मानव लक्ष्य को सफल बनाने योग्य शिक्षा व व्यवस्था की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी अंश में पायी जाती है जो चेतना विकास मूल्य शिक्षा पूर्वक राज्यनीति एवं धर्मनीति से ही सफल है। दोनों के मूल में मानवीयता पूर्ण व्यवस्था है ही जिसमें अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा की अवधारणा समायी है।
प्रेरक (नेतृत्व) के मूल में दर्शन एवं विचार क्षमता ही है, जो सफल होती है। प्रत्येक सुद्दढ़ विचार का आधार दर्शन ही है। अन्ततोगत्वा दर्शन-क्षमता ही नेतृत्व-क्षमता सिद्घ होती है।
सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति रूपी अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है। दर्शन में प्रकृति का विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति रूप में अध्ययन मानव के लिए प्रस्तावित है जो स्वयं समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद तथा अनुभवात्मक अध्यात्मवाद को स्पष्ट करता है, जिससे ‘‘प्रमाणत्रय’’ (प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव) सिद्घ होता है। मानव जीवन में ‘‘चतुरायाम’’ उत्पादन, व्यवहार, विचार एवं अनुभूति अविभाज्य हैं जो प्रसिद्घ है, इसलिए व्यवहारात्मक जनवाद का प्रत्यक्ष रूप न्याय-सुलभ, समृद्घ जीवन में प्रतिष्ठित एवं अक्षुण्ण होना है। यही मानव में अखंडता को स्थापित करता है, जिसकी पूर्ण सभांवना व आवश्यकता है ही। जैसे :-
- मानव संबंधों सहित ही जन्म लेता है।
- स्थापित संबंध में स्थापित मूल्य है।
- सामाजिक मूल्य अपरिवर्तनीय है।
- मानवीयता में ही अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा सिद्घ होती है।
- मानवीयता जागृत मानव परंपरा में ही प्रमाणित होता है।
- जागृत मानव सामाजिक न्यायिक इकाई है।
- सामाजिक मूल्य में, से, के लिए शिष्टता एवं वस्तु व सेवा की प्रयुक्ति सफल है।
- मानव में स्वभाव सहज अभिव्यक्ति, धर्म सम्पन्नता अनुभूति प्रसिद्घ है।
समाधानात्मक भौतिकवाद की चरितार्थता आवश्यकता से अधिक उत्पादन है, जो अर्थ के सदुपयोग एवं सुरक्षा के रूप में मानवीयता में दृष्टव्य है। यही मानव की चिर-कामना है, जिसका पालन पाँचों स्थितियों में, मानवीयता पूर्वक होता है। अमानवीयता में इसकी अवहेलना होती है, अतिमानवीयता पूर्वक स्वभावत: चरितार्थ होती है। चरितार्थता ही मानव का अभीष्ट है।
आशा, आवश्यकता तथा अनिवार्यता पूर्वक किया गया प्रयास ही अभीष्ट है, इससे विहीन कार्यकलाप मानव में सफल नहीं होता है। अस्तित्व में जागृतिपूर्वक मानव स्पष्टाधिकार सम्पन्न एवं क्षमता को स्पष्ट करता है, जो एकसूत्रता, सार्वभौमता है।
सामाजिक मूल्य अनुभव में, शिष्ट मूल्य व्यवहार में एवं भौतिक मूल्य उत्पादन उपयोगिता में स्पष्ट है।
व्यवहार एवं अनुभव निर्विरोधिता ही समाधान है। यही समाधानात्मक भौतिकवाद को स्पष्ट करता है क्योंकि व्यवहार का आधार अनुभव है तथा उत्पादन, उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता एवं वितरण का आधार समाधान है। यही समाज एवं सामाजिकता है।
उपयोगिता-मूल्य आवश्यकता में, आवश्यकता-मूल्य शिष्टता में, शिष्टता-मूल्य स्थापित मूल्य में, स्थापित मूल्य मानव मूल्य में, मानव मूल्य जीवन मूल्य में समर्पित पाये जाते हैं। स्थापित मूल्य ही जीवन एवं जीवन के कार्यक्रम का आधार है, इसी आधार पर संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था हैं न कि केवल उत्पादन पर क्योंकि उत्पादन मानव के अधीन है न कि उत्पादन के अधीन मानव।
संबंध व स्थापित मूल्य केवल अखण्ड समाज के अर्थ में है, अखण्ड समाज सह-अस्तित्व में अनुभव का फलन है जो केवल अनुभव प्रमाण से तथा उत्पादन- मूल्य प्रयोग प्रमाण से प्रमाणित है।
जड़-चैतन्यात्मक इकाईयों की स्थिति गति केवल मूल्यों में, से, के लिए ही है। सभी अवस्था और पद में प्रतिष्ठित इकाईयों का मूल्य उन-उन के स्वभाव और आचरण के आधार पर गण्य है।
मानव में जो मूल्य-दर्शन-क्षमता है, वही मानव को व्यवहार, उत्पादन, विचार एवं अनुभूति में, से, के लिए प्रेरित करती है। यही सामाजिकता एवं बौद्धिकता का आधार है। मानव सामाजिक, न्यायिक इकाई एवं बुद्घिपूर्वक, समझदारी पूर्वक जीने वाला अर्थात् विवेक विज्ञान पूर्वक जीने वाला से भी संबोधित है, इस संबोधन का अभीष्ट भी इसी क्षमता का निर्देश करता है। यह संबोधन अनुभव बोध पूर्वक चारों आयामों में प्रमाणित होने से सार्थक है।
अखण्ड समाज दश सोपानीय व्यवस्था है यही जागृत मानव परम्परा सहज वैभव है।
समाज का प्राथमिक रूप : समझदार परिवार
समाज का द्वितीय रूप : अखण्ड समाज (राष्ट्र)
समाज का तृतीय रूप : पृथ्वी अखण्ड समाज
सार्वभौम व्यवस्था
‘‘सभी राज्य संस्थाएं अखण्ड समाज के अर्थ में है।’’ परिवार भी अखण्ड समाज के अर्थ में प्राथमिक एक घटक है। इस स्थिति में मुख्यत: सह-अस्तित्व प्रमाणित होता है। ऐसे अनेक परिवार मिलकर सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करते है। ऐसी भागीदारी स्वयं राज्य संस्थाओं के रूप में गण्य होता है। इसी क्रम में अर्थात् समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने के क्रम में विश्व परिवार सभा पर्यन्त भागीदारी सम्पन्न होती है।
मानव में अनुभव बोध सम्पन्नता ही प्रबुद्घता है। यही शिक्षा व्यवस्था का आद्यान्त लक्ष्य है जो कारण, सूक्ष्म, स्थूल तत्वों का अध्ययन है। जिसमें ज्ञान, विवेक, विज्ञान पूर्वक अखण्ड समाज एवं सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होती है।
दश सोपानीय व्यवस्था सहज चारों आयामों की एकसूत्रता ही अखण्ड समाज है जिसकी प्रभुसत्ता संज्ञा है। यह सह-अस्तित्व सहज सम्पूर्ण मूल्यों का प्रमाण एवं परंपरा ही है। सम्पूर्ण मानव में प्रबुद्घता का ही परावर्तितत रूप प्रभुसत्ता है जो मानवीयतापूर्ण शिक्षा व्यवस्था, विधि, नीति पूर्वक सफल है।
नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य देश कालातीत हैं, अत: सार्वभौमिक हैं। इसलिए सार्वभौमिकता ही अप्रतिमता, अप्रतिमता ही मध्यस्थता, मध्यस्थता ही प्रबुद्घता, प्रबुद्घता ही विज्ञान व विवेक, विज्ञान व विवेक ही सम्प्रभुता, सम्प्रभुता ही अखण्डता, अखण्डता ही समाधान एवं समृद्धि, समाधान एवं समृद्धि ही सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व ही जीवन एवं जीवन ही नियम, न्याय, धर्म एवं सत्य है। मानव जीवन कार्यक्रम में विधि, नीति एवं व्यवस्था का समाहित रहना प्रसिद्घ है।
विधि विहित नीति व व्यवस्था ही चारों आयामों एवं दश सोपानीय व्यवस्था की एकसूत्रता को स्थापित करती है। यही जागृत जीवन का प्रत्यक्ष रूप एवं कार्यक्रम है। यही अभ्यास का फलन है। यही जागृत मानव परम्परा का अभ्यास और अभ्यास का वैभव है।
जागृति क्रम और जागृति परम्परा में अनिवार्य क्रिया, प्रक्रिया, स्थिति एवं स्थितिशीलता व गति ही सार्वभौमिकता है। जैसे-मानव के लिए मानवीयतापूर्ण क्रियाकलाप।
सार्वभौमिकता ही निर्विवाद एवं समाधान है।
ज्ञानावस्था की इकाई में निर्विवाद की आशा आकाँक्षा है। साथ ही उसमें पूर्णता के लिये प्रयास भी साम्यत: पाया जाता है। इसकी अपर्याप्तता ही है, जो प्रभुसत्ता में, से, के लिये विविधता है। यही द्रोह, विद्रोह, आतंक तथा युद्घ है, जबकि यह सब मानव की वांछित (आशित) घटना, स्थिति या परिस्थिति नहीं है।
समृद्धि, समाधान, अभय एवं सह-अस्तित्व ही मानव कुल की सार्वभौमिक आकाँक्षा है।
प्रभुसत्ता की प्रतिष्ठा तब-तक परिपूर्ण नहीं है जब तक अभयता को प्रदान करने में समर्थ न हो जाए।
प्रभुसत्ता ही अभयता, अभयता ही क्रम,क्रम ही जागृति, जागृति ही अनिवार्यता, अनिवार्यता ही प्रबुद्घता, प्रबुद्घता ही जीवन सफलता और जीवन सफलता ही प्रभुसत्ता है।
मानवीयता से ही प्रभुसत्ता की प्रतिष्ठा एवं उसकी अक्षुण्णता है।
वर्ग विहीन अखण्ड समाज ही प्रबुद्घता का प्रमाण रूप है।
प्रत्येक मानव में पाये जाने वाले अनुभव के लिये कारण, विचार के लिये सूक्ष्म, व्यवहार के लिये सूक्ष्म-स्थूल तथा उत्पादन के लिये स्थूल तथ्यों का अध्ययन है, जो प्रत्यक्ष है।
अध्ययन से वैचारिक नियंत्रण, शिक्षा से व्यवहारिक नियंत्रण एवं प्रशिक्षण से उत्पादन में नियंत्रण प्रसिद्घ है।
वैचारिक नियंत्रण ही प्रधान उपलब्धि है, यही वैचारिक परिमार्जन संस्कार एवं गुणात्मक परिर्वतन है।
व्यवहार व उत्पादन के लिए विचार ही आधार है। विचार ही सामाजिक एवं असामाजिक है। अध्ययन की चरितार्थता ही स्वयं में, से, के लिए स्पष्ट होना है। वह चैतन्य क्रिया एवं क्रियाकलाप ही है, यही बौद्धिक अध्ययन है।
‘‘नियमत्रय’’ सम्पन्न विचार ही व्यवहार में सामाजिक तथा उत्पादन में सफल हैं।
न्यायपूर्ण जीवन ही सामाजिकता का प्रत्यक्ष रूप है। संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों का निर्वाह ही न्यायपूर्ण व्यवहार है।
न्यायपूर्ण विचार ही प्रबुद्घता के रूप में है। न्यायपूर्ण जीवन ही संयत जीवन है, यही अपव्यय एवं भय से मुक्ति है।
अपव्यय एवं भय में सामाजिकता नहीं है।
संबंध और मूल्य
प्रत्येक संबंध में स्थापित एवं शिष्ट मूल्य स्पष्ट व प्रमाणित हैं। जैसे:-
- माता-पिता के प्रति विश्वास निर्वाह-निरंतरता = गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सरलता, सौम्यता, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा के समर्पण रूप में है।
- पुत्र-पुत्री के प्रति विश्वास निर्वाह-निरंतरता = ममता, वात्सल्य, प्रेम, सहजता, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा के समर्पण रूप में है।
- भाई-बहन की परस्परता में विश्वास-निर्वाह-निरंतरता = सम्मान, गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सौहर्द्रता, सरलता, सौजन्यता, स्नेह, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा अर्पण के रूप में है।
- गुरु-शिष्य के प्रति विश्वास-निर्वाह-निरंतरता = प्रेम, वात्सल्य, ममता, अनन्यता, सहजता, भावपूर्वक प्रबोधन जिज्ञासा पूर्ति सहित वस्तु व सेवा-समर्पण के रूप में है।
- शिष्य-गुरु के प्रति विश्वास-निर्वाह-निरंतरता=गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सरलता, सौजन्यता, अनन्यता-भावपूर्वक जिज्ञासा सहित वस्तु व सेवा-समर्पण के रूप में है।
- पति-पत्नी की परस्परता में विश्वास निर्वाह-निरंतरता = स्नेह, गौरव, सम्मान, प्रेम, निष्ठा, सौहर्द्रता, अनन्यतापूर्वक सद्चरित्रता सहित वस्तु एवं सेवा अर्पण के रूप में है।
- साथी-सहयोगी के प्रति विश्वास-निर्वाह-निरंतरता (व्यवस्था तंत्र में) = स्नेह, सौजन्यता, निष्ठापूर्वक वस्तु व सेवा प्रदान के रूप में है।
- सहयोगी-साथी के प्रति विश्वास-निर्वाह-निरंतरता (व्यवस्था तंत्र में) = गौरव, सम्मान, कृतज्ञता, सौहर्द्रता, सौम्यता, सरलता, भावपूर्वक सेवा समर्पण के रूप में है।
- मित्र की परस्परता में विश्वास निर्वाह, निरंतरता = स्नेह, प्रेम, सम्मान, निष्ठा, अनन्यता, सौहर्द्रता भावपूर्वक वस्तु व सेवा समर्पण के रूप में है।
- व्यवस्था के प्रति भागीदारी का विश्वास निर्वाह, निरंतरता = मानवीयतापूर्ण आचरण, व्यवहार, उत्पादनपूर्वक आवश्यकता से अधिक उत्पादन।
- भागीदारी के प्रति व्यवस्था विश्वास निर्वाह, निरंतरता = न्याय सम्मत अभयतापूर्ण जीवन के कार्यक्रम के लिए शिक्षा को सर्वसुलभता न्याय सम्मत आचरण तथा व्यक्तित्व के संरक्षण, संवर्धन, प्रोत्साहन सहित असंदिग्ध न्यायिक व्यवस्था के रूप में है।
- व्यवस्था सहज परस्परता में विश्वास निर्वाह निरंतरता= स्थायी मूल्यों में आधारित विधि, शिष्ट मूल्यों में आधारित नीति, उत्पादन मूल्यों में आधारित व्यवस्था पूर्वक सिद्घ न्याय व समाधान सर्व सुलभता के रूप में है।
- व्यवस्था एवं संस्कृति की परस्परता में विश्वास निर्वाह = न्याय संगत प्रक्रिया में आश्वासन विश्वसन पूर्वक न्यायानुगमन कार्यक्रम सहित व्यक्तित्व के प्रस्थापन के रूप में है।
- सभ्यता एवं संस्कृति की परस्परता में विश्वास निर्वाह निरंतरता= नौ स्थापित मूल्य में नौ शिष्ट मूल्य, नौ शिष्ट मूल्य में दो उत्पादन मूल्य का अर्पण, समर्पण, समावेश के रूप में है।
- सभ्यता -विधि की परस्परता में विश्वास निर्वाह निरंतरता = प्रबुद्घता, संप्रभुता के रूप में है।
स्थापित नौ मूल्यों ‘‘में, से, के लिये’’ विश्वास-साम्य मूल्य है, जिसके बिना कोई ऐसा संबंध नहीं है जो स्वस्थ हो।
प्रेमपूर्ण मूल्य है। प्रेम अन्य आठों मूल्यों के रूप में प्रकारान्तर से है, क्योंकि प्रत्येक स्थापित मूल्य प्रेम से संबंधित है, जो अनुभव पूर्वक सिद्घ है। यही प्रमाण है।
‘‘सत्य ही प्रेम, प्रेम ही पूर्ण, पूर्ण ही अनुभव, अनुभव ही सत्य है। इसलिए पूर्ण मूल्य में स्थापित मूल्य, स्थापित मूल्य में शिष्ट मूल्य एवं शिष्ट मूल्य में उत्पादन मूल्य समर्पित है।’’
गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया हुआ है। इसलिये जागृति विकास के क्रम में गुणात्मक प्रगति है। इसी क्रम में चैतन्य प्रकृति है। इसके गुणात्मक परिर्वतन के फलस्वरूप ही निर्भ्रमावस्था भी प्रसिद्घ है। यही निर्भ्रम अवस्था पूर्ण मूल्यानुभूति योग्य क्षमता है, इसलिये गुणात्मक परिर्वतन के लिये चैतन्य प्रकृति प्रवृत्त है।
मानव न्यायपूर्ण आचरण पूर्वक निर्भय व समाधानित है।
प्रत्येक मानव न्यायपूर्ण जीने का इच्छुक है, यही सत्यता सामाजिक अखण्डता का आधार है।
परिवार ही बुनियादी व्यवस्था, न्याय एवं शिक्षा है। प्रत्येक मानव के जीवन जागृति और प्रमाणित होने का आधार भी यही है।
मानव का प्रथम परिचय परिवार में स्पष्ट होता है। प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन व्यवहार में प्रमाणित होता है एवं आचरण-प्रकटन का भी परिवार ही बुनियादी क्षेत्र है, उसकी विशेषतानुसार ही विशाल एवं विशालतम सीमा सिद्ध होती है।
समग्रता के अध्ययन को सुलभ बनाना एवं विधि व्यवस्था को सफल बनाना ही मानवीय संस्कृति सभ्यता की अक्षुण्णता को पाना है। यही व्यवहारात्मक जनवाद का प्रत्यक्ष रूप है।
मानव जागृति के अर्थ में गुणात्मक एकता की संभावना है, भोगात्मक भ्रमात्मक एकता की संभावना नहीं है।
मानव मानवीयता के अर्थ में ही गुणात्मक एकता के लिए तृषित है। अस्तु, न्याय का ध्रुवीकरण उसी सीमा में है। ‘‘मानव न्याय का याचक है।’’ इसलिए संज्ञानशील ही एकता के लिये दिशा है, जो बोध, संबोध, प्रबोध-क्षमता के रूप में प्रत्यक्ष है। साथ ही यही अग्रिमता का कारण है एवं गुणात्मक परिर्वतन पूर्वक सतर्कता तथा सजगता के रूप में स्पष्ट है।
संचेतनशील क्षमता ही अनुभव में परमानन्द प्रतिष्ठा, विचार में समाधान प्रतिष्ठा, व्यवहार में प्रेम प्रतिष्ठा है। इस प्रतिष्ठात्रय के लिये मानव अनवरत पिपासु रहा है। ‘‘प्रतिष्ठात्रय ही मानव प्रकृति का लक्ष्य है।’’ वादत्रय का भी अभीष्ट यही है। इसलिए लक्ष्य की अपेक्षा में ही सही-गलत, उचित-अनुचित, विधि-निषेध, पाप-पुण्य का निर्धारण होता है। नियम से ही सुख व दु:ख, जागृति व ह्रास दृष्टव्य है।
अनुभवात्मक अध्यात्मवाद का लक्ष्य परमानन्द प्रतिष्ठा, समाधानात्मक भौतिकवाद का लक्ष्य समाधान प्रतिष्ठा एवं व्यवहारात्मक जनवाद का लक्ष्य न्याय और प्रेम प्रतिष्ठा सूत्र है। यही लक्ष्यत्रय केवल संज्ञानशीलता की गरिमा है। यही इसकी क्षमता, योग्यता, पात्रता में गुणात्मक परिवर्तन का मूल कारण है।
समाधान प्रतिष्ठा की निरंतरता = प्रेम प्रतिष्ठा
प्रेम प्रतिष्ठा की निरंतरता = परमानन्द प्रतिष्ठा है।
प्रेम प्रतिष्ठा ही सतर्कता, परमानन्द प्रतिष्ठा ही सजगता है। वृत्ति व चित्त की एकसूत्रता में समाधान, चित्त व बुद्घि की एकसूत्रता में प्रेम, बुद्घि व आत्मा की एक सूत्रता में परमानन्द प्रतिष्ठा पायी जाती है। यही जागृत मानव में, से, के लिए सहज प्रतिष्ठा है।
न्यायपूर्ण व्यवहार = सुख
सुख की निरंतरता = शान्ति
शान्ति की निरंतरता = संतोष
संतोष की निरंतरता = आनन्द
आनंद की निरंतरता = परमानन्द
नियम पूर्ण उत्पादन, न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार = मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की ओर स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन
मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन = निर्भ्रम ज्ञान
निर्भम ज्ञान = विवेक सम्मत विज्ञान
विवेक व विज्ञान = बौद्धिक समाधान व भौतिक समृद्धि
भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान = सह-अस्तित्व
सह अस्तित्व = अखंडता
अखंडता = सामाजिकता
सामाजिकता = स्वर्गीयता
स्वर्गीयता = अभय
अभय = सुख, शांति, संतोष, एवं आनन्द
मन तथा वृत्ति का निर्विरोध = सुख
वृत्ति व चित्त का निर्विरोध = शंाति
चित्त व बुद्घि का निर्विरोध = संतोष
बुद्घि व आत्मा का निर्विरोध = आनन्द
परम सत्य रूपी सह-अस्तित्व में अनुभूति = परमानन्द
ऐसी अनुभूति ही चैतन्य प्रकृति का चरमोत्कर्ष विकास है। यही परमानंद है।
मूलत: जागृत मानव अनुभूति एवं दृष्टा पद में प्रतिष्ठित हैं। अनुभव मूलक व्यवहार समाधान, समृद्धि मूलक उत्पादन ही मानव जीवन की चरितार्थता है।
स्थापित मूल्यों का अनुभव होता है। उत्पादन पक्ष में समृद्धि ही अनुभव है। जिसके लिये ही सम्पूर्ण प्रयास है। यही इस सत्यता को स्पष्ट करता है कि जीवन सहज कार्यक्रम केवल अनुभव ही है।
सत्ता ही स्थितिपूर्ण है। प्रकृति स्थितिशील है। प्रकृति में विविधता है। यही स्वयं जागृति क्रम व्यवस्था एवं स्थितिवत्ता है। ऐसी स्वीकार योग्य क्षमता का होना या न होना ही जागृति क्रम स्थिति है।
जागृति को प्रमाणित करने के अर्थ में किये गये सभी कार्य व्यवहार उचित है। जो अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होते है। ये सब औचित्यता की कसौटी है।
औचित्यता की स्वीकृति से ही संयमता स्पष्ट होती है जो गुणात्मक परिवर्तन के लिए स्वीकृति है।
संपूर्ण इच्छाएं मूल्यों में, से, के लिए ही हैं।
मूल्यों में, से, के लिए पूर्णता के संदर्भ में इच्छाओं का प्रसव है।
पूर्ण मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, उपयोगिता मूल्य एवं सुन्दरता मूल्य ही मूल्य समुच्चय है
उपयोगिता मूल्य में, सुन्दरता एवं सुन्दरता मूल्य में उपयोगिता समाविष्ट हैं।
गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया है।
संपूर्ण मूल्य का केवल अनुभव ही है।
अनुभव केवल सत्य, सत्य ही पूर्ण मूल्य, पूर्ण मूल्य ही प्रेम, प्रेम ही आनन्द, आनन्द ही अनुभव है। इसी का प्रत्यक्ष रूप सजगता है। जो मानव का अभीष्ट है।
पूर्ण मूल्य में ही जीवन, जीवन का कार्यक्रम स्पष्ट होता है। स्थापित मूल्य के मूल में पूर्ण मूल्य ही मात्र आधार है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति केवल सत्ता में ही है।
‘‘ज्ञान ही प्रेम एवं प्रेम ही ज्ञान है।’’ प्रेम अधिक और कम से मुक्त है, ज्ञानानुभूति ही प्रेम एवं प्रेम का आधार ज्ञान है। यही पूर्णता का प्रधान लक्षण है। स्थापित मूल्य प्रेम की ही स्थिति है।’’
समस्त स्थापित मूल्य प्रेम में, से, के लिए ओत-प्रोत है जिसकी सत्यता स्थिर है। यह त्रिकालाबाध है।
अभयता ही सामाजिकता का प्रत्यक्ष रूप है, यही प्रबुद्घता का भी परिचय है, जिसके बिना मानव जीवन में स्थिरता नहीं है।
स्थिरता का तात्पर्य मानव में अनुभव से है, अनुभव सार्वभौमिक रूप में स्थापित मूल्य है।
अनुभव विहीन मानव सामाजिक नहीं है। सामाजिकता में, से, के लिए अनुभव क्षमता अनिवार्य है। मानवीयता में ही अनुभव, अतिमानवीयता में अनुभव एवं उपकार पूर्ण वैभव प्रसिद्घ है।
अखण्ड सामाजिकता ही मानव जीवन की स्थिरता का प्रत्यक्ष रूप है जो स्थापित मूल्यों की अनुभव योग्य क्षमता पर आधारित है। यह शिक्षा एवं व्यवस्था प्रबुद्घता पर आधारित है।
प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन ही जागृति का प्रत्यक्ष रूप है। यही प्रबुद्घता, संयमता, निर्विषमता, सहजता, अभयता, सामाजिकता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व है।
वस्तुगत व वस्तुस्थिति का दर्शन एवं सहअस्तित्व में अनुभव ही व्यक्तित्व एवंं प्रतिभा का संतुलन है।
मानवीयतापूर्ण जीवन ही संयत जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। मानवीयता पूर्वक किया गया आहार, विहार एवं व्यवहार का सम्मिलित रूप ही व्यक्तित्व है। यही अभ्यास एवं जागृति में पाया जाने वाला सर्वतोमुखी विकास है। यही अभ्युदयशील होने का प्रत्यक्ष लक्षण है। इसलिए ‘‘सुख, शांति, संतोष एवं आनंद स्थापित मूल्यों के अनुभव में ही है। पूर्ण मूल्य में अनुभव ही परमानंद है।’’
सुन्दरता एवं उपयोगिता मूल्य की स्थिरता नहीं है क्योंकि उपयोगिता एवं सुन्दरता स्वयं में एक सी नहीं है, यह सामयिक है, जिसके साक्ष्य में :-
- शब्द, स्पर्श, रूप, रस गंधेन्द्रियों में आवश्यकताएं सामयिक हैं।
- क्षुधा, पिपासा सामयिक हैं।
- संपूर्ण उपयोग सामयिक है।
- महत्वाकाँक्षा, सामान्याकाँक्षा से संबंधित उपयोग सामयिक हैं।
- विनियम सामयिक है।
- वस्तु व सेवा का नियोजन सामयिक है।
इसलिए उपयोगिता व सुंदरता मूल्य सामयिक सिद्घ है।
स्थापित मूल्य, मानव मूल्य, जीवन मूल्य देशकाल से बाधित (सीमित) नहीं है। प्रत्येक संबंध में निहित स्थापित मूल्य निकट व दूर, भूत भविष्य एवं वर्तमान से प्रभावित नहीं है। प्रत्येक स्थापित मूल्य तीनों कालों में एवं सभी देशों में एक सा है।
यह अपरिवर्तनीयता स्वयं में स्पष्ट करती है कि स्थापित मूल्य ही नित्य है, जबकि प्रत्येक इकाई में पाई जाने वाली उपयोगिता एवं सुंदरता का परिणाम व परिवर्तन प्रसिद्घ है।
‘‘मूल्य मात्र अनुभव ही है।’’
क्रिया में मूल्यों की स्थिति का अभाव नहीं है। उसे अनुभव करने की क्षमता के अभाव में वह रहस्य, अज्ञात एवं अप्राप्त है।
उपयोगिता मूल्यों के आधार पर समाज की स्थायी संरचना संभव नहीं है क्योंकि वह स्वयं में स्थायी नहीं है।
स्थापित मूल्यों पर ही समाज संरचना की द्दढ़ता स्पष्ट है। यही सत्यता मानव को अमानवीयता से मुक्त होकर मानवीयता से सपंन्न होने के लिए प्रेरित करती है।
अर्थ ही मूल्य, मूल्य ही अर्थ है। उपयोगिता-मूल्य, शिष्ट-मूल्य में एवं शिष्ट-मूल्य स्थापित मूल्य में समर्पित पाया जाता है। यही संयमता का प्रत्यक्ष रूप है।
मूल्य-दर्शन एवं अनुभव-क्षमता ही संस्कार का प्रत्यक्ष रूप है। संस्कार विहीन मानव नहीं है। मानव का संपूर्ण संस्कार मानवीयता तथा अतिमानवीयता में ही प्रत्यक्ष है।
संस्कार परिवर्तन केवल शिक्षा एवं व्यवस्था से ही है क्योंकि त्रुटिपूर्ण शिक्षा व व्यवस्था के द्वारा ज्ञानी-अज्ञानी, विवेकी-अविवेकी, सबल-दुर्बल एवं अन्य किसी को भी संतुष्टि, समाधान व अभय प्रदान करना संभव नहीं हुआ है, जो स्पष्ट है।
स्थापित मूल्य तथा शिष्ट मूल्य का योगफल ही सामाजिक मूल्यवत्ता है। इसी के आधार पर संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था का प्रथम संरचना प्रारूप है एवं संचालन प्रक्रिया भी है।
सामाजिक मूल्यों की स्वीकार क्षमता = संस्कृति
सामाजिक मूल्योंकी वहन क्षमता = सभ्यता
उपयोगिता व सुंदरता मूल्य समाज मूल्य में समाहित या समर्पित है। व्यवहार में ही इन दोनों की प्रयुक्ति है। इसलिए संपूर्ण प्रयुक्तियाँ जीने के लिए अथवा जीवन के लिए ही है। ‘‘शरीर के लिए समृद्धि एवं जीवन के लिए समाधान व अनुभूति आवश्यक तथा अनिवार्य है।’’
समाधान व अनुभूति ही मानव में पाई जाने वाली विशिष्टता है। यही प्रबुद्घता, प्रभुता एवं अभयता है।
मानव में आवश्यकता से अधिक उत्पादन, न्यायपूर्ण आचरण व्यवहार के रूप में अनुभव प्रत्यक्ष है।
शिष्ट मूल्य ही अनुभव को इंगित करता है, यही सभ्यता व शिक्षा है। प्रत्येक मानव में किसी से शिक्षित होना या किसी को शिक्षित करना प्रसिद्घ है। शिष्टता में ही उपयोगिता व सुंदरता संयत रूप में प्रयुक्त होती है। संयमता ही सदुपयोग है। सदुपयोग एवं सुरक्षा ही सतर्कता का प्रत्यक्ष रूप है। यही सामाजिकता का कार्य-कारण एवं लक्ष्य भी है।
शिष्टता की अभिव्यक्ति प्रसिद्घ है। मानवीयता में शिष्टता की प्रतिष्ठा व अखण्डता है। यही सफल जीवन का प्रत्यक्ष रूप है, जो अखण्ड समाज दश सोपानीय व्यवस्था में अनिवार्यत: अनुवर्तनीय है।