का भी एक प्रारूप है। विवाह गठन में निर्भय जीवन की कामना व प्रमाण समायी रहती है। सामाजिकता का अंगभूत जीवन क्रियाकलाप के प्रति प्रतिज्ञा ही विवाह में उत्तम संस्कार को प्रदान करती है। मानवीयतापूर्ण जीवन, व्यवस्था क्रम एवं जीवन के कार्यक्रम में संकल्प ही दृढ़ता को प्रदान करता है। यही विवाह-संस्कार की प्रधान धर्मीयता है। इस उत्सव को शुभ कामनाओं सहित बन्धु परिवार समेत सम्पन्न किया जाता है। इस घटना में वधू एवं वर का संगठन होता है। इन दोनों में संस्कृति की साम्यता ही सफलता का आधार है। मानव में संस्कृति साम्य मानवीयता में सुलभ होता है। विवाह संस्कार प्रधानत: परस्पर दायित्व वहन के लिए घोषणा है। यह घोषणा मानवीयता सहज रूप में सफल होती है। विवाह संयोग संस्कृति एवं सभ्यता को साकार रूप देने के लिए प्रतिज्ञा है जो मानवीयता पूर्ण विधि से होती है। विवाह उत्पादन, उपयोग एवं वितरण के  स्पष्ट कार्यक्रम को आरंभ करने के लिए बाध्य करता है। यही आवश्यकता से अधिक उत्पादन की आवश्यकता को जन्म देता है। यह मात्र मानवीयता पूर्वक सफल होता है। विवाहित जीवन व्यवस्था में, से, के लिए बाध्य होता है। अविवाहित जीवन में भी वैधता सहज व्यवस्था की अनिवार्यता स्वीकार्य होती है। मानवीयता पूर्वक ही पुरूषों में यतित्व अर्थात् देव मानव एवं दिव्य मानवीयता की ओर गतिशीलता एवं नारियों में सतीत्व उसी अर्थ में स्पष्ट होता है। जो आर्थिक एवं सामाजिक संतुलनकारी मूल तत्व है। अस्तु, विवाह-संस्कार का आद्यान्त अर्थ निष्पत्ति मानवीयतापूर्ण आचरण एवं मानव कुल का संरक्षण है। (अध्याय: 7, पृष्ठ नंबर:105 -106)
          • उत्पादन में अप्रवृत्ति एवं व्यवहार में दायित्व वहन में विमुखता एवं अतिभोग में तीव्र इच्छा ही लोक वंचना, प्रवंचना एवं द्रोह का प्रधान कारण है। (अध्याय: 10, पृष्ठ नंबर: 136)
          • ...गुणात्मक परिवर्तन के संदर्भ में, से, के लिए ही दायित्व एवं कर्त्तव्य प्रमाणित होते हैं। अनुभवमय क्षमता से संपन्न होने पर्यन्त दायित्व एवं कर्तव्य का अभाव नहीं है। उसके अनन्तर वह स्वभावगत होता है। अमानवीयता से मानवीयता में अनुगमन करने के लिए नियमत्रय पूर्वक दायित्व एवं कर्त्तव्य प्रमाणित होता है। मानवीयता से अतिमानवीयता में अनुगमन करने के लिए छ: स्वभाव कर्त्तव्य एवं दायित्व को प्रमाणित करते हैं। धीरता से परिपूर्ण होना ही वीरता का होना, वीरता से परिपूर्ण होना ही उदारता का होना, उदारता से परिपूर्ण होना ही दया का होना, दया से परिपूर्ण होना ही कृपा का होना तथा कृपा से परिपूर्ण होना ही करूणा का होना प्रमाणित है। (अध्याय: 13, पृष्ठ नंबर: 157-158)
          • विश्वास विहीन प्रत्येक संबंध एवं संपर्क में दायित्व एवं कर्तव्य वहन सिद्घ नहीं होता है। दायित्व एवं कर्तव्य वहन की उपेक्षा अथवा तिरस्कारपूर्वक समाज संरचना नहीं होती है और न सामाजिकता ही सिद्घ होती है। (अध्याय: 15, पृष्ठ नंबर: 167)
          • ‘‘आयोजनात्मक, प्रयोजनात्मक एवं योजनात्मक कार्यक्रम प्रसिद्घ हैं।’’ आत्मीयतापूर्ण अर्थात् न्याय सम्मत पद्घति से किया गया सम्मेलनात्मक योजना ही आयोजन है। पूर्णता की अपेक्षा में या पूर्णतया परस्पर मिलन ही सम्मेलन है। आयोजनात्मक कार्यक्रम ही सामाजिक कार्यक्रम है। सामाजिक कार्यक्रम प्रधानत: संवेदनशीलता व संज्ञानीयता की अभिव्यक्ति है, यही प्रयोजन है। संज्ञानीयता ही आयोजन का प्रधान कारण है। संज्ञानीयता के अभाव में आयोजनात्मक कार्यक्रम सफल नहीं है। आयोजनात्मक कार्यक्रम ही सामाजिकता को स्पष्ट करता है। आयोजन मानव के चारों आयामों एवं पाँचों स्थितियों के अर्थ में चरितार्थ होती है। यही प्रमाण मूलक दश सोपानीय परिवार सभा व्यवस्था होने से परंपरा है। प्रमाण मूलक न होने से वर्ग भावना की अभिव्यक्ति है। परम्परा में प्रमाण मूलक चिन्तन का होना अनिवार्य है। यही सफलता का द्योतक है। इसके अभाव में आयोजन नहीं है। आयोजन में व्यवहारिकता का निर्धारण होना ही प्रधान तत्व है। व्यवहारिकता अनुभवमूलक होने से ही सफल होता है। फलत: समाज संरचना स्पष्ट होता है अर्थात् संबंध एवं संपर्क के प्रति दायित्व एवं कर्तव्य निर्वाह होता है। फलत: समाज की अखण्डता एवं अक्षुण्णता सिद्घ होता है। आयोजन की चरितार्थता अखण्डता में ही है न कि विघटन में। संपूर्ण आयोजनायें धर्मीयता को प्रसारित करने के लिए बाध्य है। मानव धर्मीयता सार्वभौमिक है। मानव संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था के रूप में ही मानव धर्मीयता प्रसारित होता है।  (अध्याय: 15, पृष्ठ नंबर: 167)


          स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
          प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज 

          दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : मानव अनुभव दर्शन

          मानव अनुभव दर्शन (अध्याय:3,  संस्करण: 2011, मुद्रण: 2016 , पृष्ठ नंबर: 22)
          • कृतज्ञता, अस्तेय, अपरिग्रह, सत्यभाषण, स्वनारी-स्वपुरूष गमन, सरलता, दया, स्नेह पूर्वक विश्वासपालन, यथार्थ वर्णन, कर्त्तव्यों व दायित्वों का वहन, अधिक उत्पादन कम उपभोग, उत्साह एवं चेष्टा, रहस्यहीनता, सहजता एवं निर्बैरता सुसंस्कारों के लक्षण हैं। लक्षणों के आधार पर ही स्वभाव, तदनुसार ही मूल्यांकन क्रिया है। लक्षण विहीन मानव नहीं है।


          स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
          प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज 

          दायित्व और कर्तव्य- सन्दर्भ : समाधानात्मक भौतिकवाद

          समाधानात्मक भौतिकवाद (संस्करण:2009)
          • शिक्षा-संस्कार ही बोध और अवधारणा का एकमात्र स्रोत है। ऐसे स्रोत को सार्थक रूप देने, उसमें प्रामाणिकता और समाधान की निरन्तरता को बनाये रखना चैतन्य-प्रकृति में, से ज्ञानावस्था की इकाई का दायित्व और वैभव होता हैं। जड़ प्रकृति में अंशों का आदान-प्रदान होता हैं। परमाणुओं के स्तर में जिसमें प्रस्थापन होता है वह पहले से ही सामान्य गति में रहता है, जिसमें विस्थापन होता हैं उसके अनन्तर वह भी सामान्य गति में होना पाया जाता है। सामान्य गति में होने के लिए निरन्तर मध्यस्थ क्रिया में बल समाहित रहता हैं जिसे हम छिपी हुई ऊर्जा कहते है। (अध्याय: 5, पृष्ठ नंबर: 86)
          • मानव के बहुआयामी इतिहास में उन सभी आयामों के लिए पूरक होने के प्रमाण को मानव अपने कुल के लिए समर्पित नहीं कर पाया। इसी कारण अब प्रबुद्घ मानवों का यह दायित्व होता है कि सभी आयामों में जो रिक्त और अपेक्षित भाग है उसकी भरपाई कर देवें। उसमें से प्रथम और प्रमुख आयाम यही देखने को मिला-व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी। मानव जागृतिपूर्वक ही इसकी भरपाई कर पायेगा। (अध्याय: 6, पृष्ठ नंबर: 124)
          • मानव समझदारी से व्यवस्था में प्रमाणित होता है, जो अस्तित्व सहज ही होती है:- अस्तित्व सहज व्यवस्था वर्तमान सहज प्रमाण के रूप में वैभव हैं। जब-जब मानव व्यवस्था का अनुभव करता है, तब-तब वर्तमान में विश्वास, भविष्य के प्रति आश्वासन होना पाया जाता है। भविष्य के प्रति आश्वस्त होने का तात्पर्य विधिवत् योजना और कार्य योजना होने से है। वर्तमान में विश्वास का तात्पर्य समझदारी सहित दायित्वों, कर्तव्यों का निर्वाह हैं। जिसे भले प्रकार से कर चुके हैं, कर रहे हैं और करने में निष्ठा हैं। समझदारी का स्वरूप जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान में, से, के लिए जागृति है। जागृति का तात्पर्य जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने से है। इस प्रकार जागृति ही वर्तमान हैं, वर्तमान ही जागृति का सम्पूर्ण रूप है। (अध्याय: 9(4), पृष्ठ नंबर: 237)
          • जागृत मानव, अभिव्यक्ति सहज रूप में, मानव सहज व्यवहार में सफल हो जाता हैं। यह संबंधों, मूल्यों, मूल्यांकनों, दायित्वों, कर्तव्यों को निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होता है। इसलिए समाधानित होता है। (अध्याय: 9(5), पृष्ठ नंबर: 257)
          • उत्पादन और संतुलन सहज वैभव का मूल सूत्र विकल्प के रूप में होना समझ में आता है कि:-1. भय और प्रलोभन के स्थान पर मूल्यों की पहचान, निर्वाह और मूल्यांकन करने का दायित्व। (अध्याय: 9(10), पृष्ठ नंबर: 305)
          • जागृत मानव अपने तन, मन, धन रूपी अर्थ को आगे पीढ़ी, पीछे पीढ़ी के साथ वर्तमान दायित्व एवं कर्तव्य पूर्वक अर्पित, समर्पित कर सदुपयोग पूर्वक सुख को पा लेता हैं। फलस्वरूप उस-उस की सुरक्षा होना प्रमाणित होता है। (अध्याय: 9(10), पृष्ठ नंबर: 314)
          • तन, मन, धन रूपी अर्थ के सदुपयोग, सुरक्षा क्रम में ही मानव व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी हैं और अखण्ड समाज रचना, रचना कार्य और उसमें भागीदारी का निर्वाह करता हैं, यही जागृत पंरपरा का दायित्व हैं। (अध्याय: 9(10), पृष्ठ नंबर: 315)
          • प्रयोजनशीलता:- जागृतिपूर्ण विधि से प्रमाणित करने में नियोजित किया गया तन, मन, धन रूपी अर्थ।
          सदुपयोग पूर्वक सुख उनको मिलता हैं जो अपने तन, मन, धन को विकास और जागृति, कर्तव्य और दायित्वों के लिए अर्पित करते हैं जिसके लिए अर्पित हुआ, उसकी सुरक्षा, जागृति और विकास के अर्थ मंय संपन्न हुई। यही पूरकता विधि हैं। (अध्याय: 9 (10), पृष्ठ नंबर: 315)
          • मानव जागृत परंपरा सहज रूप में जीने के क्रम में शरीर को निरोग रखना भी एक कार्य है। इस क्रम में जो संक्रामक, आक्रामक विधियों से जो कुछ भी परेशानियाँ देखने को मिलती हैं, उसके निवारण के लिए सर्वत्र सहज रूप में पाई जाने वाली जड़ी-बूटी आदि घरेलू वस्तुओं से बहुत सारे रोगों को ठीक करने का अधिकार हर परिवार में स्थापित कर लेना सहज है। क्योंकि परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में स्वास्थ्य-संयम कार्यक्रम प्रत्येक परिवार का एक दायित्व हैं। इस क्रम में पवित्र आहार पद्घति एक प्रमुख कार्यक्रम रहेगा। इसे ध्यान में रखकर कृषि कार्य के लिए जो समझदारी चाहिए उसको भी स्वीकृति करना आवश्यक हो जाता हैं। इस क्रम में धरती का उर्वरक संतुलन को बनाए रखना एक आवश्यकता है। इसमें मानव का दायित्व भी बनता हैं। धरती, अनाज उत्पादन-कार्य, उर्वरकता का संतुलन स्वाभाविक रूप में एक-दूसरे से आवर्तनशील कार्य हैं। इस आवर्तनशीलता में पहले भी संतुलन का जिक्र किया जा चुका है। इसमें मुख्य बात यही है कि धरती में उपजी हुई संपूर्ण हरियाली, दाना को निकालने के उपरान्त सभी घास, भूसी, जानवर खाकर गोबर गैस के अनंतर खाद बनकर खेतों में समाने की विधि को अपनाना चाहिए। अन्यथा घास, भूसी ज्यादा होने की स्थिति में अच्छी तरह से सड़ाकर खाद बनाना चाहिए। यह खेतों में डालना चाहिए। यह विधि सर्वाधिक कास्तकारों के यहाँ प्रचलन में हैं ही। इसकी तादाद बढ़ाने की आवश्यकता है। जैसे-जैसे खेत अधिक होता हैं वैसे-वैसे खाद की मात्रा भी अधिक होना आवश्यक है। कीटनाशक या कीट नियंत्रक कार्यों को भी कास्तकारों को अपने हाथों में बनाए रखना चाहिए जिससे पराधीनता की नौबत न आए। (अध्याय: 9(10), पृष्ठ नंबर: 330) 
          • प्रत्येक मानव मूलत: सुख धर्मी है ही। आशा के रूप में यह मानव में प्रमाणित होता है अथवा इच्छा के रूप में यह पाया जाता है। इसकी सफलता की निरंतरता नियति सहज व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी का फलन हैं। सम्पूर्ण परंपराएँ व्यवस्था के संबंध में भ्रमित होने के फलस्वरूप, प्रत्येक मानव अपने में कल्पनाशील होने के कारण रुचि मूलक विधि से मानसिकता में आना एक बाध्यता बन गई। इतिहास के अनुसार भी, स्वर्ग की परिकल्पना भी रुचि के अनुकूल वर्णन हैं। रुचि सहज कल्पनाएँ इंद्रिय सन्निकर्ष के आधार पर हैं। इंद्रिय सन्निकर्ष शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के रूप में होना पाया जाता है। इसी का रुचिकर होना, अरुचिकर होना देखा जाता है। रूचि की एकरूपता का, सार्वभौमिकता का कोई नियम नहीं होता। रुचि मूलक मानसिकता को हटाने के लिए अथवा परिवर्तन करने के लिए एक मात्र प्रस्ताव उपदेश के रूप में मोक्ष को बताया गया। उसके लिए विरक्तिवादी चरित्र, साधना और उसके क्रम का प्रस्ताव भी मानव के सम्मुख प्रस्तुत है। यह भी देखने को मिला कि विरक्ति में मानव ने अपने को अर्पित भी किया। यह सब होने के उपरान्त भी, किसी भी परपंरा में सार्वभौम व्यवस्था निखरकर, उभरकर जनमानस में नहीं आया। अथवा इस रिक्तता के चलते सामान्य मानव के लिए रुचि मूलक प्रणाली से कल्पनाओं को दौड़ाना सहज हो गया। फलत: अव्यवस्था के अनंतर पुन: अव्यवस्था हाथ लगते आया। मूल मुद्दा भक्ति, विरक्ति, भोग और संग्रह क्रम में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सूत्र व्याख्या और कार्यक्रम लोक विदित नहीं हो पाई। अभ्यास में आना तो दूर ही रहा। आज की स्थिति में सर्वाधिक संग्रह, भोग की मानसिकता अथवा लोक मानसिकता को देखते हुए व्यवस्था को पहचानना एक अनिवार्य स्थिति निर्मित हो चुकी है। इसके पक्ष में अर्थात् सार्वभौम व्यवस्था को पहचानने के पक्ष में सर्वमानव में सुखापेक्षा (सुख की अपेक्षा) एक मात्र सूत्र हैं। सुख सहज सूत्र व्याख्या ही भरोसा करने और प्रयोग कर, अभ्यास कर, प्रमाणित कर, लोक व्यापीकरण करने योग्य कार्यक्रम दिखाई पड़ता है। इसका मूल ध्रुव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन तथा मानवीयतापूर्ण आचरण का समीकरण ही हैं। इसके लिए अस्तित्व सहज सूत्र, सह-अस्तित्व सहज व्याख्या, अध्ययन सुलभ हो चुका है। अस्तु, मानवीयतापूर्ण विधि और व्यवस्था को पहचानना सुलभ हुआ। इसको व्यवहार रूप देना ही इसका लोक व्यापीकरण ही हमारी निष्ठा और कर्तव्य हैं। इसी विधि से पाई जाने वाली सुखाकांक्षा, व्यवहार और कार्यक्रम सहज सुलभ होने की संभावना आ चुकी हैं। इसी संभावना के आधार पर प्रत्येक मानव मानवत्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने के कार्यक्रम को परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में पहचान कर निर्वाह कर सकते हैं। इससे ही प्रत्येक मानव सुख, समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व को अनुभव करेगा।  (अध्याय: 9 (11), पृष्ठ नंबर: 355-357)

          स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
          प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी