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Tuesday, 19 September 2017

शिक्षा - संदर्भ:समाधानात्मक भौतिकवाद

समाधानात्मक भौतिकवाद (अध्याय:1,2,4,5,6,7,9, संस्करण:2009, पेज नंबर:)
  • मानव स्वाभाविक रूप में ही सुख चाहता हैं भले ही सुख को वह नहीं जानता, इसके बावजूद वह सुख का पक्षधर होता है। अधिकांश मानव सुख के लिए ही रुचियों, प्रलोभनों के पीछे दौड़ते रहते हैं। इस तथ्य के निरीक्षण परीक्षण के उपरान्त यह निष्कर्ष निकलता है कि परम्परा जिन दिशा कोणों में प्रोत्साहित करता है अथवा जितना जागृत हुआ रहता हैं उसी के अनुरूप दिशा निर्देशन कर पाता है। परम्परा का तात्पर्य शिक्षा-संस्कार, संविधान और व्यवस्थाओं का अविभाज्य रूप में क्रियारत होना है। यह एक सहज प्रमाण है कि हर समुदाय किसी न किसी संविधान, शिक्षा, व्यवस्था तथा संस्कार को अपनाया रहता है। इसे इस धरती के सभी समुदायों में निरीक्षण परीक्षण करके देखा जा सकता है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि उन चारों आयामों के संबंध में मानव की कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलता ने सहज रूप में कार्य किया है। अभी तक किसी एक अथवा एक से अधिक समुदायों में स्थापित संविधान व्यवस्था और संस्कार सभी समुदायों के लिए स्वीकृत नहीं हो पाया। सभी समुदायों में मानव विचारशील रहे हैं। समीचीन ज्ञान विज्ञान के अनुरूप अभय और शांति सबको सुलभ होने के उद्देश्य से ही सभी संविधानों की स्थापना हुई है। प्रत्येक समुदाय अपने संविधान के अनुरूप शिक्षा, संस्कार, राज्य और धर्म व्यवस्था पाने की आशा और आकांक्षा से इसमें अर्पित होते आया है। आज भी ऐसी ही स्थितियाँ देखने को मिलती हैं। इस प्रकार सभी समुदायों में संविधान, शिक्षा, संस्कार व्यवस्था संबंधी तथ्यों को सोचते हुए समुदाय चेतना से विवश होकर समस्त कार्य किए गए। फलत: वाद-विवाद व द्रोह-विद्रोह की संभावनाएँ आदिकाल से अभी तक बनी हुई है। यह समस्या विश्व मानव के सम्मुख स्पष्ट है अर्थात् समुदायों के सम्मुख स्पष्ट है। उक्त समस्या के कारण तत्वों का निरीक्षण परीक्षण किया गया। इसका उत्तर यही मिला कि मानव ने मूलत: मानव को पहचानने में सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य को समझने में ही भूल किया है।(अध्याय:1, पेज नंबर:9)
  • ...वर्तमान समय में व्यापारी और अधिकारी समयानुसार बदलते रहते हैं। कभी व्यापारियों के चंगुल में अधिकारी तो कभी अधिकारियों के चंगुल में व्यापारी-इस तालमेल को बैठाने के कार्यक्रम में लगे दिखाई देते हैं। सम्पूर्ण अधिकारी समुदाय इस समय प्रधानत: तीन भागों में बंटे दिखाई पड़ते हैं-
1. कार्यपालिका में प्रशासन कार्यतंत्र और सीमा सुरक्षा में,
2. न्यायपालिका में,
3. विधायिका में -सभी नेता विधायिका के कार्य में लगे है।
इन्हीं के साथ बहुत सारे विभाग समाहित हैं। हर विभाग में अधिकारी होता है। शिक्षा तंत्र भी एक विभाग है। यह कार्यपालिका के अंतर्गत कार्य करता है। आज सर्वाधिक अधिकारी वर्ग संग्रह कार्य में व्यस्त है। विधायिका राजनेताओं के हाथों में हैं और नेता जनादेश के आधार पर चुना जाता हैं जबकि राजा वंशानुगत होता था।(अध्याय:2, पेज नंबर:21)
  • ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए राजाज्ञा का पालन करना भी पुण्य कर्मों में गण्य बताया गया। गुरु की आज्ञा, उपदेश का पालन, शिक्षा ग्रहण ये सब पुण्य के साक्षात स्वरूप ही कहे गये। अर्थात् इन्हें पुण्य का प्रमाण माना गया। इस प्रकार से पुण्य के लिए बताये गये अथवा पुण्य मिलने के लिए जो तरीके बताये गए उसका पालन करने वाले को पुण्यात्मा मान लिया गया। इसके विपरीत जो कुछ भी किया उनको पापात्मा मान लिया गया। इसी के आधार पर धार्मिक दंडनीति तैयार हुई।...(अध्याय:2, पेज नंबर:26)
  • पदार्थावस्था में तात्विक क्रिया में परस्पर परमाणु अंश की निश्चित दूरियाँ स्वयं उनके परस्परता की पहचान को प्रकाशित करता है। साथ ही भौतिक और रासायनिक वस्तुओं का संगठन भी परस्पर अणुओं की पहचान का द्योतक सिद्घ हो जाता है। प्राणावस्था में रासायनिक अणु संरचनाएँ, प्राणकोशिकाओं की पहचान का द्योतक है। यह बीज वृक्ष नियम पूर्वक सम्पादित होते हैं। जीवावस्था में जड़-चैतन्य-प्रकृति का प्रारंभिक प्रकाशन है, जिसमें से शरीर रचना जड़-प्रकृति स्वरूप होने के कारण वंशानुषंगी सिद्घांत पर आधारित रहता हैं। साथ ही जीवन संचेतना जीवावस्था में अध्यास के रूप में प्रभावित रहता है। अध्यास का तात्पर्य परम्परागत कार्यकलापों और विन्यासों को गर्भावस्था से ही स्वीकारने के क्रम में गुजरते हुए जन्म के अनन्तर उसे अनुकरण करने की प्रक्रिया से है। जैसे गाय की सन्तान गाय जैसे कार्यकलापों को करते हुए देखने को मिलता है। इसी प्रकार सभी प्रजाति के जीवों में स्पष्ट है। ज्ञानावस्था में मानव जड़-चैतन्य का संयुक्त प्रकाशन होते हुए मानव शरीर भी प्रधानत: वंशानुषंगी होता है। साथ ही संचेतना संस्कारानुषंगी होता है। इसका साक्ष्य स्वयं शिक्षा-संस्कार व्यवस्था परम्पराएँ है। इससे सिद्घ हुआ कि मानव संस्कारानुषंगी प्रणाली से पहचानने के कार्यकलाप को सम्पादित करता है।(अध्याय:4, पेज नंबर:56)
  • अस्तित्व में, से, के लिए ही सम्पूर्ण अध्ययन है क्योंकि अस्तित्व समग्र ही स्थिति में नित्य वर्तमान है। अस्तित्व न घटता है न बढ़ता है। इसीलिए अस्तित्व में, से, के लिए मानव अध्ययन करने के लिए बाध्य है। क्योंकि यह अध्ययन मानव को अपने जीवन जागृति का साक्ष्य प्रस्तुत करने के क्रम में अपरिहार्य है। फलत: प्रामाणिकता, प्रमाण और समाधान की स्थिति के लिए तत्पर होना पड़ा। इसी क्रम में निर्भ्रमता की अभिव्यक्ति है। इसकी संप्रेषणा भी होती हैं। यही मानव परम्परा की गरिमा और सामाजिक अखण्डता का सूत्र है। यही शिक्षा व्यवस्था और चरित्र में सामरस्यता के स्वरूप को स्पष्ट करता है। यही अनुभवपूर्ण सह-अस्तित्व ही विचारशैली एवं जीने की कला के लिए आवश्यक है।(अध्याय:4, पेज नंबर:58)
  • शिक्षा पूर्वक अथवा प्रबोधन पूर्वक प्रामाणिकता आदान-प्रदान करने की वस्तु है।(अध्याय:4, पेज नंबर:85)
  • चैतन्य इकाईयों में पाया जाने वाला अक्षय बल और शक्तियों की सामरस्यता (प्रामाणिकता और समाधान) स्वयं की परस्परता में और परस्पर इकाईयों में त्रिकालाबाधित साम्य हैं। ऐसी सामरस्यता सार्वभौम रूप में, हम मानवों में प्रामाणिकता और समाधान संपन्न होने की व्यवस्था समीचीन है। यही सम्पूर्ण अनुसंधान, शिक्षा, व्यवस्था, चरित्र और उसकी निरन्तरता का अक्षय स्रोत हैं। मात्रा विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, मनोविज्ञान, व्यवस्था विज्ञान और व्यवहार विज्ञान के मूल रूप में यही प्रमाणिकता और समाधान ही अक्षय स्रोत अक्षय त्राण और अक्षय प्राण है।(अध्याय:5, पेज नंबर:85-86)
  • शिक्षा-संस्कार ही बोध और अवधारणा का एकमात्र स्रोत है। ऐसे स्रोत को सार्थक रूप देने, उसमें प्रामाणिकता और समाधान की निरन्तरता को बनाये रखना चैतन्य-प्रकृति में, से ज्ञानावस्था की इकाई का दायित्व और वैभव होता हैं। (अध्याय:5, पेज नंबर:86)
  • मानव जागृत होकर ही सुखी, समृद्घ तथा सुन्दरतम रूप में दिखाई पड़ता हैं। प्रत्येक मानव सुखी, समाधानित, समृद्घ और सुन्दर रहना ही चाहता है। परंपरा की अजागृति के कारण ही अथवा जागृति पूर्ण न होने के फलस्वरूप ही मानव कुंठा और अभाव से ग्रसित रहता है। यह मानव परंपरा सहज जागृति क्रम में पाये जाने वाले मानव की स्थिति हैं। मानव व्यक्ति के रूप में सदा शुभ चाहता हैं- यह प्रत्येक व्यक्ति में सर्वेक्षण पूर्वक समझ में आता है। व्यक्ति व्यक्ति में शुभ के रूप में जीने की कला और विचार शैली के संबंध में मतभेद बना रहता है। यही मानव में अंतर्विरोध है अथवा अपेक्षा के खिलाफ बाह्य विरोध हैं। यह मानव सहज यर्थाथ नहीं है अपितु परंपरा का भ्रम है। परम्परा प्रचार और शिक्षा के रूप में सर्वाधिक प्रभावशील होती हैं अथवा प्रत्येक मानव को परंपरा में प्रभावित करने के उक्त दो तरीके समर्थ दिखाई पड़ते हैं। इन दोनों का यथार्थ पर आधारित रहना आवश्यक है। उन्माद, भ्रम, सुविधा, भोग- जैसे सम्मोहन के लिए ही सभी शिक्षा देते हैं और प्रचार करते आए हैं। इसी के साथ रहस्य और आस्था भी बनी रही हैं। इसलिए मानव के लिए आशित सुख, समृद्घि, समाधान और सुन्दरता संभव नहीं हो पाई।
समाधान और व्यवस्था अविभाज्य है। समाधान का धारक-वाहकता प्रत्येक मानव में आवश्यकता के रूप में देखने को मिलता है। व्यवस्था समग्रता के साथ ही प्रमाणित होता है। समाधान जागृति का द्योतक है। हर व्यक्ति जागृत होना चाहता है। जागृति का मार्ग प्रशस्त होना ही इसका एकमात्र उपाय है। परंपरा में जागृति का तात्पर्य -शिक्षा-संस्कार, व्यवस्था, संविधान में जागृत मानव का लक्ष्य, स्वरूप, कार्य और प्रयोजन स्पष्ट हो जाने से है। संस्कारों का मतलब स्वीकृति से ही है, अवधारणा से ही हैं। अस्तित्व में जागृत मानव के उद्देश्य से अवधारणा को देखा गया वह है-
1. जीवन ज्ञान
2. अस्तित्व दर्शन ज्ञान
3. मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान
ये ही स्वीकारने के लिए वस्तुएँ हैं। मानव परंपरा में जागृति पूर्णता की वस्तु भी इतनी ही हैं। इन्हीं तीन बिंदुओं में इंगित परम सत्य वस्तु को स्वीकारने योग्य परम्परा ही मानव संस्कार पंरपरा हैं। उक्त तीनों बिंदुओं में इंगित वस्तु की उपयोगिता विधि, सदुपयोगिता विधि, प्रयोजनशील होने की विधि, अध्ययन की अर्थात् शिक्षा की मूल वस्तुएँ है।(अध्याय:6, पेज नंबर:113-114)
  • अस्तित्व में रासायनिक-भौतिक क्रियाकलापों को सह-अस्तित्व सहज विधि से जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना, जागृति का प्रमाण है। सह-अस्तित्व स्वयं व्यवस्था है या कह सकते हैं कि सह-अस्तित्व के रूप में व्यवस्था नित्य वर्तमान है। वर्तमान ही मानव में, से, के लिए अध्ययन की संपूर्ण वस्तु हैं। इस प्रकार से अस्तित्व ही सह-अस्तित्व है। सह-अस्तित्व में विकासक्रम, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना एवं विरचनाएँ अध्ययन के लिए संपूर्ण आयाम है। जबकि अस्तित्व समग्र ही अध्ययन के लिए, संस्कार के लिए, व्यवस्था के लिए संपूर्ण संप्राप्ति है। यह सदा ही मानव में, से, के लिए समीचीन रहता ही है। जितना भी परेशानी, व्यतिरेक और समस्याओं को मानव ने झेला है वह सब शिक्षागद्दी, राजगद्दी और धर्मगद्दी की करामात है। आज की स्थिति में शिक्षा गद्दी प्रधान है। शिक्षा के धारक-वाहक के रूप में सभी दिग्गज, बुद्घिजीवी, नेता, साहित्यकार सम्मान पाना चाह रहे हैं जबकि यह हो नहीं पा रहा है।
जब मैं जागृति पूर्वक अस्तित्व सहज अध्ययन के लिए प्रस्तुत हुआ तब यह पता लगा कि अस्तित्व समग्र ही अध्ययन की वस्तु हैं, तभी यह भी पता लगा कि मानव भी अस्तित्व में अविभाज्य है।  ''मानव जीवन और शरीर का संयुक्त साकार रूप है” - इसे पहले स्पष्ट किया जा चुका है। इसी क्रम में यह भी देखने को मिला कि जीवन ही सह-अस्तित्व में जागृति पूर्वक दृष्टा पद प्रतिष्ठा पाता हैं। यही जीवन तृप्ति का आधार बिंदु हैं और यही जीवन जागृति परंपरा रूप में प्रमाणित होना-रहना सहज जागृति को प्रमाणित करने का अधिकार है। इस क्रम में मानव ही जागृति पूर्वक दृष्टा पद में है- यह ख्यात होता है। ख्यात होने का तात्पर्य है कि इंगित तथ्य सभी को स्वीकार हो चुका है। इसका लोक व्यापीकरण हो सकता हैं और प्रत्येक व्यक्ति इसे स्वीकारने के लिए बाध्य है। इस बाध्यता का तात्पर्य आवश्यकता, विचार, इच्छा, कल्पना के रूप में सहमति से है। जागृति सहज आवश्यकता के संदर्भ में परीक्षण किया जा सकता है। बच्चे, बूढ़े, ज्ञानी, अज्ञानी, गरीब, अमीर सबसे इस बात की परीक्षा की जा सकती है कि जागृति एक आवश्यक तत्व है या नहीं। सबका निष्कर्ष यही होगा कि जागृति आवश्यक है। इस प्रकार मानव में जागृति की आवश्यकता ख्यात होना प्रमाणित है। (अध्याय: 6, पेज नंबर:115-116)
    • प्रामाणिक होने के लिए सह-अस्तित्व रूपी सत्य में अनुभव करना मानव के लिए संभव है। यह सभी को तभी संभव हैं, जब शिक्षा का मानवीयकरण हो जावे। इन तीनों स्थितियों में मानव के वैभवित होने के लिए जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन (अनुभव) ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही प्रधान तत्व है। इस सत्य सहज जागृति को मानव प्रमाणित करें यह एक आवश्यकता है क्योंकि:-
    1. जागृति पूर्वक ही मानव परपंरा सर्वतोमुखी समाधान पूर्वक व्यक्त होता है।
    2. जागृतिपूर्ण मानव परंपरा में ही जागृति पूर्ण शिक्षा-संस्कार सर्व सुलभ होता है।
    3. जागृति पूर्वक ही मानव परंपरा में न्याय और सुरक्षा सर्व सुलभ होता है।
    4. जागृति सहज मानव परम्परा में उत्पादन सुलभता प्रमाणित होता है।
    5. जागृतिपूर्ण मानव पंरपरा में ही आवर्तनशील अर्थ प्रणाली श्रम नियोजन, श्रम विनिमय पद्घति से विनिमय सुलभता होता है।
    6. जागृति पूर्ण मानव परंपरा में ही परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था दस सोपानीय विधि से सर्वसुलभ हो पाता है। ये सभी मानवों को लिए आशित (अपेक्षित), आकांक्षित और आवश्यकीय उपलब्धियाँ हैं। इसके सफल होने के मूल में मानव परंपरा है। अर्थात् मानवीयतापूर्ण शिक्षा, संस्कार, संविधान और व्यवस्था है। यह मानवीयतापूर्ण अथवा जागृतिपूर्ण पद्धति, प्रणाली और नीति से प्रमाणित होता ही है।
    परम्परा में जागृति होना तभी संभव हैं जब परिवर्तन की बेला में सच्चाईयों के आधार पर गहराई के साथ व्यवहार में, प्रमाणों को प्रमाणित करने की निष्ठा, कम से कम एक व्यक्ति में हो। एक से अधिक व्यक्ति में प्रमाणित करने की निष्ठा होना और भी अच्छा है। (अध्याय:6, पेज नंबर:119-120)
    • विविध प्रकार से मानव इतिहास का आज हम अवलोकन कर पा रहे है। उसमें दो स्थल ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिन स्थलों में गहराई, गंभीरता एवं व्यवहार प्रमाण का संयोग हो सकता था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
    1. ऐसा स्थल था, जब आदर्शवाद में आदर्शवादी विचार में, आदर्शवादी व्यवस्था में, आदर्शवादी शिक्षा में, संविधान और संस्कार में लोग अर्पित होने के लिए तैयार हो गए। उस क्षण में व्यवहार प्रमाण को अपरिहार्य रूप में स्वीकार सकते थे। जबकि ऐसा नहीं हुआ, फलत: सार्वभौम व्यवस्था नहीं हो पाई।
    2. ऐसी संभावना अति निकट हुई जब आदर्शवादी विचार से भौतिकवादी विचार में मानव मानस को मोड़ने का मुहूर्त आया। उस समय में भी भौतिकवादी चिंतन ने व्यवहार प्रमाण की आवश्यकता को अनदेखा कर दिया। अब समाधान युग में संक्रिमत होने का समय आ रहा है। अभी कम से कम हम सब संघर्ष से समाधान युग में संक्रमित होना चाह रहे हैं। इससे यह देखने को मिलना बहुत आवश्यक है कि व्यवहार में ''मानवत्व” प्रमाणित होता रहे।
    ''मानवीयता” व्यवहार में प्रमाणित होने का तात्पर्य यही है कि -
    1. हम जीवन ज्ञान में पारंगत रहेंगे। स्वयं के प्रति विश्वास करेंगे श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करेंगे।
    2. अस्तित्व दर्शन में निर्भम रहेंगे।
    3. स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार करेंगे।
    4. तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा करेंगे।
    5. संबंधों को पहचानेंगे, मूल्यों का निर्वाह करेंगे, मूल्यांकन करेंगे।
    यही मानवीयता को व्यवहार में प्रमाणित करने परस्पर तृप्ति और संतुलन का तात्पर्य है। (अध्याय:6, पेज नंबर: 120-121)
    • राज्य का अर्थ संस्कार और व्यवस्था सहज वैभव है। धर्म का अर्थ सर्वतोमुखी समाधान पूर्ण ज्ञान ही संस्कार है, शिक्षा बनाम विद्वत्ता है। मानव का संपूर्ण आधार मानवीयता है यह सह-अस्तित्व में अनुभव प्रमाण सहज विद्वत्ता ही है। प्रमाण भी मानवीयता और विद्वत्ता ही है। शिक्षा भी मानवीयता और विद्वत्ता हैं। संविधान भी मानवीयता और विद्वत्ता है। व्यवस्था भी मानवीयता और विद्वत्ता है। इस प्रकार मानवीयतापूर्ण परम्परा नित्य समीचीन रहते हुए नस्ल, रंग, रहस्य और वस्तु विभिन्न भाषा, पंथ, संप्रदाय अहमतावश अर्थात् अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति, अव्याप्ति, दोषवश विद्वान और ज्ञानी कहलाने वाले राज, धर्म, विज्ञान, स्वास्थ्य, कला और साहित्य शास्त्रियों ने मानव परंपरा के स्थान पर भ्रमित परम्परा की अनुशंसा कर डाली, फलस्वरूप संपूर्ण प्रचारतंत्र ही भ्रम के वशीभूत हो गया। इसीलिए बेहतरीन समाज की परिकल्पना ही उभर न पायी। बेहतरीन समाज का तात्पर्य अखण्ड समाज ही है। इसी भ्रमवश, मानव का वैभव प्रमाणित न हो पाया। जो कुछ भी मानव का वर्तमान कहा जावे वह केवल वंशवृद्घि है अर्थात् जनसंख्या वृद्घि ही वर्तमान रह गया है। मानवीयता अपने स्वरूप में जीवन ज्ञान सहित मानवीयतापूर्ण आचरण ही है। विद्वत्ता का स्वरूप अस्तित्व दर्शन ही है। अस्तित्व को समझना ही अर्थात् जानना, मानना, उसकी तृप्ति बिन्दु का अनुभव करना ही दर्शन है। मानव में पहले बताई हुई दस क्रियाओं के अविभाज्य वैभव को जीवन ज्ञान कहा हैं। इसे स्वयं में पहचानना, जानना, मानना और उसकी तृप्ति बिंदु का अनुभव करना तथा न्याय, धर्म बनाम सर्वतोमुखी समाधान सत्य बनाम अनुभव और प्रामाणिकता पूर्ण विधि से अभिव्यक्त, संप्रेषित और प्रकाशित होना जीवन ज्ञान का तात्पर्य है। 
    जीवन सहज कार्यकलापों में, से बोध और अनुभव हैं। तृप्ति क्रम में सह-अस्तित्व सहज पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था ये सभी अवस्थाएँ सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य-प्रकृति के रूप में नित्य विद्यमान, नित्य वर्तमान है। इस सहज सत्य को जानना, मानना और तृप्ति बिंदु का अनुभव करना, उसकी निरंतरता बनी ही रहना, उसकी अभिव्यक्ति, संप्रेषणा को अध्ययन विधि से सार्थक बना देना, साथ ही स्वानुशासन विधि से जीने की कला को प्रमाणित करना ही दर्शन शास्त्र का सार्थक रूप हैं।(अध्याय:6, पेज नंबर:135-136)
    • अव्यवस्था तीन उन्मादों के रूप में व्याख्यायित होती हैं। मानव में सम्मोहनात्मक उन्माद लाभोन्माद, कामोन्माद तथा भोगोन्माद के रूप में सर्वेक्षित होता है। विरोधात्मक उन्माद द्रोह, विद्रोह और युद्ध के रूप में सर्वेक्षित है। इन्हीं छ: प्रकार के उन्मादों का स्वरूप दिखाई पड़ता है। इसके प्रभाव में कर्ता सहित सभी अव्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ते है। अव्यवस्था मूलत: भ्रम है। ऐसे सर्वेक्षण को संपन्न करना तभी संभव है, जब मानव निर्भम हो और व्यवस्था का स्वरूप तथा अधिकार कम से कम एक मानव के पास हो। मानव इतिहास के अनुसार इस घटना की तीव्र प्रतीक्षा रही। इस बात को इस प्रकार से समझाया जा सकता है कि उन्मादित होते हुए भी मानव ही, इन उन्मादों के परिणाम स्वरूप जो अव्यवस्थाएँ हुई, उसकी समझ के बराबर में पीडि़त भी होते आया। भले ही यह सबमें न हुआ हो अधिकांश लोगों में अव्यवस्था की पीड़ा है। इस सर्वेक्षण के साथ यह भी देखने को मिलता है कि इन उन्मादों को लिए हमारी कला, शिक्षा और शासन रूपी व्यवस्था तंत्र सहायक हो गया हैं। विकल्प के लिए कोई कल्पना भी नहीं रही है इसलिए विवशता पूर्वक इसे झेलने के अलावा दूसरा रास्ता दिखता नहीं। इसी स्थिति में कराहते हुए अधिकांश व्यक्ति इस धरती पर पाये जाते हैं।(अध्याय:6, पेज नंबर:148)
    • पूर्ववर्ती विचारों के अनुसार उक्त उन्मादों के विपरीत कोई चीज है तो वह है भक्ति और विरक्तिवादी निबंध। ये पावन ग्रंथ माने गये और इनका प्रचार करें। इसकी अंतिम परिणति के रूप में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजाघरों के प्रति अथवा पूजा स्थलों के प्रति आस्था केन्द्रीभूत हुई। आस्था के आधार पर बहुत सारे विशिष्ट लोगों को, महापुरुषों को, सामान्य जनों ने अपने आस्था सुमन अर्पित किए। आज भी इस बात को परीक्षण कर देखें, उन्मादों की तुलना में आस्थाएँ राहत सी प्रतीत होती है। इस बात को परीक्षण कर देखा गया है। इसके बावजूद भक्ति और विरक्ति का शिक्षा, व्यवस्था, संविधान और संस्कारों में सार्वभौम होना संभव नहीं हुआ। इसके साथ यह भी देखने को मिला कि विज्ञान शिक्षा अवश्य ही सार्वभौम रूप में शिक्षा क्रम में उतर आया पर यह यंत्र प्रमाण में अटक गया। यह विज्ञान शिक्षा, शिक्षा क्रम में वैभवित होते हुए भी व्यवहार में सार्थक नहीं हो पाया, जैसे- संस्कार, व्यवस्था, संविधानों में और मानव सहज आचरण में सहायक या प्रमाणित नहीं हो पाया। इसमें यही तर्क कर सकते हैं कि शरीर शास्त्रियों के अनुसार मानव को इससे सहायता मिली है। शरीर और स्वास्थ्य संबंधी बातें मानव से ही आरंभित रहीं। इसमें यही अत्याधुनिक तकनीकी, यंत्र और तंत्र सहित किये गये प्रयासों से मानव की औसत आयु बढऩा प्रमुख मुद्दा नहीं है। इसके उत्तर में, अव्यवस्था में प्रभावित होता हुआ मानव दिखता है। अव्यवस्था का प्रधान प्रभाव तीन उन्माद सम्मोहनात्मक और तीन उन्माद विरोधात्मक पाया जाता है जिसका जिक्र ऊपर कर चुके है।
    विकल्प के स्वरूप में अर्थात् अव्यवस्था के विकल्प में, व्यवस्था ही है। अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन व्यवस्था- सार्वभौम व्यवस्था, अस्तित्व सहज व्यवस्था, सह-अस्तित्व सहज व्यवस्था, रासायनिक-भौतिक रचना सहज व्यवस्था, विकास सहज व्यवस्था, जीवन सहज व्यवस्था और जीवन जागृति सहज व्यवस्था को स्पष्ट करता है। इसको अध्ययनगम्य कराना ही सह-अस्तित्ववाद का उद्देश्य है। “सह-अस्तित्ववाद” में “समाधानात्मक भौतिकवाद” एक प्रबंध है।(अध्याय:6, पेज नंबर:149- 150)
    • भौतिक और रासायनिक क्रियाकलापों द्वारा सह-अस्तित्व सहज रूप में ही व्यवस्था और समाधान को प्रकाशित करना स्पष्ट हुआ हैं। सम्पूर्ण वस्तुएँ ही अपना अविभाज्यता वश सह-अस्तित्व रूप में स्पष्ट हैं जैसे अनन्त परमाणु, अनंत अणु, अनंत रचना और अनंत जीवन व्यापक सत्ता में संपृक्त हैं। अत: क्रियाशील है, ''त्व सहित व्यवस्था” के रूप में सहअस्तित्व सहज वैभवित है। इस क्रम में मानव के अतिरिक्त संपूर्ण प्रकृति ही सह-अस्तित्व में ''त्व सहित व्यवस्था” के रूप में व्याख्यायित है। मानव संस्कारानुषंगी व्यवस्था है। इसके फलस्वरूप प्रत्येक मानव को समझदारी के साथ जीने का हक बनता है। परंतु साथ-साथ व्यवस्था को समझने की जिम्मेदारी भी है। समझदारी का स्रोत परंपरा ही है। इस क्रम में लाभोन्मादी, भोगोन्मादी, कामोन्मादी अध्ययन प्रबंधों और उपक्रमों के स्थान पर विकल्प के रूप में ''कामोन्मादी मनोविज्ञान” का विकल्प ''मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” भोगोन्मादी समाज चेतना अथवा ''भोगोन्मादी समाज शास्त्र” के स्थान पर ''व्यवहारवादी समाजशास्त्र” विकल्प है। इसी प्रकार ''लाभोन्मादी अर्थशास्त्र”  के स्थान पर ''आवर्तनशील अर्थ व्यवस्था” का विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित होना स्वाभाविक रहा है, क्योंकि उन्मादों से होने वाली पीड़ाओं से अथवा उन्मादों से होने वाली अव्यवस्थाओं की पीड़ा से अधिकांश मानव पीडि़त हो चुके हैं। भ्रम से बेहोशी की ओर जो घनीभूत होंगे, वे ही इस पीड़ा को नहीं समझ पाएँगे, ऐसे लोग भी कम ही होंगे। अस्तु, इन प्रबंधों को शिक्षा में अपना लेने से शिक्षा का मानवीकरण संभव हो सकेगा। ऐसे आवर्तनशील अर्थचिंतन, व्यवहारवादी समाजशास्त्र और मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान सहज ऐश्वर्य से संपन्न होने के लिए समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद की आवश्यकता, अनिवार्यता हैं ही, जो पहले स्पष्ट की जा चुकी हैं। ये सब उपलब्ध हो गए हैं। इन छ: प्रबंधों को पाने के लिए अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण के प्रतिपादन सहज रूप में, मध्यस्थ दर्शन प्रतिपादित हुआ है। जो स्वयं मानव व्यवहार दर्शन, ''मानव कर्म दर्शन” ''मानव अभ्यास दर्शन” और ''मानव अनुभव दर्शन” की अभिव्यक्ति हैं। इस दर्शन के आधार पर वाद और शास्त्र निर्गमित हुआ। इसे मानव परंपरा में अर्पित करने का संकल्प स्वयं प्रेरित है। इस अनुसंधान के मूल में, अव्यवस्था की समझ में जो पीड़ाएँ थीं, उन्हें दूर करना ही प्रधान कारण रहा है।(अध्याय:6, पेज नंबर:150-152)
    • जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान एवं मानीवयता पूर्ण आचरण ज्ञान ही जागृति और उसके वैभव का स्वरूप है। मानव का सहज शरण मानवत्व ही है। प्रत्येक मानव इस बात को, अपने में ही परीक्षण कर सकता हैं कि मानवत्व किस प्रकार से त्राण और प्राण हैं। इस परीक्षण से यह पता लगा है कि मानवत्व (मानव में, से, के लिए व्यवस्था सूत्र) ही जीवन त्राण का स्वरूप हैं। दूसरी भाषा में जागृति सहज जीवन बल का स्वरूप हैं। समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व इस प्रेरणा का स्वरूप हैं। इस ढंग से मानवत्व की प्रेरकता और कारकता अथवा त्राण स्पष्ट होता है। त्राण से ही प्रेरणायें बलवती और फलवती होती हैं। प्रेरणाओं को फलवती होना ही त्राण की तृप्ति हैं। इस प्रकार त्राण और प्राण, पूरकता विधि से कार्य करते हुए, यह प्रमाण स्वयं में, स्वयं से, स्वयं के लिए प्रमाणित होता हैं। यही जीवन सहज दसों क्रियाओं में सामरस्यता, समाधान और व्यवस्था का प्रमाण हैं। इस प्रकार सह-अस्तित्व में जीवन के समाधान सहज रूप में प्रमाणित होने की संभावना स्पष्ट होती हैं और इसे प्रमाणित कर देखा गया है।
    मानव में समाधान परंपरा प्रामाणिकता पूर्ण परंपरा ही वैभव है। ऐसी सहज परंपरा क्रम में प्रत्येक मानव ऐसी परंपरा में अर्पित होकर, जो एक व्यक्ति ने परम ज्ञान, परम दर्शन एवं परम आचरण किया हैं, उसे सभी व्यक्ति पा सकते हैं, आचरण कर सकते हैं। इसी के आधार पर मानव परंपरा में समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व प्रमाणित हैं। सह-अस्तित्व को जो एक व्यक्ति प्रमाणित करता है, उसे प्रत्येक व्यक्ति प्रमाणित कर सकता है। जो एक व्यक्ति ''परम-त्रय” के आधार पर व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलम्बन को प्रमाणित करता हैं, उसे प्रत्येक व्यक्ति प्रमाणित कर सकता है। जो एक व्यक्ति में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, ''परम-त्रय” के आधार पर प्रमाणित करता है, उसे प्रत्येक व्यक्ति प्रमाणित कर सकता है। यही मानव परंपरा का संस्कारानुषंगी गरिमा, महिमा और वैभव हैं।
    अभी इस क्रम में अर्थात् उपरोक्त कहे गये क्रम में, अस्तित्व में कुछ और अवस्था जुड़कर अथवा पाँचवीं अवस्था जुड़कर सर्व कल्याण मार्ग प्रशस्त होने की कल्पनाओं को क्यों नहीं किया? इसके उत्तर में इस बात को स्पष्ट किया कि:-
    1. प्रत्येक मानव जागृत होना चाहता है।
    2. प्रत्येक मानव जागृत होने के लिए ''परम-त्रय” विधि को अपना सकता है।
    3 प्रत्येक व्यक्ति जागृति और प्रामाणिकता पूर्वक ही व्यवस्था है और व्यवस्था में भागीदारी कर सकता है।
    4. प्रत्येक मानव में ''परम-त्रय” विधि से जागृति समीचीन है।
    इसलिए और कोई आगे अवस्था पैदा होगी, उस समय में अर्थात् कल्पनातीत लंबे समय के बाद सर्वशुभ होने का दिन आवेगा, तब तक अपनी हविश पूरी कर लेवें। इस प्रकार की मनोगतवादी विधि से अपराधों को अपनाने को, इसे सवैध मानने की हïठवादिता को त्याग देना चाहिए। मानवीयता में संक्रमित होना चाहिए और जागृत परंपरा को स्थापित कर लेना चाहिए। जिसमें मानवीयता पूर्ण शिक्षा, मानवीयता पूर्ण संविधान, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था जिसमें सबकी भागीदारी को पा लेना ही सर्व शुभ स्थिति का, गति का प्रमाण हैं। यह मानव के लिए समीचीन है, इसीलिए मानवीयता में परिवर्तित होने की सहज सहमति सर्वाधिक मानव में प्रस्तुत है ही। अभी तक अव्यवस्था पर आधारित शिक्षा तथा परंपरा से छुटकारा पाने का विकल्प नहीं रहा हैं, इसीलिए सर्वाधिक मानव छटपटाते आया है। इस तरह जिस विकल्प की तलाश था, वह आ चुका है और किसी अवस्था के इंतजार की आवश्यकता नहीं है।(अध्याय:7, पेज नंबर:158-160)
    • अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का मूल सूत्र एक ही हैं यह है समाधान। समाधान=सुख। समाधान=व्यवस्था। संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्याकंन क्रिया- ये समाधान है। फलस्वरूप सुखी होना पाया जाता है।
    स्वयं में व्यवस्था, व्यवस्था में भागीदारी ही समाधान, समाधान ही सुख, शांति, संतोष, आनंद है। मानव धर्म सुख ही है। यह जागृति का द्योतक हैं।
    न्याय पूर्वक सुख और शांति, व्यवस्था पूर्वक शांति और संतोष, तथा अनुभव पूर्वक संतोष और आनंद जीवन में प्रमाणित होता है। प्रत्येक मानव इसे अनुभव कर सकता है। ऐसे अखण्ड समाज- परिवार मूलक व्यवस्था, विश्व परिवार में व्यवहार रूप दे सकता है। व्यवस्था कम से कम 100 से 200 परिवारों के बीच में, अर्थात् 1000 से 2000 जनसंख्या के बीच स्वायत्त विधि से सफल हो सकती है। स्वराज्य की परिभाषा ही हैं-स्वयं का वैभव, स्वयं का स्वरूप मानव, मानव के समान वस्तु जीवन है। जीवन का संबोधन ''स्वयं” अथवा ''स्व” है। इस प्रकार जीवन का वैभव ही राज्य है। अस्तु, जीवन का वैभव- स्वराज्य। जीवन वैभव जागृति की अभिव्यक्ति हैं। जागृति का अर्थ सर्वतोमुखी समाधान एवं प्रामाणिकता है। इसका व्यवहार रूप परिवार परंपरा में समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व है। यही एक परिवार से विश्व परिवार तक प्रमाणित होने की वस्तुएँ हैं। इसके क्रियान्वयन क्रम में सर्वमानव के लिए न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता लक्ष्य है। इसकी अक्षुण्णता के लिए शिक्षा-संस्कार, स्वास्थ्य-संयम सहज सुलभ रहेगा। इसको ही ग्राम स्वराज्य व्यवस्था का रूप देने के क्रम में दस सदस्यीय परिवार स्वयं अपने एक परिवार के प्रतिनिधि को, पहचानने की व्यवस्था रहेगी। हर दस (10) परिवार से एक एक सदस्य ''परिवार समूह सभा” के लिए निर्वाचन पूर्वक पहचान करेगा। ऐसे दस परिवार समूह सभा अपने में से एक एक व्यक्ति को ग्राम परिवार सभा के लिए निर्वाचन पूर्वक पहचान करेगा। ग्राम सभा में समाहित दस (10) व्यक्तियों में से सभा प्रधान को पहचाने रहेंगे। ग्राम सभा, ''स्वराज्य कार्य संचालन” समितियों को, मनोनीत करेगी। ऐसी समितियाँ पाँच होगी-
    1. शिक्षा-संस्कार समिति
    2. न्याय सुरक्षा समिति
    3. स्वास्थ्य संयम समिति
    4. उत्पादन कार्य समिति
    5. विनिमय कोष समिति
    इन सबके अपने-अपने कार्य परिभाषित, व्याख्यायित रहेंगे।....(अध्याय:8, पेज नंबर:180-182)
    • मानव का अध्ययन, विधिवत् करने पर पता चलता हैं कि मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में हैं। जीवन जागृति पूर्वक तृप्त होता हैं। तब मानवीयता अपने आप व्यवहार में प्रमाणित होती हैं। अजागृति की स्थिति में जो मानव भ्रमवश व्यक्त होता है; वह अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति और अव्याप्ति दोषों के रूप में मूल्यांकित होता है। इस प्रकार मानव अजागृतिवश जिन स्वभावों को व्यक्त करता है, उसका स्वरूप निम्न तीन प्रकारों से गण्य होता है-
    1. हीनता-जो छल, कपट, दंभ, पाखंड है।
    2. दीनता- यह अभाव, अक्षमतावश प्रताडि़त रूप में देखने को मिलता है।
    3. क्रूरता- यह परधन, पर-नारी, पर-पुरुष और पर-पीड़ा के रूप में देखने को मिलता है। यही अमानवीयता का स्वरूप हैं। यह भ्रमवश ही होने वाला प्रकाशन है।
    मानवीयता मानव का स्वभाव है। यह जागृतिपूर्वक व्यक्त हो पाता है। जीवन ही जागृत होता है। व्यक्त करने वाला मानव ही हैं। यह तीन प्रकार से सार्थक होना पाया जाता है-
    1. धीरता:- यह न्याय के प्रति निष्ठा, दृढ़ता और विश्वास के रूप में दिखाई पड़ता है। यह सब आचरण में प्रमाणित होते हैं। न्याय का मूल स्वरूप जो मानव में दिखाई पड़ता है, यह संबंधों की पहचान और मूल्यों का निर्वाह है। संबंध परस्परता में रहता ही है, उसे पहचानना जागृति हैं। निर्वाह करना निष्ठा है। मूल्यांकन करना व्यवस्था सहज गति है।
    2. वीरता:- यह धीरता सहज रूप में जो अभिव्यक्तियाँ होती हैं, वे रहते हुए दूसरों को न्याय सुलभ कराने में, अपने तन-मन-धन को नियोजन करता है।
    3. उदारता:- यह जागृत सहज रूप में हैं। अविकसित के विकास में, संबंधों को निर्वाह करने में, श्रेष्ठता को सम्मान करने में, परिवार; ग्राम परिवार; विश्व परिवार की उपयोगिता-सदुपयोगिता विधि से तन-मन -धन रूपी अर्थ को सदुपयोग सुरक्षा करते हैं। इस प्रकार धीरता, वीरता, उदारता मानवीय स्वभाव के रूप में देखने को मिलता है।
    आज भी किसी-किसी व्यक्ति में इसे सर्वेक्षित किया जा सकता है। इसे सर्व जन सुलभ करने की योजना और कार्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। इस प्रकार मानव सहज मानवीयता पूर्ण स्वभाव सहज रूप में ही मौलिकता हैं। ऐसी मौलिकता प्रत्येक नर-नारी में जीता-जागता मिलने के लिए व्यावहारिकता में प्रमाणित होने के लिए, परम्परा जागृत रहना एक अनिवार्य स्थिति है। ऐसे मानव सहज मौलिकता किसी समुदाय में अभी तक सार्थक रहा हो, प्रमाणित रहा हो, व्यावहारिक रहा हो, संविधान और व्यवस्था में पहचान बन चुका हो, शिक्षा परंपरा में प्रवाहित हो चुका हो, संस्कार परंपराओं में मानवीयता को पहचाना हो, ऐसा कोई उदाहरण अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए भी विकल्प की आवश्यकता, अनिवार्यता स्पष्ट होती है।(अध्याय:9 (1), पेज नंबर:195-197)
    • व्यवहार में आवश्यकीय जागृति, मानवीयतापूर्ण संचेतना में स्पष्ट हो जाती है। संचेतना का तात्पर्य ही हैं जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना। धीरता, वीरता, उदारता को जान लें, मान लें। मानव सहज मौलिकता सार्वभौम रूप में स्पष्ट होती है। मानव संचेतना सहज जागृति के उपरान्त स्वाभाविक रूप में मोक्ष का स्वरूप समझ में आता है। मोक्ष का स्वरूप हैं- भ्रम से मुक्ति। पूर्ण जागृति की स्थिति में मानव अस्तित्व में अनुभव और उसकी निरंतरता सहज स्थिति को पाता हैं। यही भ्रम मुक्ति रूपी मोक्ष की अवस्था अथवा जागृतिपूर्ण संचेतना की अवस्था है। ऐसी संचेतना मानव में ही होती है, वह भी व्यवहार मानव में प्रमाणित हो पाता है। जागृति के उपरान्त अथवा परम जागृति के उपरान्त मानव अपने आप में प्रामाणिक होता हैं और संबधों की पहचान के साथ ही दया, कृपा, करुणा के रूप में मौलिकताएँ अपने आप व्यक्त होती हैं। इन्हीं अभिव्यक्तियों को जागृति पूर्ण मानव अथवा भ्रम मुक्त मानव में प्रमाणित होना देख सकते हैं। जैसे ही मानवीयता पूर्ण परंपरा अर्थात् मानव संचेतना सहज परंपरा स्थापित होता है, इसके उपरान्त भ्रम मुक्ति सहज स्थिति, उसका प्रयोजन और उसका संभावना अपने आप समझ में आवेगा। अतएव, जागृति पूर्ण मानव की मौलिकता को:-
    1. दया:- जिस किसी में जो कुछ भी पात्रता के लिए अर्हता हो उसके लिए वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हो रही हों, ऐसी स्थिति में उनमें पात्रतानुकूल वस्तुओं को सुलभ करा देना ही, दया का व्यावहारिक प्रमाण है।
    2. कृपा:- जिस किसी में भी वस्तु और प्राप्तियाँ हों उनके अनुरूप पात्रता न हो अर्थात् मानवीयतापूर्ण नजरिया सहित तन-मन-धन का उपयोग, सदुपयोग विधि से सम्पन्नता से है। उनमें पात्रता को स्थापित करा देना कृपा है।
    3. करुणा:-जिस किसी में भी मानवीयता सहज पात्रता, योग्यता भी न हो और वस्तु भी उपल्बध न हो, उस स्थिति में उनको पात्रता और वस्तु तथा (उपयोग, सदुपयोग विधि) उपलब्धियों को सुलभ करा देना, यही करुणा का तात्पर्य हैं।
    इस प्रकार दया, कृपा, करुणा सहज मौलिकता को मानव के कार्य, व्यवहार विन्यास में पहचाना जा सकता हैं। इसकी आवश्यकता रही हैं। यह मानव संचेतना पूर्ण व्यवहार, संविधान, शिक्षा-संस्कार- जब से मानव परंपरा में प्रमाणित होगी तभी से दया, कृपा, करुणा संपन्न देव मानव, दिव्य मानव सहज व्यक्तित्व को परंपरा के रूप में पहचान सकेंगे, निर्वाह कर सकेंगे।
    मानव सहज मौलिकता की पहचान मानव परंपरा में होना एक अनिवार्य स्थिति हैं।
    1. जागृतिपूर्ण मानव परंपरा का तात्पर्य मानवीय शिक्षा, अनुभव मूलक विधि से व्यवहार, व्यवस्थावादी व कारी शिक्षा, मानवीय संस्कार, मानवीय व्यवस्था अर्थात् परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और मानवीयता पूर्ण आचार संहिता संविधान है। यह अविभाज्य रूप में वर्तमान मानवीयतापूर्ण परंपरा है।
    2. मानवीय सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था में सामरस्यता मानवीयतापूर्ण परंपरा है।
    3. जागृतिपूर्ण मानव परंपरा में समाधान,समृद्धि, अभय, सह- अस्तित्व सर्वसुलभता वर्तमान रहता है।
    4. प्रत्येक परिवार के लिए, में, से न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता वर्तमान होता है। (अध्याय:9 (1), पेज नंबर:197-199)
    • मानवीयता पूर्ण व्यवहार, व्यवस्था, संविधान, शिक्षा-संस्कार के साथ-साथ आहार, विहार, व्यवहार, व्यक्तित्व और प्रतिभा में संतुलन को प्रमाणित करने के लिए अति आवश्यक है।(अध्याय:9(1), पेज नंबर:200)
    • धर्म गद्दी की असफलता:-शक्ति केन्द्रित शासन रूपी राज्य और अनुग्रह, वरदान, मोक्ष जैसे आश्वासन रूपी धर्म; अनुग्रह, वरदान, मोक्ष पाने के लिए तमाम प्रकार की साधनाएँ, तप, अभ्यास जैसी बातें धर्म के रूप में देखने को मिली। हर परंपरा में जो साधना किया, उसी परंपरा का सम्मान बढ़ते गया। परंपरा में साधना का तात्पर्य समुदाय परंपरा में प्रचलित साधना के उपक्रम से है। प्रत्येक साधक जो अथक परिश्रम से तप और अभ्यास किया, जितना समय भी किया, वह सब व्यक्ति पूजा में समा गया। जबकि प्रमाण परंपरा अपेक्षित रहा, वह अभी भी प्रतीक्षित है। ऐसी कोई साधना, उपक्रम, ज्ञान, दर्शन, कर्मकाण्ड, शिक्षा, संस्कार, अभ्यास नहीं निकल पाया जो सर्वशुभ समाधान सहज हो। कम से कम अधिकांश महापुरुष, यति, सती, संत, सिद्घ, तपस्वी, योगी इस धरती में स्थित अनेक समुदाय संबंधी कटुताएँ दूर करने के पक्ष में थे। उनसे भी उन-उन समुदायों संबंधी कटुताएँ दूर नहीं हो पाई। हर समुदाय में कर्म, धर्मशास्त्र लेकर चलने वाले समुदाय, ज्यादा से ज्यादा कट्टरता का परिचय दिये। जिसको सामान्य मानव ने यंत्रणा के रूप में पाया।....(अध्याय:9(4), पेज नंबर:235)
    • अस्तित्व सहज राज्य, धर्म, समाज व्यवस्था और उसकी निरंतरता की व्याख्या:- मूलत: अस्तित्व ही वैभव है, वैभव ही राज्य हैं।  अस्तित्व में मानव का अविभाज्य होना भी स्पष्ट हो गया हैं। सह-अस्तित्व के रूप में ही संपूर्ण वैभव हैं, क्योंकि सत्ता में सभी अवस्थाएँ अविभाज्य हैं। इनका अलग-अलग विभाजित कर देखना संभव नहीं है। सत्ता में सभी अवस्थाएँ समाहित होना दिखाई पड़ता हैं। सत्ता व्यापक हैं। सत्ता न हो, ऐसी किसी स्थली की कल्पना भी नहीं हो सकती है। सत्ता में ही संर्पूण वस्तुओं का होना पाया जाता हैं अर्थात् अस्तित्व ही संपूर्ण वस्तु है। सह-अस्तित्व ही मूलत: सम्पूर्ण अस्तित्व हैं। इस प्रकार समग्रता सहज अविभाज्यता का मूल सूत्र अथवा परम सूत्र सत्तामयता में संपृक्त प्रकृति ही है। इसलिए सत्ता में ही सम्पूर्ण अवस्थाएँ नियमित, नियंत्रित, संतुलित और समाधानित रहना देखने को मिलता हैं। इन सभी तथ्यों में सह-अस्तित्व ही परम सौंदर्य, परम सुख एवं परम समाधान और परम सत्य हैं। अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व हैं। ऊपर वर्णित विश्लेषणों, निष्कषों के आधार पर धर्म और राज्य का मूल रूप सह-अस्तित्व नित्य व्यवस्था होना ही इंगित होता हैं। क्योंकि सह-अस्तित्व सहज कार्यकलाप और वैभव ही हैं सम्पूर्ण ''त्व” सहित व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी का ताना-बाना। कोई भी अवस्था और ऐसी कोई इकाई दिखाई नहीं पड़ती है, जो इस ताना-बाना से अलग रहे। खूबी यही है कि सत्ता स्वयं अस्तित्व में अविभाज्य हैं। इस प्रकार अस्तित्व अपने में सम्पूर्ण स्वरूप और वैभव है। यही व्यवस्था है। इसलिए मानव का स्वयं में व्यवस्था होना और व्यवस्था में भागीदारी सहज कार्य में अपने को वैभवित कर पाना ही कर्म-स्वतंत्रता कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु हैं। कल्पनाशीलता का तृप्ति स्वराज्य व्यवस्था में हो जाता हैं। इसकी निरंतरता का सहज वैभव होता है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का वैभव हैं। इसी में प्रत्येक मानव मानवत्व सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण प्रस्तुत कर पाता है। यही परिवार मानव होने के आधार पर परिवार मूलक विधि से सर्वसुलभ हैं, यह समझ में आता हैं। अस्तु, परिवार मूलक विधि से गुंथा हुआ विश्व परिवार ही, समाज रचना का क्रियाकलाप है और निरंतर गति है। ऐसे परिवार का भी व्यवस्था का स्वरूप होना स्वाभाविक है। व्यवस्था, अपने आप में न्याय, उत्पादन, विनिमय में भागीदारी हैं। यह परिवार से विश्व परिवार पर्यन्त सूत्रित व्याख्यायित तथ्य हैं। इन आधारों पर ''व्यवस्था समाज का वैभव हैं और धर्म समाज का स्वरूप हैं।” मानव का मानवत्व सहित व्यवस्था होना समाज हैं और समग्र व्यवस्था हैं - न्याय, उत्पादन, विनिमय में भागीदारी। यही समग्र व्यवस्था का तात्पर्य है। इनकी निरंतरता के लिए दूसरी भाषा में, मानव परंपरा में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी निरंतर वैभवित होने के लिए, मानवीय शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य-संयम रूपी स्रोत के साथ ही मानव परंपरा का जागृत वैभव स्पष्ट हो जाती है।(अध्याय:9(4), पेज नंबर:240-242)
    • मानव हर हालत में सुख ही चाहता हैं, न जानते हुए भी समाधान ही चाहता है। इसके बावजूद समस्या उत्पन्न कर देता हैं। मानव के चाहने और होने के बीच में जानना, मानना, पहचानना एक आवश्यकता है। समुदाय परंपरा में प्रत्येक व्यक्ति अर्पित रहता है। प्रत्येक समुदाय परंपरा इस दशक तक भ्रमित है, इसका साक्ष्य ही हैं कि मानव सर्वतोमुखी समाधान, सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज और इनमें पारंगत और भागीदार होने के सारे अध्ययन को और प्रमाणों को शिक्षा पूर्वक संस्कार पूर्वक, संपन्न नहीं कर पाये हैं।(अध्याय:9(4), पेज नंबर:242-243)
    • जानना, मानना, पहचानना ही संस्कार है। संस्कारानुषंगीयता ही मानवीय व्यवस्था का आधार है:-दृष्टिगोचर, ज्ञान गोचर में से पहले सह-अस्तित्व में ही पदार्थावस्था, ''त्व” सहित नियम को परिणामानुषंगीय विधि से, संपन्न कर देते हैं। यही पदार्थावस्था के नियमित रहने का तात्पर्य हैं। प्राणावस्था में नियमित विधि से ''त्व” सहित व्यवस्था बीजानुषंगीय प्रक्रिया पूर्वक नियंत्रित रहना पाया जाता है। जीवावस्था अपने ''त्व” सहित व्यवस्था को वंशानुषंगीय विधि से संतुलित रूप में प्रमाणित करते हैं। मानव ज्ञानावस्था में एक मौलिक वैभव हैं। यह वैभव दृष्टा पद व जागृति सहज प्रमाणों के रूप में परंपरा हैं। ऐसा दृष्टापद जागृति सहज परंपरा में निरंतर सफल होता है। मानव परंपरा संस्कारनुषंगीय अभिव्यक्ति हैं। वंशानुषंगीयता केवल शरीर तक ही प्रक्रियाबद्घ है। मानव की अभिव्यक्ति जीवन प्रधान हैं, न कि शरीर प्रधान। यद्यपि शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में ही मानव ख्यात है। जीवन में ही संस्कारों की स्वीकृति और जागृति प्रमाणित होती हैं। संस्कार जानने, मानने, पहचानने और प्रमाण रूप में निर्वाह करने की प्रक्रिया हैं। इसकी जागृति जानना, मानना को पहचानना और निर्वाह करना ही है। संस्कार प्रक्रिया परिवार परंपरा में, से, के लिए प्रदत्त होती है। संस्कार प्रक्रिया का यही प्रमाण हैं और चेतना विकास मूल्य शिक्षा संस्कार है। इस प्रकार संस्कार परंपरा और विधि प्रक्रिया के रूप में संस्कार स्पष्ट हो जाता है। यही मानव संचेतना सहज महिमा है। मानव का संपूर्ण संस्कार व प्रमाण जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही है। यह निर्भम विधि से न्याय, धर्म, सत्य सहज प्रकाशन है। अर्थात् निर्भम पूर्ण विधि से प्राप्त जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना स्वयं न्याय, धर्म, सत्य का प्रमाण ही है। यही मानवीयतापूर्ण अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन सहज रूप में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी है।(अध्याय:9(4), पेज नंबर:246-247)
    • न्याय:- संबंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभयतृप्ति है। मौलिकता न्याय का स्वरूप सहज रूप में ही संबंध मूल्य और मूल्यांकन ही है। यह मानव संबंध, नैसर्गिक संंबंध और उत्पादन सबंध के रूप में स्पष्ट होता है। मानव संबंध व्यवहार सूत्र का स्वरूप हैं। नैसर्गिक संबंध पूरकता सहज सत्यता हैं। उत्पादन संबंध उपयोगिता सहज सबंध हैं। इनमें उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन और कला मूल्य की स्थापना और उसके मूल्यांकन के रूप में हैं। आवर्तन विधि संपन्न विनिमय प्रक्रिया पूर्वक व्यवहारिक होना पाया जाता हैं मानव संबंध समाज रचना का आधार हैं। परिवार मूलक विधि से समाज रचना निरंतर सहज हैं। मानवत्व ही परिवार संबंधों की तृप्ति का सूत्र है। परिवार ही विश्व परिवार के रूप में अखण्ड समाज हैं। परिवार रचना के साथ व्यवस्था की अभिव्यक्ति एक अनिवार्य स्थिति हैं। व्यवस्था सहज अभिव्यक्ति क्रम में न्याय, विनिमय और उत्पादन प्रधान प्रक्रिया हैं। न्याय प्रक्रिया में स्थापित एवं शिष्ट मूल्यों का मूल्यांकन मौलिक हैं। विनिमय प्रकिया में श्रम मूल्यों का मूल्यांकन मौलिक हैं। उत्पादन कार्यों में अथवा उत्पादन विधि में श्रम नियोजन मौलिक हैं। इस प्रकार मौलिकता त्रय पूर्वक सार्वभौमिकता और अक्षुण्णता सहज होता है। इसी अभिव्यक्ति के लिए मानवीय शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य-संयम आवश्यकीय कार्यक्रम हैं। इसी के आधार पर सार्वभौम व्यवस्था और अखण्ड समाज रचना के लिए, मानव का जागृत होना पाया जाता है। (अध्याय:9(4), पेज नंबर:247-248)
    • जागृत मानव परम्परा का प्रभाव शिक्षा-संस्कार, संविधान और व्यवस्था के रूप में देखने को मिलता है। वर्तमान परंपरागत विधियों से अप्राप्ति की प्राप्ति तथा अज्ञात का ज्ञात होना संभव नहीं हैं। इसलिए अस्तित्व सहज वैभव का चिंतन, साक्षात्कार, विचार, अनुभव, व्यवहार, व्यवस्था, संविधान, अध्ययन बनाम शिक्षा-संस्कार- बनाम दर्शन-ज्ञान सहज रूप में जीना, क्रियारत रहना अनिवार्य हो गया। इस क्रम में अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण, मानवीय व्यवस्था, मानवीय संविधान, मानवीय शिक्षा, मानवीय संस्कार सर्व सुलभ होने का मार्ग प्रशस्त होता है। इन मूलभूत सिद्घांतों को हृदयंगम करना एक आवश्यकता है। अनुभव पूर्वक मानव के दृष्टा पद में होने की साक्षी में ही मूलभूत सिद्धांतों को समझा गया है।
    1. मानव जाति एक, कर्म अनेक।
    2. मानव धर्म एक, मत अनेक।
    3. सत्ता व्यापक रूप में एक, देवता अनेक।
    4, यह धरती एक (अखण्ड राष्ट्र ) राज्य अनेक।
    उक्त चार एकता और अनेकता का सिद्घांत समझ में आता है। अस्तित्व सहज प्राकृतिक रूप में अथवा सह-अस्तित्व के रूप में एकता अपने आप स्पष्ट है। मानव समुदाय की भ्रमित मान्यताओं एवं इन यथार्थताओं में मतभेद ही समस्या के रूप में स्पष्ट है। (अध्याय:9(5), पेज नंबर:252-253)
    • परिवार मूलक विधि से परिवार मानव होने के प्रमाण के रूप में, संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह करता हैं, फलस्वरूप समाधान होता है। 
    मानव, मानवीय शिक्षा-संस्कार पूर्वक, जीवन-ज्ञान और अस्तित्व दर्शन सहज जागृति संपन्न होता है। फलस्वरूप सर्वतोमुखी समाधान जैसे- अस्तित्व में सह-अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना संबंधी निर्भ्रम ज्ञान संपन्न होता है। इसके फलस्वरूप, सर्वतोमुखी समाधान सहज अभिव्यक्ति होती है।
    मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र, नैतिकता का अविभाज्य समाधानों को अभिव्यक्त करता है। फलस्वरूप समाधान प्रमाणित होता है।
    स्वास्थ्य, संयमपूर्वक जागृति (सहज) को अभिव्यक्त करता है, फलस्वरूप सर्वतोमुखी समाधान सुलभ होता हैं।
    मानव के जागृति सहज अभिव्यक्ति क्रम में वह आवर्तनशील अर्थ व्यवस्था को समझ पाता हैं और निर्वाह कर पाता है, इसलिए समाधान होता हैं।
    जागृत मानव, अभिव्यक्ति सहज रूप में, मानव सहज व्यवहार में सफल हो जाता हैं। यह संबंधों, मूल्यों, मूल्यांकनों, दायित्वों, कर्तव्यों को निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होता है। इसलिए समाधानित होता है।
    जागृत मानव की प्राप्त सत्तामयता में ये सहज स्थिति और गति होती है। अर्थात् अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन होता है। फलस्वरूप समाधानित होता है।
    जागृत मानव मानवीयता पूर्ण आचरण करता ही है जीवन ज्ञान और अस्तित्व दर्शन ज्ञान संपन्न रहता है। इसलिए मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी संविधान के प्रति जागृत रहता है, अत: समाधानित रहता हैं।
    जागृत मानव, सहज रूप में, जागृतिपूर्ण संचेतना का प्रमाण संपन्न रहता हैं। इसलिए मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान अर्थात् मानसिकता सहज रूप में जीने की कला को व्यक्त करता है, फलत: समाधान ही होता है।
    इसलिए मानव अपनी ही जागृति पूर्वक अथवा जीवन जागृतिपूर्वक सर्वतोमुखी समाधान सहज अभिव्यक्ति हैं यह समझ में आता है। इस प्रकार मानव धर्म सतत् वर्तमान है, समीचीन है। जागृत होना मानव की दीक्षा है, अभीप्सा हैं। इसकी संभावना है, इसलिए मानव धर्म के प्रति जागृति एक आवश्यकता है। अस्तु, मानव धर्म को खण्ड-विखण्ड नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अखण्ड समाज के रूप में सार्वभौम व्यवस्था ही मानव धर्म है। समाधान का प्रमाण ही सुख हैं, सुख मानव धर्म है। इस प्रकार मानव से, मानव धर्म का वियोग होता नहीं, क्योंकि समाधान सार्वभौम है। इसलिए इसका प्रभाव सुख सार्वभौम हैं। समाधान अखण्ड है, भाग- विभाग होता नहीं।(अध्याय:9(5), पेज नंबर:257-258)
    • ....ऐसे शरीर को चलाने वाला जीवन ही होता हैं। जो आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा एवं प्रमाण के रूप में ही शरीर संचालन में प्रमाणित होता हैं। ऐसा जीवन शरीर को, जीवंतता प्रदान किये रखता हैं। आशा आदि के अनुुरूप इंद्रियाँ संचालित हो पाती हैं। इस विधि से, शरीर और जीवन को संयुक्त रूप में होना सहज रहा है। जीवन, अपने अनुसार, जागृति क्रम में जागृति पूर्णता को व्यक्त करने के लिए मानव शरीर को संचालित करता हैं। यह परंपरा में प्रमाणित है। (जीवन, शरीर को जीवंतता प्रदान करने के क्रम में भ्रमवश शरीर को, जीवन मानना आरंभ करते हुए, न्याय का याचक (न्याय पाने के इच्छुक) सही कार्य-व्यवहार करने को इच्छुक और सत्य वक्ता के रूप में होने की स्थिति में, जीवन का आशय पूरा होना सहज नहीं हैं। अभी तक जागृत परम्परा न होने के कारण, आकस्मिक रूप में ही कोई-कोई जागृत हो पाते हैं। जिसके लिए अप्रत्याशित विधियों को अपनाना भी पड़ता हैं। परंपरा से, जीवन की प्रत्याशा, न्याय प्रदायिक क्षमता प्रमाणित होने के लिए दिशा, ज्ञान, दर्शन और आचरण परंपरा में प्रमाण के रूप में मिल जाए, उसके आधार पर प्रत्येक विद्यार्थी को संस्कार पूर्वक शिक्षा मिल जाए, यही मूल आवश्यकता है।) इसी के साथ सही कार्य-व्यवहार करने को प्रमाणों सहित अभ्यास संपन्न होने की संस्कार व्यवस्था, कार्य व्यवस्था सुलभ रूप में पंरपरा से सबको मिलने पर ही तथा सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य में अनुभव करने का मार्ग स्पष्ट हो जाने से ही मानव परंपरा का गौरव प्रमाणित होता हैं। ऐसी परंपरा को लाने के लिए, स्थापित होने के लिए, समाधानात्मक भौतिकवाद एक कड़ी हैं। और इस क्रम में यह तथ्य अवगाहन होना एक आवश्यकीय तत्व हैं कि जो जिससे बना रहता है अर्थात् जिससे रचित होता है चाहे कितनी भी बड़ी रचना हो, मूलत: जो वस्तु है वह समूची रचना उतनी ही हैं। जैसे - यह धरती निश्चित संख्यात्मक प्रजात्यात्मक परमाणुओं, अणुओं, कोषाओं से रचित रचनाएँ यह पूरी धरती उसी के समान ही है। (अध्याय:9(7), पेज नंबर:276-277)
    • उद्योग, आवश्यकता, संबंध और संतुलन-
    मानव का निरीक्षण करने पर पता लगता है कि परिवार मानव विधि से मानव में आवश्यकताएँ प्रतीत होती हैं। परिवार मानव का तात्पर्य एक से अधिक समझदार मानव परस्पर संबंध को पूरक विधि से पहचानने के फलस्वरूप आवश्यकताएँ अपने आप प्रतीत होती हैं। प्रतीत का तात्पर्य - प्रत्येक रूप में प्रमाणित होने का प्रयास उदय हैं। इसे प्रत्येक दो या दो अधिक मानव परस्परता में पूरकता की अपेक्षा करता हो, विश्वास करता हो ऐसी स्थिति में ही आवश्यकताएँ समझ में आती हैं। यथा जानने, मानने में आता हैं, फलस्वरूप प्रयासोदय होना पाया जाता हैं। प्रयासों की प्रक्रिया रूप में प्राकृतिक ऐश्वर्य पर विशेषकर वन, खनिज पर श्रम नियोजन होना, फलस्वरूप आवश्यकता के रूप में प्राकृतिक ऐश्वर्य परिवर्तित होना पाया जाता हैं।
    1. पत्ते से तन ढंकना है, तो उसके लिए समुचित प्रक्रिया करना ही होगा। तभी पत्ते से तन ढंकने की आवश्यकता पूरी होगी।
    2. यदि पेड़ के छालों से तन ढंकना है, उस स्थिति में आने के लिए भी समुचित प्रक्रिया करना ही होगा।  तभी तन ढंकना बन पाएगा।
    3. रुई से तन ढंकने की जब बारी आई, तब उसके लिए समुचित प्रक्रिया मानव ने प्रमाणित की। फलस्वरूप कपड़े से मानव तन ढंकता हुआ देखने को मिला।
    4. पत्तों से यदि आवास, फूस से आवास, झाड़ो से आवास, झाड़ पत्ते, फूल से आवास बनाने की आवश्यकता के आधार पर ही प्रक्रियायें प्रमाणित होती हैं।
    तो इसी क्रम में मिट्टी, पत्थर के संयोग से मकान; लोहा, सीमेंट से मकान; लकड़ी, लोहा, मिट्टी, पत्थर, सीमेंट से मकान की आवश्यकता के साथ-साथ विविध प्रकार-आकार वाले आवासों को आज देखा जा रहा हैं। इसे आज मानव की आवश्यकता के आधार पर प्रसवित अथवा उत्पन्न कल्पनाशीलता और उसके क्रियान्वयन क्रम में प्रमाणित प्रक्रियाएँ स्पष्ट हुई हैं, इसी क्रम में गतिशील यंत्रों का धारक-वाहक, यंत्रों की आवश्यकता के आधार पर अनेकानेक यंत्रों की परिकल्पाएँ और प्रक्रियाएँ प्रमाणित हुई। इन आवश्यकताओं के साथ ही, उत्पादन के रूप में प्रक्रियाएँ प्रमाणित करते आए। इसी प्रक्रिया में पारंगत होने, प्रमाणित करने की भूमिका को मानव ने निर्वाह किया। इन्हीं प्रक्रियाओं को तकनीकी नाम दिया गया। ऐसी प्रक्रियाओं को विधिवत् प्रशिक्षित करने को, शिक्षित करने का, कर्माभ्यास करने का प्रावधान मानव परपंरा ने स्थापित कर लिया। यही तकनीकी प्रौद्योगिकी विज्ञान-शिक्षा कहलाता है। इस समय में अर्थात् बीसवीं शताब्दी के अंत में दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन संबंधी और भारवाहक संबंधी सभी यंत्रों को मानव परंपरा ने प्राप्त कर लिया। ये सब उपलब्धियाँ मानव को अच्छी भी लग रही हैं। मानव में इसे बनाये रखने की इच्छा और संकल्प भी समझ में आता हैं। मानव ने ही इन सब यंत्रों का निर्माण किया है।... (अध्याय:9(10), पेज नंबर:301-302)
    • मानव सहज शरीर यात्रा, जीवन और शरीर के संयुक्त यात्रा के प्रयोजनों को देखने पर पता लगता हैं कि जागृति अर्थात् जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना, उसकी तृप्ति और निरंतरता का होना ही हैं। यही प्रामाणिकता, स्वानुशासन, सर्वतोमुखी समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व के रूप में प्रमाणित होना ही हैं। यही व्यवसाय, व्यवहार, समाज व्यवस्था, विचार और अनुभव सहज रूप में वांछित, आवश्यकीय चिरप्रतीक्षित घटना है अथवा उपलब्धि है। उल्लेखनीय बात यही है कि अब संपूर्ण सौभाग्य, मानव के लिए करतलगत होना संभव हो गया हैं। इस क्रम में प्रत्येक मानव, प्रत्येक परिवार, सम्पूर्ण मानव के तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा सहज रूप में होगी। फलस्वरूप पर्यावरणीय नैसर्गिक समस्या, प्रदूषण समस्या, न्याय समस्या, सुरक्षा समस्या, उत्पादन समस्या, विनिमय समस्या, शिक्षा-संस्कार समस्या और स्वास्थ्य-संयम समस्याएँ दूर होंगी। (अध्याय:9(10), पेज नंबर:317-318)
    • ......जल संरक्षण क्रम में अधिकाधिक जल को एकत्रित कर रख लेना, कृषि के लिए, हरियाली के लिए उपयोगी होना पाया जाता हैं। उसी के साथ-साथ वातावरण सहज ऊष्मा के प्रभाव से जब धरती से पानी का वाष्पीकरण होता है, वह जितना अधिक होगा, उतना ही अधिक वर्षा होने की संभावना बन पाता है। इसमें यह भी ध्यान देने की बात आती हैं कि जैसे-जैसे युद्घोन्माद और लाभोन्माद घटता जायेगा वैसे ही क्रम से समुद्र, धरती का वायुमंडल, धरती के भीतर जो खलबली मानव ने उन्मादवश पैदा किये हैं, वह शनै:-शनै: कम होने की संभावना बनती हैं। अभय सहज मानव परंपरा में युद्घ की आवश्यकता शनै:-शनै: कम होते हुए कुछ समय के अनंतर शून्य हो जाता है। अर्थात् नियंत्रित हो जाता है अर्थात् जागृति सहज नियंत्रण प्रभावशील होता है। दूसरा, अपव्यय समाप्त होने लगता हैं। सद्व्यय, सार्थकता, सुरक्षा अवतरित होने लगती है। फलस्वरूप आवश्यकताएँ संयत हो जाती है। उत्पादन की तादाद वह भी यांत्रिकता संबंधी वस्तुओं का (अनावश्यक) उत्पादन न्यूनतम होते जाता हैं। फलस्वरूप इससे संबंधित वस्तुओं की आवश्यकता कम हो जावेगी। सदुपयोग की विधि में आज भी यंत्रों का उपयोग न्यूनतम हो जाता हैं। सुविधा, मनमौजी, रंगरैली कार्यक्रमों के लिए भय तथा प्रलोभन नहीं रहता। भ्रमवश लाभोन्मादी, कामोन्मादी, भोगोन्मादी विधि से आज सर्वाधिक यांत्रिक उपकरणों का उपयोग होता हुआ आंकलित होता हैं। ये सब इसमें से व्यर्थता जिन-जिन में मूल्यांकित होता है, कम होना स्वाभाविक है। यंत्र दूरसंचार, दूरदर्शन समाज गति के अर्थ में अवश्य रहेगा, जो परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था (जो एक परिवार में विश्व परिवार रूप में समाज रचना, उसकी व्यवस्था) का तालमेल बनाए रखने के लिए उन यंत्रों का उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशीलता रहेगी। हर परिवार मानव के लिए हर देश, हर काल में समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व सहज विधि से जीने की कला वर्तमानित रहेगी।
    ऊपर कहे अनुसार व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी को जीता हुआ मानव में उत्सवशील रहने के आधार पर अपव्ययता अपने आप समाप्त हो जाती हैं। इसलिए यंत्रों की आवश्यकता कम हो जावेगी। फलत: कोलाहल, भय, सशंकता समाप्त होती जायेगी; उत्साह, उत्सव, नित्य उमंग निरंतर उद्गमित होता जायेगा। फलस्वरूप सुख, समाधान, सौंदर्य बोध निरंतर सुलभ रहेगा। इसलिए चंचलता-कौतूहल अपने आप समाप्त होते जाएगा। हर यात्रा; परीक्षण, निरीक्षण, सर्वेक्षण, अध्ययन, अध्यापन और व्यवस्था में श्रेष्ठता के ध्रुवों पर शिक्षा प्रदान करना और शिक्षा ग्रहण करने के अर्थ में परंपरा सहज होगा। (अध्याय:9(10), पेज नंबर:324-325)
    • परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था विधि से ही न्याय-सुलभता और लाभ-हानि मुक्त विनिमय सुलभता संभव हो जाती हैं। ऐसा संभव होने पर संग्रह के स्थान पर समृद्घ होना ही हैं। प्रत्येक परिवार मानव आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने के क्रम में समृद्घि का अनुभव करता हैं। न्याय सुलभ होने से मानव वर्तमान में विश्वास करता ही हैं। फलत: सभी ओर समाधान नजर आता है। इसी सत्यतावश समृद्घि सहित परिवार मानव व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हो जाता है।
    हर परिवार में आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने के आधार पर प्रत्येक परिवार में शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति के अर्थ में निश्चित उत्पादन-कार्य विधिवत् निर्धारित रहना संभव हो जाता हैं। फलस्वरूप उत्पादन सुलभता का अनुभव होना सहज हैं। इस प्रकार न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता सहज आवर्तनशील वैभव, स्वयं नित्य उत्सव के रूप में स्वराज्य व्यवस्था को प्रमाणित कर देता हैं। ऐसे उत्सव के अभिन्न अंगभूत मानवीय शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य संयम सहज कार्यक्रम मानव कुल में व्यवहृत होता ही रहेगा। (अध्याय:9(10), पेज नंबर:338)
    • अस्तित्व में चारों अवस्थाएँ इस धरती पर होना प्रमाणित हैं। यह धरती एक सौर व्यूह का अगंभूत (अंग के रूप में) कार्य करती हुई हैं यह स्पष्ट हो चुका है। ऐसे अनंत सौर व्यूह होने की कल्पना मानव में होती हैं, इस धरती पर जितने भी मानव हैं वे सब धरती पर जागृति सहज प्रमाणों को प्रमाणित करें, इसकी परम आवश्यकता हैं। क्योंकि सभी समस्याएँ मानव में, मानव से, मानव के लिए की हुई हैं। इसलिए सभी आयामों, कोणों, दिशाओं, परिप्रेक्ष्यों में समाधान प्रस्तुत करना भी परम आवश्यकता हैं। इसका आधार यही हैं कि मानव को समस्याएँ स्वीकृत नहीं हैं। अपितु समाधान सहज ही स्वीकार्य होते हैं। समाधान का सम्पूर्ण प्रयोजन मानव इकाई के अंतर-संबंधों और अस्तित्व में परस्पर सह-अस्तित्व सहज वर्तमान में, पहचाना जाता हैं। अर्थात् पूर्णता क्रम, पूर्णता और उसकी निरंतरता सहज सूत्रों, व्याख्याओं जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के प्रमाणों से संप्रेषित होता है। यही मानव भाषा का अर्थ है। इस अर्थ को संप्रेषित करने के लिए कारण, गुण, गणितात्मक विधि से, विवेक और विज्ञान सम्मत तर्क प्रणाली को अपनाना होता है। इसी विधि से पूर्णता की अवधारणा, उसकी अक्षुण्णता सहज रूप में ही मानव परंपरा में प्रवाहित होती हैं। मानव परंपरा अर्थात् मानवीयता पूर्ण शिक्षा-संस्कार, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, मानवीय आचरण संहिता रूपी संविधान इसकी प्रतीक्षा सबको हैं। इसका कारण एक ही हैं, इसका नित्य सर्वशुभ, मानव में ही स्वीकृत रहता हैं। इसी सत्यतावश मानव में नित्य स्वीकारा हुआ प्रमाण इच्छा के रूप में, शुभ विचार के रूप में, शुभ कल्पना के रूप में प्रस्तुत कर लेना स्वाभाविक हैं। उत्पादन में व्यवहार में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाण में होने वाली सहज संप्रेषणा ही मानवीय आचरण, मानवीय व्यवहार और मानवीय व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होती हैं। इसके लिए मानवीय शिक्षा-संस्कार परपंरा के रूप में प्राप्त होना भी, सहज हैं। यही प्रमाण परंपरा का तात्पर्य और अपेक्षा हैं।...(अध्याय:9(11), पेज नंबर:346-347)

    स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
    प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज 

    शिक्षा - संदर्भ:अनुभवात्मक अध्यात्मवाद

    अनुभवात्मक अध्यात्मवाद (अध्याय:2,3,4,5,6,7, संस्करण:2009, पेज नंबर:)
    • मानव परंपरा तब तक भ्रमित रहना भावी है जब तक समुदाय और समुदायगत आवश्यकता की हठधर्मिता, सुविधा संग्रह की हठधर्मिता, भोग-अतिभोगवादी हठधर्मिता, आदमी को मूलत: दुखी मानने वाली हठधर्मिता, स्वार्थी, अज्ञानी और पापी मानने वाली हठधर्मिता, कोई एक समुदाय अपने को धर्मी अन्य को विधर्मी मानने की हठधर्मिता, द्रोह-विद्रोह-शोषण और युद्ध को एक आवश्यकता मानने वाली हठधर्मिता, व्यक्तिवादी (अहम्तावादी) मानसिकता के लिये सभी हठधर्मिता रहेगी । इसका निराकरण जागृति ही है। जागृति पूर्ण परंपरा मे ही अर्थात् जागृत शिक्षा-संस्कार, जागृत न्याय व्यवस्था और जागृत उत्पादन कार्य-व्यवस्था, जागृत लाभ-हानि मुक्त विनिमय व्यवस्था और जागृत स्वास्थ्य संयम पीढ़ी से पीढ़ी को सुलभ होने से है। ऐसी जागृत पूर्ण परंपरा में पीढ़ी से पीढ़ी जागृत होते ही रहना एक अक्षुण्ण परंपरा है । ऐसी परंपरा में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सर्वसुलभ होने की कार्यप्रणाली, पद्घति, नीति क्रियाशील रहेगी फलत: विविध प्रकार से समुदायों को अपनाया हुआ भ्रम अपने आप विलय होना स्वाभाविक है। यह अनुभव मूलक जीने के क्रम में पाया जाने वाला वैभव है।(अध्याय:2, पेज नंबर:21)
    • धर्म गद्दी, राज गद्दी, व्यापार गद्दी और शिक्षा गद्दी जो अपने हठधर्मितावश मानव को पापी-अज्ञानी-मूख पिछड़ा, दलित दुखी रहना मानते हुए अपने अहम्ता, अहंकार को बढ़ाये रहते हैं। जागृत परंपरा सहज विधि से स्वायत्तता का प्रमाण, परिवार मानव सहज प्रमाण और परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था प्रमाण समाधान समृद्घि सहित प्रमाण के साथ ही ये सब हठधर्मिताएँ विलय हो जाते हैं। साथ ही इस जागृति का प्रमाण में अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होना स्वाभाविक होने के कारण सभी समुदायवादी एवं व्यक्तिवादी अस्मितायें अपने आप विलय को प्राप्त करेगें।...(अध्याय:2, पेज नंबर:23)
    • मानव परंपरा में यह विदित है कि मानव क्रियाकलाप के मूल में मानसिकता का रहना अत्यावश्यक है। मानसिकता विहीन मानव को मृतक या बेहोश घोषित किया जाता है। विकृत मानसिकता (मान्य, सामान्य मानसिकता के विपरीत) वाले मानव को पागल, असंतुलित अथवा रोगी के नाम से घोषणा की जाती है। यह सभी क्रियाकलाप वांछित, इच्छित और आवश्यकीय मानसिकता हर क्षण, हर पल, हर दिन शरीर यात्रा पर्यन्त प्रभावित होने के क्रम में ही राज्य मानसिकता, धर्म मानसिकता, व्यापार मानसिकता, अधिकार मानसिकता, भोग मानसिकता, सुविधा-संग्रह मानसिकता समीक्षित होता है। न्याय मानसिकता, धर्म (समाधान) मानसिकता, नियम मानसिकता, प्रामाणिकता पूर्ण मानसिकता, समृद्धि मानसिकता, सह-अस्तित्व मानसिकता, वर्तमान में विश्वास मानसिकता, परिवार मानसिकता, स्वायत्त मानसिकता, समाज मानसिकता, व्यवस्था मानसिकता, मानवीय शिक्षा-संस्कार मानसिकता, स्वास्थ्य संयम मानसिकता का मूल्यांकन किया जाना जागृत परंपरा में संभव होता है।... (अध्याय:2, पेज नंबर:27)
    • भ्रमात्मक धर्म और राज्य परंपरा में परिकल्पित अधिकारों का प्रवर्तन संग्रह, सुविधा और भोग के अर्थ में ही अंत होना देखा गया। आज की स्थिति में शक्ति केन्द्रित शासन प्रयोग में अधिकार पाया हुआ व्यक्ति की सफलता का स्वरूप इस प्रकार दिखाई पड़ता है कि देशवासियों को कड़ी मेहनत, ईमानदारी का नारा और पाठ सुनाते रहे और अपने संग्रह कोष को स्वदेश के अतिरिक्त विदेश में मजबूत बनाते रहे। इसी प्रकार सफल धर्म में अधिकार प्राप्त व्यक्ति (सिद्धि प्राप्त व्यक्ति) का स्वरूप देखने पर यही पता लगता है कि संसार में त्याग और वैराग्य का पाठ पढ़ावे और अपने कोष व्यवस्था को स्वदेश में अधिकतम मजबूत बनाये रखे।
    इस तरह राज्याधिकार, धर्माधिकार सफल व्यक्ति का स्वरूप इस बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक में देखने को मिल रहा है । यही भ्रमात्मक धर्म, भ्रमात्मक राज्य का गवाही है। जबकि ‘मानव धर्म’ अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के स्वरूप में ही सार्थक और सर्वसुलभ होना पाया जाता है। इस विधि से सम्पूर्ण मानव के सम्मुख सर्वमानव सुखी होने का सूत्र ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ प्रस्तुत है ।
    पहला मुद्दा - शक्ति केन्द्रित शासन चाहिये या समाधान केन्द्रित व्यवस्था चाहिये ?
    दूसरा मुद्दा - संग्रह सुविधा चाहिये या न्याय, समाधान और समृद्घि चाहिये?
    तीसरा मुद्दा - इसके लिये लाभोन्मादी अर्थशास्त्र, भोगोन्मादी समाज शास्त्र, कामोन्मादी मनोविज्ञान शिक्षा की वस्तु के रूप में चाहिये या आवर्तनशील अर्थशास्त्र, व्यवहारवादी समाजशास्त्र और मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान शिक्षा की वस्तु के रूप में चाहिये ?
    चौथा मुद्दा - विखण्डनवादी (प्राकृतिक असंतुलनवादी) विज्ञान चाहिये या सह-अस्तित्ववादी (प्राकृतिक संतुलनवादी) विज्ञान चाहिये?
    इन्हीं सकारात्मक-नकारात्मक अर्थात् अभी तक किया गया शिक्षा स्वरूप को नकारता हुआ और सकारात्मक पक्ष को प्रस्तावित किया हुआ का समर्थन में समाधानात्मक भौतिकवाद, व्यवहारात्मक जनवाद और अनुभवात्मक अध्यात्मवाद (सह-अस्तित्ववाद) चाहिये या द्वन्दात्मक भौतिकवाद, संघर्षात्मक जनवाद, रहस्यात्मक अध्यात्मवाद (आदर्शवाद) चाहिए।
    रहस्यमूलक ईश्वर केन्द्रित चिन्तन और अस्थिरता अनिश्चयता मूलक वस्तु केन्द्रित चिन्तन चाहिये या अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन चाहिये?...
    (अध्याय:2, पेज नंबर:30-31)
    • अस्तित्व सहज सभी अवस्थाओं का दृष्टा, मानवीयता पूर्ण क्रियाकलापों का कर्ता, मानवापेक्षा सहज समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व का भोक्ता केवल मानव ही है। अस्तित्व में अनुभव सहज अभिव्यक्ति ही यह सत्यापन और सत्यापन विधि होना पाया गया है। यही मानव परंपरा का मौलिक वैभव है। यह सर्वसुलभ होने के लिये परंपरा ही जागृत होना अति अनिवार्य है। इस बीसवीं शताब्दी की दसवें दशक तक इस धरती के मानव विविध प्रकार से अथवा उक्त दोनों प्रकार से यथा भौतिकवादी और आदर्शवादी विधि से मानव को भुलावा देकर ही सारे धरती का शक्ल बिगाड़ दिया। और दूसरे विधि से मरणोपरांत स्वर्ग और मोक्ष के आश्वासन में लटकाया। जबकि मानव शरीर यात्रा के अवधि में ही जागृति अनुभव मूलक प्रमाण, प्रामाणिकता मानव के लिये एक मात्र शांति पूर्ण समृद्घि, समाधान, अभय, सह-अस्तित्व सहज आनन्दित होना देखा गया है। यही जागृति सहज प्रमाण है। आडम्बर मूलत: भ्रमवश ही घटित होना देखा गया है। सम्पूर्ण भ्रम का पोषण राजगद्दी एवं धर्मगद्दी करता है। इसका स्रोत शिक्षा-गद्दी है। इस प्रकार शिक्षा गद्दी को जागृत होना आवश्यक है। इसके फलन में मानव धर्म ही अखण्ड समाज के अर्थ में सर्वमानव में, से, के लिये आश्वस्त और विश्वस्त होना नित्य समीचीन है। इससे सम्पूर्ण समुदायों जो अपने को समाज कहते है उनका विलय होगा ही। दूसरा परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सहज विधि से अनेक राज्यों की परिकल्पना तिरोभावित होगी। इस प्रकार धरती की अखण्डता अपने में सम्पूर्णता के साथ स्वस्थ होने का शुभ दिशा प्रशस्त होगा। इसी के साथ मानव कुल में वांछित संयमता, प्रदूषण विहीन प्रौद्योगिकी, ऋतु संतुलन, जनसंख्या नियंत्रण सहित स्वस्थ मानसिकतापूर्ण मानव इकाई इस धरती के ऊपरी सतह में सहज रूप में निष्पन्न होती रहेगी। उसी के साथ सह-अस्तित्व विधि से सदा-सदा के लिये पीढ़ी से पीढ़ी समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व पूर्वक जीने की कला, विचार शैली, अनुभव बल सम्पन्न होगा। यही समृद्घ मानव परंपरा का स्वरूप होना स्पष्टतया समझा गया है।यह समझदारी अस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से स्पष्ट हुआ है। यही मूलत: अस्तित्व-मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन की अभिव्यक्ति है। (अध्याय:2, पेज नंबर:33-35)
    • अनुभवमूलक विधि से शिक्षा का स्वरूप अपने आप से जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान सहज विधि से शिक्षा-संस्कार सम्पन्न करने का उपक्रम सहज होना देखा गया है । इसे सर्व सुलभ करना सम्भव है। इस तथ्य को भी परिशीलन कर चुके हैं। ऐसी शिक्षा-संस्कार को मानवीय शिक्षा-संस्कार का नाम दिया है। यह शिक्षा का स्रोत सह-अस्तित्व सहज है। इस बात को सत्यापित किये हैं। अस्तित्व में नित्य व्यवस्था है न कि शासन। शासन को व्यवस्था मानना ही पूर्ववर्ती दोनों विचारधारा भटकने का एक बिन्दु रहा है। दूसरा प्रधान बिन्दु अस्तित्व को समझने में असमर्थ रहा है या अड़चन रहा है अथवा भ्रम से पीड़ित रहे हैं। इन्हीं कारणों से दोनों प्रकार के विचारधाराएँ अस्तित्व सहज यर्थाथता, वास्तविकता, सत्यता को स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य के रूप में अनुभव करने में वंचित रहे हैं या अनुभव हुआ किन्तु अभिव्यक्ति संप्रेषणा में प्रमाणित होना संभव नहीं हो पाया है। जबकि हमें अस्तित्व में अनुभव के अनंतर अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन में कोई अड़चन उत्पन्न नहीं हुई। अब यह भी सर्वेक्षण, निरीक्षण, परीक्षण की बेला समीचीन है कि यह संप्रेषणा मानव कुल में, से, के लिये आवश्यकता के रूप में विदित होगा या नहीं। हमें इस पर पूर्ण भरोसा है - मानव में, से, के लिये अस्तित्व में अनुभव एक आवश्यकता के रूप में स्वीकार्य हुआ हो ऐसी स्थिति में यह अभिव्यक्ति, संप्रेषणाएँ स्वाभाविक रूप में बोधगम्य, हृदयंगम पूर्वक सह-अस्तित्ववादी मार्ग को प्रशस्त करेगा क्योंकि अस्तित्व ही सह-अस्तित्व के रूप में नित्य विद्यमान है। (अध्याय:2, पेज नंबर:35-36)
    • इस दशक तक दंडाधिकार, दमनाधिकार, पूंजी का अधिकार, धरती का अधिकार, मानव पर अधिकार, जीवों पर अधिकार, वनों पर अधिकार, खनिजों पर अधिकार, प्रौद्योगिकी पर अधिकार, व्यापार अधिकार, राज्याधिकार, समुद्र और आकाश पर अधिकार, धर्माधिकार और बौद्घिक संपदाओं पर अधिकारों का चर्चा, अधिकारों की सीमा और मर्यादाओं पर भी ध्यान दिया जाना देखा गया। इन सभी मुद्दों के सम्बन्ध में कई समुदायों अथवा सभी समुदायों का सम्मिलित अथवा समुदाय प्रतिनिधियों का सम्मिलित गोष्ठी, विचारपूर्वक गोष्ठी, विचार पूर्वक निर्णयों को स्वीकारा गया। अब ऐसी सभी स्वीकार्यताएं महिमामय दस्तावेजों के रूप में माने गये हैं। महिमा सम्पन्न दस्तावेज का तात्पर्य जिस स्वीकृतियों का हेराफेरी होने से उसके लिये डरावनी सबक सीखने के लिये स्वीकृतियाँ बनी रहती हैं। या इसको मर्यादा माना जाता है। ये सब ऐसे मौलिक दस्तावेजों का मूल तात्पर्य सभी अपने-अपने देश में शांतिपूर्वक जी सके इसी मानसिकता से उक्त सभी बातों पर एक समझौता किया जाता है। जबकि अभी तक पूर्वावर्ती किसी भी चिन्तन के अनुसार, कोई भी वांग्मय जो मानव सम्मुख प्रस्तुत हुई है उसमें सार्वभौम शांति का कोई परिभाषा, प्रतिपादन, उसका व्याख्या संप्रेषित नहीं हो पाया। साथ ही सुख शांति की अपेक्षा हर मानव में होना पाया जाता है।
    उक्त मुद्दों पर स्वीकृत अधिकारों के आधार पर किये गये समझौते बारंबार बदलते भी रहते है। इसी के साथ इस शताब्दी के अंतिम दशक तक में यह भी देखा गया जिस देश के पास सर्वाधिक समर शक्ति हाथ लगी है वह किसी के अधिकारों को भी हथिया लिया है और अपने अधिकार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस शताब्दी के पहले भी इस प्रकार की नजीरें उपनिवेश के रूप में घटित होना ख्यात हो चुकी है । इस प्रकार कोई भी अपने सामरिक कूटनीतिक (अन्त:कलह को पैदा करो-राज करो) मानसिकता से ही पहले भी जो अपना देश नहीं है ऐसे देशों पर अधिकार पाने का प्रयोग किया है। यह राज्याधिकार मानसिकता मूलत: अपने स्वजनों, स्वजातियों और स्वदेशियों के सुविधा के लिये अन्य देश की सम्पदाओं को अपहरण कर, शोषण कर अपने देश में उपयोग करने के रूप में प्रयास करना देखा गया है । आदिकाल से ही सामरिक शक्ति सम्पन्न राज्य को विकसित राज्य, उस देश में निवास करने वालों को विकसित जनजाति होना मान्यता के रूप में लोकव्यापीकरण हुआ है जबकि युद्ध न तो विकास का आधार है, कड़ी है, न प्रक्रिया है। क्योंकि इससे अखण्ड समाज का एक भी सूत्र-व्याख्या, प्रयोजन प्रमाणित नहीं होता । जबकि मानवीयतापूर्ण पद्धति, प्रणाली, नीति से अखण्ड समाज का ही सूत्र रचना, व्याख्या व प्रयोजन नित्य समीचीन है। इससे वंचित होने का एक ही कारण है, भ्रमात्मक मानसिकता अथवा भय, प्रलोभन, आस्थाओं से ग्रसित मानसिकता ही है। अभी तक जितने भी झीना-झपटी युद्ध, विश्वयुद्घ हुए हैं, वे सब उक्त तीनों आधारों पर ही सम्पन्न हुए हैं। अतएव अनुभव मूलक विधि से ही मानवीयतापूर्ण पद्घति प्रणाली नीतिपूर्वक है। अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था, मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार सुलभता, न्याय-सुरक्षा सुलभता, उत्पादन-कार्य सुलभता, विनिमय-कोष सुलभता, स्वास्थ्य संयम सुलभता नित्य वैभव के रूप में इसी धरती पर वैभवित होना सहज है, नियति है, एक अपरिहार्यता है। ऐसी ऐश्वर्य सम्पन्न मानव परंपरा महिमा से ही अनेक राज्य, समुदाय सम्बन्धी अधिकारोन्माद समापन होना स्वाभाविक है। इसका समापन और मानवीयता का उदय अर्थात् जागृति ही मानव परंपरा में, से, के लिये मौलिक संक्रमण और परिवर्तन है। (अध्याय:2, पेज नंबर:36-38)
    • स्वायत्त मानव का प्रमाण रूप मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार ही है। इसकी महिमा को स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन और व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वालंबन है। ऐसे स्वायत्त मानव ही परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। हर परिवार मानव परस्परता में सम्बन्धों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन और उभय तृप्ति को पाना देखा गया है। परिवार मानव ही परिवार सहज आवश्यकता के अनुसार अपनाया गया उत्पादन कार्य में एक दूसरे के पूरक होते हैं, भागीदारी का निर्वाह करते हैं, फलस्वरूप परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना देखा गया है। यही समृद्धि, समाधान, न्याय सूत्र होना देखा जाता है। परिवार में समाधान और समृद्घि सम्बन्धों के आधार पर पाये गये उभय तृप्ति सहज न्यायपूर्वक व्यवस्था में जीना सहज होता हुआ देखा गया है। इन्हीं सहजता की पुष्टि में आवश्यकता से अधिक उत्पादन समृद्धि को प्रमाणित कर देता है। व्यवस्था में जीना ही समाधान का प्रमाण है और वर्तमान में विश्वास है। अतएव स्वायत्त मानव स्वरूप अनुभव मूलक होना देखा गया है। फलस्वरूप परिवार मानव, समाज मानव और व्यवस्था मानव के रूप में होना नियति सहज अभ्युदय (सर्वतोमुखी समाधान) और प्रामाणिकता (अनुभव और पूर्ण जागृति) सहज मानव में सार्थक होना देखा गया है। इसी आधार पर यह ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ लोक मानस के लिये प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत है।(अध्याय:2, पेज नंबर:40-41)
    • शिक्षा की विडम्बना यही है कि विज्ञान विधा से विशेषज्ञता से प्रभावित है। विशेषज्ञता किसी विधा के किसी अंश में अपने को प्रतिष्ठित करने के प्रत्यत्नों में कार्यरत होना पाया जाता है। पुन: उसका अंश और उसके अंश के रूप में प्रयासों का उदय देखने को मिल रहा है। फलस्वरूप विशेषज्ञता प्रयोजन विहीन काला-दीवाल के सम्मुख सभी विधाओं में आ चुके हैं। जैसे - मात्रा विज्ञान अस्थिरता-अनिश्चयता के काला दीवाल के सम्मुख है। इसके विशेषज्ञ अपना मूल्यांकन कराने में निरीह देखा गया है। दूसरा वंशानुषंगीय विज्ञान यह मानव को अध्ययन कराने में विश्लेषित करने में सर्वथा असमर्थ होकर काला-दीवाल के सम्मुख होना देखा गया । तीसरा सापेक्षवाद अपने कल्पना को अज्ञात घटना के साथ वर्णित करने के रूप में विशेषज्ञों को देखा गया है। इन तीनों विधा के लिये अथवा इन विधाओं को पहचानने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता को विज्ञान संसार में स्वीकारा गया है। यह अपने से गति ऊर्जा कहना आरम्भ करते हैं यथा चुम्बकीय धारा को विद्युत गति के रूप में परिणत करना इस गति को और गति विधा में चलकर तरंग का नाम लेते हैं। ऐसी तरंग वस्तु है या अवस्तु है इस तथ्य को उद्घाटित करने के लिये अभी भी प्रयोग करते जा रहे हैं। जो प्रयोग परिणीतियाँ आती है उसे अंतिम सत्य नहीं मानते हुए प्रयोगों के लिए मार्ग प्रशस्त किये रहते हैं। इस विधा में अनिश्चयता बनी ही है - वस्तु है या अवस्तु है।
    इसी अनिश्चयता के स्थिति पर मानव अपने को समझा हूँ, नहीं समझा हँ इस बात को लेकर कुंठित हो चुके हैं। इन्हीं सिद्घांतों के शाखा-प्रशाखा होने के कारण और अलग-अलग से समीक्षीत करने की आवश्यकता नहीं है। अतएव विज्ञान संसार में लगे हुए जितने भी मानव हैं वे अपने को समझदार सत्यापित करने में असमर्थ हैं क्योंकि विशेषज्ञता का चक्कर विचार के शुरुआत से काला दीवाल तक चलता है। दूसरी ओर शिक्षा के कला पक्ष के विशेषज्ञ कहलाने वाले, विविध समुदाय में पनपी हुई रुढ़ी-आदतों को शादी-विवाह, नाच-गाना, उत्सवों को मनाने के तरीकों को संस्कृति मानते हुए समाजशास्त्र के  नाम से पढ़ाया करते हैं । वे विशेषज्ञ जिसको पढ़ाते हैं उसमें विश्वास नहीं रखते हैं। उससे भिन्न रुढ़ी, भिन्न आदतों के साथ भिन्न मानसिकता को बनाए रखते हुए दिखते हैं। अंतिम बात वर्तमान समाज एक संघर्षशील मानव समुदाय है। संघर्ष का आधार व्यक्ति-व्यक्ति में मानसिक मतभेद रूढ़ी-रूढ़ी के बीच आलोचना, नशा-पानी, नाच-गाने में विविधता, प्रतिस्पर्धा के रूप में होना देखा गया है। इसी प्रकार खेल-कूद, भाषण-प्रतियोगिताएँ-प्रतिस्पर्धा के आधार पर पहचानने की पंरपरा अभी तक है । प्रतिस्पर्धाएँ विरोध, द्वेष जैसी संकटों को झेलता हुआ घटना होना देखा गया है। धर्म और राज्य में संघर्ष है ही और यह भी कलात्मक शिक्षा प्रणाली पद्घत्ति में गण्य है। इसका समीक्षा यही है विज्ञान विधा से यंत्र प्रमाण के आधार पर अनिश्चियता-अस्थिरता का काला-दीवाल और कलात्मक शिक्षा-विधा से विरोध, विद्रोह-द्वेष जैसी अवांछनीय काला-दीवालें अथवा स्वीकृतियाँ मानव परंपरा को भ्रमित करने का आधार सूत्र के रूप में बनी। सारे लोग प्रयत्न करते हुए सही मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। अतएव अनुभव मूलक व्यवहार प्रमाण प्रस्ताव का अनिवार्यता बना ही रहा । इसलिये अभी प्रस्तावित होकर मानव स्वीकृत होना संभव हो गया।(अध्याय:3, पेज नंबर:51-53)
    • स्थिरता और निश्चयता का स्वरूपों को अध्ययन करने के लिये 
    1. अस्तित्व 
    2. परमाणु में विकास 
    3. परमाणु ही व्यवस्था का आधार 
    4. सह-अस्तित्व में व्यवस्था 
    5. व्यवस्था सूत्र (‘‘त्व’’ सहित व्यवस्था) 
    6. पूरकता-उदात्तीकरण, रचना-विरचना 
    7. पूरकता-उदात्तीकरण और संक्रमण 
    8. परमाणु ही गठनपूर्णतापूर्वक जीवन पद (चैतन्य पद) में वैभवित होना 
    9. जीवन में जीवनी क्रम 
    10.  बंधन सहित जीवन का कार्यक्रम और जागृतिक्रम 
    11. जीवन ही जागृति पूर्वक क्रियापूर्णता में संक्रमण 
    12. जीवन ही जागृतिपूर्णता पूर्वक आचरण पूर्णता में संक्रमण, प्रधान बिन्दु है ।
    इसमें से कोई भी बिन्दु यंत्र प्रमाण से प्रमाणित नहीं हो पाती जबकि हर मानव इसको समझ सकता है और व्यवहार में प्रमाणित कर सकता है। आदर्शवाद  जिसका आधार आप्त पुरुषों के वचन हैं के आधार पर भी ये बारह बिन्दुओं में से कोई भी बिन्दु अध्ययन, बोध और प्रमाणगम्य नहीं हो पाते।
    इसलिये अनुभव मूलक जागृतिपूर्ण विधि से सभी दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य, आयामों में व्यवहार प्रमाण मानव कुल में अति आवश्यक है। अनुभव व्यवहार में प्रमाणित होना अपरिहार्य है और हर प्रयोग व्यवहार में सार्थक होना उतना ही अनिवार्य है। इस प्रकार अनुभव मूलक जागृति विधि पूर्ण प्रमाण सूत्रों पर आधारित विचारों और विचार सूत्रों पर आधारित संप्रेषणा और वांग्मय शैलियों से इंगित ‘वस्तु’ के रूप में अर्थों-प्रयोजनों के सार्थकता के रूप में व्यवहार, उत्पादन, व्यवहार-न्याय, व्यवहार और न्यायिक विनिमय, व्यवहारिक स्वास्थ्य-संयम और व्यवहारिक शिक्षा-संस्कार परंपरा की आवश्यकता है। और उसकी आपूर्ति ही स्वाभाविक रूप में अग्रिम पीढ़ियों के सहस्त्राबदियों तक इस धरती पर मानव परंपरा सहज वैभव और उसकी सार्थकता रूपी जागृति और व्यवस्था को प्रमाणित कर सकते हैं। यह हर व्यक्ति के लिये सहज सुलभ हो सकता है। सार्थक रूप में जीने की कला अर्थात् जीने की हर तरीकों का जागृतिसूत्र के अनुरूप मूल्यांकित होना संभव है। हर मानव में जागृति और मानवत्व प्रमाणित होने का अनुमान विद्यमान है ही।(अध्याय:3, पेज नंबर:53-54)
    • इसमें और एक भाग पर मेधावियों का जिज्ञासा हो सकता है आप पूर्वावर्ती पद्घतियों के आधार पर अभ्यास-विधि से पार पा गये, सबके लिये उन सभी विधियों को ओझिल क्यों कर रहे है ? उन अभ्यास विधाओं के प्रति प्रस्ताव क्यों प्रस्तुत नहीं कर रहे है ? उत्तर में अनुभव विधि से यही व्यवहार गम्य है । जागृति विधि से जागृत परंपरा, जागृत परंपरा विधि से मानवीय शिक्षा, मानवीय व्यवस्था में प्रमाणित होना इसके लिये आवश्यकीय व्यवहार कार्यों में पारंगत होना ही जागृत परंपरा होने का वैभव को देखा गया, समझा गया, प्रमाण के रूप में जीकर देखा गया। यह सटीक सिद्ध हुआ या इसकी सटीकता सिद्ध हुई अर्थात् अनुभव परंपरा की सटीकता सिद्घ हुई । आवश्यकता सुदूर विगत से ही होना रहा । अतएव जिस अभ्यास साधना परंपरा में चलकर समाधि स्थली में पहुँचने के उपरान्त भी स्वान्त: सुख में पहुँचने के उपरान्त भी सर्वशुभता का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ, समाधि के लिये अथवा निर्विकार स्थिति के लिये बोधपूर्ण होने के लिये, सत्य साक्षात्कार होने के लिये, आत्मसाक्षात्कार होने के लिये, देवसाक्षात्कार होने के लिये, संयोग से जागृत होने के लिये (जागृत व्यक्ति को छूने से) भी परंपरा अपने-अपने ढंग से चल रहे हैं उन सभी में प्रकारान्तर से समाधि का ही लक्ष्य बताया गया है । उन सभी परंपरा के प्रति मेरा कृतज्ञता को अर्पित करते हुए, (क्योंकि उससे मुझे सहायता मिला है) सर्वशुभ मानव परंपरा में स्थापित होने का ज्ञान, दर्शन, आचरण, व्यवस्था, शिक्षा प्रवाह को स्थापित करना आवश्यक समझा गया है। इसका कारण मध्यस्थ दर्शन (सह-अस्तित्ववाद) के अंगभूत ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ को प्रस्तुत करना एक आवश्यकता सदा-सदा से रही है। यह अवसर हमें प्राप्त होने का श्रेय, अथक प्रयास किया हुआ मानव परंपरा का ही देन है। इसलिये विगत को धन्यवाद, वर्तमान में प्रस्ताव एवं भविष्य के लिये सर्वशुभ योजना प्रस्तुत है।(अध्याय:3, पेज नंबर:60-61)
    • परंपरा अपने में पीढ़ी से पीढ़ी के लिए सूत्र है ही-भले ही समुदाय विधि से हो या अखण्ड समाज विधि से हो। अखण्ड समाज विधि जागृति का द्योतक है एवं समुदाय विधि भ्रम का द्योतक है यह स्पष्ट है। समुदाय विधि से मानव स्वायत्त होना नहीं हो पाता है पराधीनता बना ही रहता है। अखण्ड समाज विधि से ही मानव में स्वायत्तता परंपरा शिक्षा-संस्कार विधि से संपन्न होता है। इसका प्रमाण अर्थात् स्वायत्तता का प्रमाण परिवार में होना देखा गया। परिवार मानव में सह-अस्तित्व सूत्र से स्वायत्तता का प्रमाण सिद्घ हो जाता है। यह प्रचलित होने के लिये परंपरा की आवश्यकता है। दूसरे भाषा से सर्वसुलभ होने के लिए अथवा लोक व्यापीकरण होने के लिए परंपरा की आवश्यकता है। (अध्याय:3, पेज नंबर:64)
    • परस्पर पहचानना-निर्वाह करना शाश्वत् नियम है। उपयोगिता सहित पूरक होना शाश्वत् नियम है। पूरकता का तात्पर्य विकास और जागृति में प्रमाण सहित प्रेरक पूरक होने से है। विकास और जागृति में स्व शक्तियों का अर्पण समर्पण है। जड़ प्रकृति में पूरकता किसी एक के अंश को स्वयं स्फूर्त विधि से विस्थापित कर देने के रूप में ही है।  मानव में समाधानपूर्वक समृद्घ होने की विधियों को देखा जाता है। यही पुन: जड़ प्रकृति में रचना-विरचना में भी देखने को मिलता है कि रचना विधि में पूरकता, विरचनाएं पुनर्रचना के लिये पूरकता के रूप में प्रस्तुत होना देखा जाता है । इस प्रकार पूरकता जड़ प्रकृति में भी देखने को मिलता है। परस्पर पूरक है इस तथ्य का साक्ष्य पदार्थावस्था से प्राणावस्था, प्राणावस्था से जीवावस्था और जीवावस्था से ज्ञानावस्था विकसित स्थिति में  वर्तमान रहना ही है। सभी जीव संसार जीने की आशा से ही वंशानुषंगीय कार्य में तत्पर रहना पाया जाता है। ज्ञानावस्था के मानव उसी का अनुकरण-अनुसरण करने के जितने भी कार्यकलापों को अपनाया स्वपीड़ा-परपीड़ा, स्वशोषण-परशोषण, स्वयं के साथ वंचना और अन्य के साथ प्रवंचना और इन सबका सारभूत बात स्वयं के साथ समस्या और उसकी पीड़ा से पीड़ित रहना, अन्य को पीड़ित करना रहा। यही भ्रमित मानव परंपरा रूपी समुदायों में देखने को मिला। यही शिक्षा, संस्कार, संविधान और व्यवस्था इस दशक तक मानी जा रही है। ये सब समस्याकारी है । समस्या स्वयं पीड़ा के रूप में प्रभावित होना देखा गया। इसका निराकरण जागृति, उसका प्रमाण रूप में समाधान ही है। (अध्याय:3, पेज नंबर:69-70)
    • आशा बन्धन से ‘जीवनी क्रम’ परंपरा को आरंभ किया हुआ जीवन, आशा से विचार, विचार से इच्छा बन्धन तक भ्रमित विधि से मानव कार्यकलापों को प्रस्तुत करता है। इच्छाएँ चित्रण कार्य को, विचार विश्लेषण कार्य को और आशा चयन क्रिया को सम्पादित करता हुआ मानव परंपरा में भय, प्रलोभन और आस्था में जीता रहता है। प्रिय, हित, लाभ संबंधी संग्रह-सुविधा-भोग द्वारा प्रलोभन के अर्थ को; युद्घ, शोषण, द्रोह-विद्रोह-संघर्ष ये सब भय को और भक्ति-विरक्ति पूर्वक आस्था त्याग-वैराग्य को मानव ने प्रकाशित किया है। यह परंपरा सहज विधि से ही होना पाया जाता है। परंपरा में इसी के लिये शिक्षा-संस्कार, उपदेश, शासन-पद्घति, संविधान भी स्थापित रही है। इसी क्रम में सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा संबंधी और सामरिक सामग्रियों के रूप में अनेकानेक चित्रण कार्य सम्पन्न हुआ। ऐसे कुछ यंत्र संचार के लिये मार्ग और सेतु का चित्रण हुआ। इसी से सम्बन्धित अनेकानेक वस्तु, सामग्री, यंत्रों का चित्रण मानव ने किया है।
    जीवनी क्रम जीवों में वंशानुषंगीय स्वीकृति के रूप में देखने को मिलता है। यही आशा बन्धन का कार्यकलाप है। वंशानुषंगीय कार्य में उस-उस वंश का कार्यकलाप निश्चित रहता है। तभी जीवावस्था व्यवस्था के रूप में गण्य हो पाता है। ऐसे जीव शरीर जो वंशानुषंगीय निश्चित आचरण को प्रस्तुत करते है उनमें समृद्ध मेधस का होना पाया जाता है। ऐसी वंशानुषंगीय रचना क्रम में मानव शरीर भी स्थापित है। इसकी परंपरा भी देखने को मिलती है। उल्लेखनीय मुद्दा यही है, मानव परंपरा में निश्चित आचरण स्पष्ट नहीं हो पाया। इसका कारण मानव ने तीनों प्रकार के बंधन वश जीवों के सदृश्य जीने का प्रयत्न किया। जबकि मानव अपने मौलिक विधि से ही जीने की प्रेरणा बना रहा। इसी क्रम में आचरणों की विविधता, विचारों की विविधता, इच्छाओं की विविधता, अनेकता का कारण बना। इसलिये केवल आशा, विचार, इच्छा से मानव में मानवीयता की स्थापना नहीं हो सकी। अथक प्रयास अवश्य किया गया। ‘जीवन’ के और आयामों का प्रयुक्ति मानव परंपरा में अवश्यंभावी होने के आधार पर ही अनुभवमूलक विधि का स्थापित होना अनिवार्यतम स्थिति बन चुकी है।
    मुख्यत: न्याय, धर्म, सत्य रूपी दृष्टियों की क्रियाशीलता वृत्ति में एवं फलन स्वरूप इनका साक्षात्कार चित्त में, बुद्धि में बोध और अनुभव की स्वीकृति, आत्मा में इनका अनुभव और अनुभव बोध तथा साक्षात्कार की पुष्टि चिंतन में सम्पन्न होना ही अनुभवमूलक जागृतिपूर्ण स्थिति गति होना स्पष्ट है। अतएव जीवन को विधिवत् चेतना विकास मूल्य शिक्षा विधि से मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद का अध्ययन एवं समझ लेना जीवन ज्ञान का तात्पर्य है। जीवन ही दृष्टा पद में होने के कारण अस्तित्व सहज सम्पूर्ण दृश्य का दृष्टा होना सहज है। इस प्रकार अनुभव करने वाली वस्तु जीवन है। अनुभव करने योग्य वस्तु अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व है। प्रमाणित करने योग्य वस्तु हरेक मानव है। प्रमाणित होने के लिये वस्तु अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था है। अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अनुभव ही परम सत्य में अनुभव।
    जीवन रचना (चैतन्य पद) + जीवन क्रियाकलापों का निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण = जीवन ज्ञान। (अध्याय:4, पेज नंबर:74-76)
    • मानव शरीर का संचालन भी जीवन ही सम्पन्न करने का तथ्य सुस्पष्ट है। मानव शरीर संचालन संस्कारानुषंगीय होने के अर्थ में ही बहुमुखी परंपराएँ देखने को मिला, यह केवल मानव परंपरा में ही मिला। इसमें यह भी देखने को मिला मानव ही अपने विभूतियों का सदुपयोग और दुरूपयोग कर सकता है । क्योंकि सम्पूर्ण मानव में शुभाकांक्षा उमड़ती ही रहती है। इन उमड़ती हुई शुभाकांक्षा धु्रवीकृत होने के ओर ही सुदूर विगत से इस दशक तक किये गये प्रयास और अभिव्यक्तियों से इसी तथ्य की पुष्टि होती है। सर्वशुभ और उसकी प्रतिष्ठा सर्वसुलभ रूप में तभी संभव होना देखा गया है कि हर बच्चे-बड़े जागृति को प्रमाणित कर दे। ऐसी लोकव्यापीकृत जागृति, लोक व्यापीकृत सर्वशुभ प्रमाण योग्य जागृति, जागृत परंपरा में, से, के लिये होना भी सुस्पष्ट हो चुकी है। जागृत जीवन में मध्यस्थ क्रिया, मध्यस्थ शक्ति, मध्यस्थ बल के स्वरूप को समझने की विधि सहित उसका कार्य, कार्य-स्वरूप और प्रयोजनों को ज्ञात कर लेना आवश्यक है। यही शिक्षा-संस्कार का प्रयोजन है। इससे लोकव्यापीकरण कार्यक्रम में सहज गति सुलभ होगा ही। (अध्याय:4, पेज नंबर:93-94)
    • हर मानव समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व व उसकी निरंतरता विधि से जीना चाहता है। इसके लिये अनुभवमूलक शिक्षा-संस्कार विधि समीचीन है। इसके विपरीत यह मानना कि मानव कभी सुधर नहीं सकता यह सर्वथा भ्रम है। हर मानव संबंध, मूल्य, मूल्यांकन,  उभयतृप्ति पूर्वक परिवार मानव होना चाहता है इसके नित्य सफलता के लिये मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार समीचीन है । यह अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित होना पाया जाता है । मानव सम्बन्धों में निरंतर मूल्यों का अनुभव कर सकता है। इसे सफल बनाने का कार्य-विचार-व्यवहार विधि को अनदेखी करते हुए यह मानना कि बैर विहीन परिवार नहीं हो सकता और बैर रहेगा ही, दुख रहेगा ही इन्हें सत्य कहकर अपने भ्रम को दूर-दूर तक फैलाना है।(अध्याय:4, पेज नंबर:108-109)
    • मानव जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य-व्यवहार करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है । परंपरा सहज विधि से (शिक्षा-संस्कार, संविधान और व्यवस्थापूर्वक) हर व्यक्ति में न्याय प्रदायी क्षमता, सही कार्य व्यवहार करने की योग्यता सत्यबोध करने-कराने की परमावश्यकता है । यह अनुभवमूलक मानव परंपरा में ही सार्थक होता है । इसे अनदेखी करते हुए हर व्यक्ति को जन्म से ही स्वार्थी, अज्ञानी और पापी इतना ही नहीं अपराधी, गलती करने वाला मानना, कहना, कहलाना, करने के लिये सम्मति देना भ्रम की पराकाष्ठा है।...(अध्याय:4, पेज नंबर:110)
    • हर मानव में जागृतिपूर्वक चारों अवस्था में वैभवित वस्तुओं को उन-उन के स्वभाव-गति प्रतिष्ठा में जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने का अर्हता रहता ही है । उस अर्हता के अनुसार शिक्षा-संस्कार को संपन्न करने की योग्यता से वंचित रहकर उसके विपरीत आवेशित गति को ही ‘‘वैभव और आवश्यक’’ मानते हुए, मनाने का जितना भी कार्यकलाप है (शिक्षा, संस्कार सहित) वे सभी अथ से इति तक भ्रम है क्योंकि सम्पूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व के रूप में विकास, जीवन, जीवन-जागृति प्रतिष्ठा ही है। (अध्याय:4, पेज नंबर:111)
    • हर मानव ‘त्व’ सहित व्यवस्था विधि-नियम से हर इकाई में, से, के लिये मौलिकता को जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने योग्य है । यह जागृतिपूर्ण शिक्षा परंपरा से लोक-व्यापीकरण होता है । इसे अनदेखी करते हुए सापेक्षता को स्वीकारना स्वीकारने के लिये परंपरा को मजबूर करना अथ इति तक भ्रम है और गलती है। (अध्याय:4, पेज नंबर:112)
    • आँखों से जो कुछ भी दिखता है वह किसी वस्तु के रूप (आकार, आयतन, घन) में से आंशिक भाग दिखाई पड़ता है । रूप का भी सम्पूर्ण भाग आँखों में आता नहीं । जबकि हर वस्तु, रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के रूप में अविभाज्य वर्तमान है। यह जागृतिपूर्ण शिक्षा विधि से लोकव्यापीकरण होता है। (अध्याय:4, पेज नंबर:114)
    • मानव से रचित यंत्र और मापदण्ड से मानव को प्रमाणित करना संभव नहीं है। परन्तु यह संभव है ऐसा मानना और शिक्षापूर्वक मनाना अत्यंत भ्रम और गलती है। जबकि मानव ही यंत्र और मापदण्ड को प्रमाणित करता है।... (अध्याय:4, पेज नंबर:114)
    • जो बन्धन था, मुक्ति पाने के बाद उसका प्रयोजन क्या है ?
    जीवन जागृति अर्थात् मानव चेतना, देव चेतना पूर्णता में, दिव्य-चेतना सहज प्रमाण और जागृति पूर्णता के अनन्तर उसकी निरंतरता का परंपरा के रूप में होना नियति क्रम व्यवस्था है । इस सत्यता के आधार पर जागृति पूर्णता विधि से मानव परंपरा वैभवित होना ही इसका प्रयोजन है । जीवन नित्य होने के कारण जागृति भी नित्य होना स्वाभाविक है । इन क्रम में बन्धन, भ्रम, समस्या सेे ग्रसित बुद्धिजीवी बनाम शब्दजीवी में यह तर्क उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि जागृति क्रम की भी निरंतरता होना चाहिए । इसके लिए जागृति पूर्ण प्रणाली से उत्तर यही है कि जागृति क्रम विधि से जीवन अथवा भ्रम बन्धन विधि से जीवन शैशवकाल से शरीर संचालन करता हुआ मानव संतान जागृत होने का अभिलाषा सहित व्यक्त होने के आधार पर अथवा प्रकाशित होने के आधार पर जागृति क्रम और जागृति पूर्ण परंपरा स्वाभाविक रूप में सहज विधि से ही जागृति प्रतिष्ठा स्थापित करना सहज है । क्योंकि जागृत परंपरा में स्वायत्त मानव के लिए अति आवश्यकीय शिक्षा-संस्कार सहज रूप में उपलब्ध रहता ही है । अतएव भ्रमबन्धन का निरन्तरता केवल जीवावस्था में ही प्रमाणित होता है। मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा में, से, के लिए भ्रमबन्धन की आवश्यकता सर्वथा निरर्थक, अनावश्यक होना पाया गया है ।....(अध्याय:5, पेज नंबर:127-128)
    • आशा, विचार, इच्छा बन्धन को जागृति क्रम में व्यक्त होना अति आवश्यक रहा है क्योंकि इनके परिणाम में पीड़ाओं का आंकलन होना आवश्यक रहा है । इच्छा बन्धन की अभिव्यक्ति इच्छा पूर्ति के लिये धरती का शोषण, वन का शोषण, मानव का शोषण के रूप में देखने को मिलता है । यही वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी तंत्र का चमत्कार रहा । सभी सामुदायिक शासन अपने विवशता सहित अपने सामरिक सामर्थ्य को बुलंद करने के लिये देशवासियों को एकता अखण्डता का नारा सहित किये जाने वाले सत्ता संघर्ष भी इच्छा बंधन क्रम में एक बुलंद प्रयास और आवाज सहित प्राप्तियाँ होना देखा जाता है । इसी क्रम में यह भी देखा गया विरक्ति, असंग्रहता का दुहाई देने वाले सभी धर्मगद्दी इच्छा बन्धन के तहत अनेक सुविधाओं को इकट्ठा करता हुआ शोषणपूर्वक अथवा परिश्रम के बलबूते पर  विविध प्रकार से अपने-अपने वैभव को (इच्छा बन्धन रूपी वैभवों को) व्यक्त करता हुआ देखा गया है । इसमें जो असफल रहते हैं वे सब कुण्ठित और चिन्तित रहता हुआ देखने को मिलता है । इसी प्रकार शिक्षा गद्दी भी इच्छा बन्धन के अनुरूप ही शैक्षणिक कार्य,वांग्मयअभीप्साओं को स्थापित करने के कार्य में व्यस्त रहता हुआ देखने को मिला । इस दशक तक स्थापित, संचालित तथा कार्यरत शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत व्यक्ति, प्राध्यापक, आचार्य वेतनभोगी होते हुए देखा जाता है। यह इच्छा बंधन का ही प्रमाण है और हर विद्यार्थी को नौकरी (वेतनभोगी) अथवा व्यापारी (शोषणकर्ता) के रूप में स्थापित करता है और इन दोनों क्रियाकलाप का लक्ष्य सुविधा, संग्रह, भोग ही है। यह इच्छा बन्धन का इस दसवीं दशक तक मानव परंपरा का समीक्षा है।... (अध्याय:5, पेज नंबर:135-136)
    • जागृतिपूर्ण परंपरा में ही सर्वमानव व्यवस्था में जीना, समग्र व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करना स्वाभाविक है, अनिवार्य है और आवश्यक है। व्यवस्था में जीने देकर जीना परिवार में ही प्रमाणित होता है । इसके मूल में मानव में स्वायत्तता अति अनिवार्य स्थिति है। व्यवस्था में जीने का फलन ही समाधान, समृद्घि का प्रमाण और अभय, सह-अस्तित्व का सूत्र होना देखा गया है । स्वायत्त मानव का स्वरूप पहले स्पष्ट किया जा चुका है। ऐसे स्वायत्त मानव से जागृतिपूर्ण शिक्षा प्रणाली, पद्घत्ति, नीतिपूर्वक सर्वसुलभ हो जाती है । यही भ्रम (बन्धन) मुक्त मानव परंपरा का सूत्र है । इसके क्रियान्वयन क्रम में परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था, ग्राम परिवार और विश्व परिवार के रूप में गठित होने, साकार होने और क्रियारत होने की पूर्ण संभावना, आवश्यकता का संयोग होता है। (अध्याय:5, पेज नंबर:139)
    • जहाँ तक शिक्षा की बात है यह प्रचलित विज्ञान युग के अनन्तर धर्म-कर्म शास्त्रों से भिन्न भी शिक्षा-स्वरूप और कार्य समाहित हुई। इसे विज्ञान शिक्षा अथवा व्यापार शिक्षा कह सकते हैं । शिक्षा जगत में तकनीकी विज्ञान इस धरती के सभी भाषा, सम्प्रदाय, धर्म, जाति, मत, पंथ वाले अपना चुके हैं । धर्म परंपराओं का जो कुछ भी चिन्हित लक्षण अथवा पहचान हुआ वह किसी का जन्म होने से उत्सव मनाने के रूप में, किसी के शादी-विवाह अवसर में उत्सव मनाने के तरीके से और किसी की मृत्यु होने से बंधुजन शोक संवेदना को व्यक्त करने के तरीके से होता है । सभी सम्प्रदाय अपने-अपने तरीके को श्रेष्ठ मानते ही रहते हैं। (अध्याय:5, पेज नंबर: 153)
    • यह तीनों प्रकार का बन्धन (आशा बन्धन, विचार बन्धन और इच्छा बन्धन) शरीर को जीवन मान लेने से और इन्द्रिय सन्निकर्ष से ही सम्पूर्ण सुख का स्रोत मानने के परिणाम में भ्रम सिद्घ होना पाया गया । जबकि जीवन अपने जागृति को व्यक्त करने के लिये शरीर एक साधन है, इन्द्रिय सन्निकर्ष ही एक माध्यम है । मानव परंपरा ही जीवन जागृति प्रमाण का सूत्र और व्याख्या है । यही भ्रम और निर्भ्रम का, जागृति और अजागृति का निश्चित रेखाकरण सहज बिन्दु है । इन यथार्थों को  शिक्षा गद्दी, राजगद्दी और धर्मगद्दी अपने में बीते हुए विधियों से आत्मसात करने में असमर्थ रहे हैं । दूसरे विधि से इनका धारक वाहक मेधावी इन मुद्दों पर अनुसंधान करने से वंचित रहे हैं । इसीलिये यह तथ्य मानव परंपरा में ओझिल रही है। इसे परंपरा में समाहित कराना ही इस ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ का उद्देश्य है । (अध्याय:5, पेज नंबर:158)
    • स्वनारी/स्वपुरूष का प्रयोजन इस विधि और आधार से देखा गया है कि समाज रचना क्रम में एक नारी-पुरूष का शरीर संयोग मानव शरीर रचना अथवा संतान परंपरा के लिए आवश्यकता विधि से सहज कार्यकलाप विधि से भी आवश्यक घटना है । शरीर रचना विधि से यौवन ही इसका आधार है । कार्य विधि से मानव परंपरा बना रहना  एक आवश्यकता है । प्रयोजन विधि से व्यवस्था में जीना एक अनिवार्यता है । व्यवस्था का तात्पर्य न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता ही है जिसका स्रोत मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य-संयम कार्यकलाप ही है । इसी से परिवार परंपरा होना भी सहज है। (अध्याय:5, पेज नंबर:161-162)
    • बन्धन-से-मुक्त होने का स्रोत संभावना जीवन सहज विधि से ही स्पष्ट हो चुकी है । सम्पूर्ण अस्तित्व ही व्यवस्था है। अस्तित्व में सम्पूर्ण वस्तुएँ अपने त्व सहित व्यवस्था के रूप में होना इसका गवाही है । अस्तित्व में मानव जागृतिपूर्वक ही व्यवस्था के रूप में व्यक्त हो पाता है । मानव भी अस्तित्व सहज अभिव्यक्ति है । मानव भी अपने त्व सहित व्यवस्था के रूप में जीने की कला, विचार शैली, अनुभव, बलार्जन करना ही मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार का सार्थक स्वरूप है । अस्तित्व में अनुभवमूलक विधि से ही अनुभव बल से जीने की कला, जीने की कला से अनुभव बल पुष्ट होना पाया जाता है। ऐसी पुष्टि ही मानव परंपरा में उत्सव है । हर व्यक्ति उत्सवित रहना चाहता है । जागृति का फलन ही उत्सव का स्रोत है। (अध्याय:5, पेज नंबर:163-164)
    • न्याय का साक्षात्कार सम्बंध, मूल्य, मूल्यांकन, उभय तृप्ति के रूप में  होने की प्रक्रिया है । यही न्याय प्रदायी क्षमता का द्योतक है । सम्बन्ध  अपने में (सभी सम्बंध) परस्पर पूरक होना एक शाश्वत् सिद्घांत है । इसकी पुष्टि सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में पूरकता सर्वमानव वांछित, अपेक्षित, वैभव है।ऐसी क्रियाएँ अर्थात् पूरक क्रियाएँ पुष्टिकारी, संरक्षणकारी, अभ्युदयकारी और जागृतिकारी प्रयोजनों के रूप में दिखाई पड़ती है । पुष्टिकारी कार्यों को शरीर पोषण, विचार पोषण, कार्य पोषण, आचरण पोषण, ज्ञान और दर्शन पोषण के रूप में देखने को मिलता है । यह पोषण विभिन्न सम्बंधों में घटित होता हुआ प्रत्येक  व्यक्ति अनुभव कर सकता है । जैसा मातृ सम्बंध में शरीर-पोषण, शील संरक्षण, पितृ सम्बन्ध में शील, आचरण, शरीर संरक्षण, गुरु-शिष्य संबंध में शिक्षा, ज्ञान, दर्शन का पुष्टि और संरक्षण भाई बहन, मित्र, पति-पत्नी, साथी-सहयोगी इन सभी सम्बन्धों में सर्वतोमुखी समाधान (अभ्युदय) की अपेक्षाएँ जीवन सहज रूप में ही होना देखा गया है। इतना ही नहीं सभी संबंधों में किंवा नैसर्गिक सम्बंधों में भी समाधान, पुष्टि, पोषण, संरक्षण की अपेक्षा आवश्यकता, प्रवृत्ति जीवन सहज रूप में आंशिक रूप में भ्रमित अवस्था में भी होता है । इसमें पूर्ण जागृत होने की संभावना समीचीन है । इस शताब्दी के दसवीं दशक में इसकी अपरिहार्यता अपने आप में समीचीन हुई है कि मानव इतिहास के अनुसार गम्य स्थली के रूप में सर्वतोमुखी समाधान और प्रामाणिकता ही है । कार्यरूप में सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी ही कार्य है । आचरण के रूप में मानवीयतापूर्ण आचरण ही एक मात्र सूत्र है । अनुभव के सूत्र में सह-अस्तित्व में अनुभव प्रमाण ही सूत्र है । विश्लेषण के रूप में पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञानावस्था ही है। उपलब्धि के रूप में जो मानवापेक्षा सहज विधि से समाधान, समृद्घि,  अभय, सह-अस्तित्व अनुभव सहज प्रमाण ही है । जीवन अपेक्षा सहज रूप में तृप्ति, सुख, शांति, संतोष, आनन्द ही है। जागृतिपूर्ण विधि से जीने के क्रम में सह-अस्तित्व ही विशालता है । ये सब बन्धन मुक्ति का साक्ष्य है । जागृतिपूर्ण विधि से किया गया मानव सहज अभिव्यक्तियाँ है । यह सभी तथ्य को विधिवत देखा गया है, समझा गया है, जीया गया है और अंत में मानवीयतापूर्ण आचरण व्यवहार पूर्वक हर व्यक्ति सर्वतोमुखी समाधान का धारक-वाहक हो सकता है यही ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ का सार्थकता है। (अध्याय:5, पेज नंबर:171-172)
    • जागृति विधि का लोकव्यापीकरण मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार, कार्यविधि से सम्पन्न होना भी देखा गया है । मानवीयतापूर्ण शिक्षा अपने में सत्ता में संपृक्त प्रकृति नित्य वर्तमान और विकास क्रम विकास एवं जागृति क्रम जागृति सहज विधि से पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञानावस्थाओं का पूरकता, उपयोगिता, उदात्तीकरण का अध्ययन है । जिसके फलस्वरूप प्रत्येक मानव में स्वायत्तता, परिवार व्यवस्था में जीने की कला और समग्र व्यवस्था में भागीदारी स्वयं स्फूर्त होना स्पष्ट हुआ है । ये सभी तथ्य अस्तित्व में अनुभव होने का ही फलन है । कोई भी व्यक्ति अस्तित्व में अनुभवमूलक विधि से प्रमाणित कर सकता है ।...(अध्याय:5, पेज नंबर:173)
    • ...उक्त विश्लेषण पूरकता विधि से भौतिक-रासायनिक क्रिया-प्रक्रियाएँ, परमाणु में अंशों का परिवर्तन, परस्पर अणुओं के पूरक विधि से रासायनिक द्रव्यों की महिमा सम्पन्न कार्यकलाप अनेक रचनाएँ, प्रत्येक रचना अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण इसी क्रम में यह धरती भी एक रचना, ग्रह-गोल आदि भी एक रचना है । यह धरती भी अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण है । इस धरती का पूरकता परस्पर ग्रह-गोल, सौर-व्यूह, अनेक सौर-व्यूह, अनेक सौर-व्यूहों के समूह रूपी आकाशगंगा परस्परता में पूरकता विधि से कार्य करता हुआ देखने को मिलता है । यही व्यवस्था के रूप में कार्य करने का गवाही है । सौर-व्यूह में हर ग्रह-गोल परस्परता में निश्चित दूरी के साथ ही तालमेल बनाया हुआ दिखाई पड़ते है । ऐसे तालमेल ही व्यवस्था का स्वरूप है। क्योंकि ऐसे तालमेल विधि से पूरकता, उदात्तीकरण, विकास इसी धरती पर देखने को मिलता है । विकसित परमाणु ही चैतन्य इकाई जीवन हैं आशा बन्धन जीवों में जीवनी क्रम, आशा, विचार, इच्छा बन्धन से जागृति क्रम मानव के रूप में स्पष्ट है । जागृति क्रम ही जागृति रूपी मंजिल के लिए सीढ़ी होना स्वाभाविक रहा । स्वाभाविक प्रक्रिया का तात्पर्य  विकासक्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति और उसकी निरंतरता से है । विकास क्रम भी अपने में निरंतर है । विकास भी निरंतर है, जागृति क्रम भी निरंतर है और जागृति भी निरंतर है । जागृति क्रम का स्वरूप है शिक्षा-संस्कार पूर्वक जागृति की स्वीकृति सम्पन्न होता है । जागृति के अनन्तर मानव कुल सार्वभौम व्यवस्था सहज वैभव सम्पन्न होना । फलस्वरूप जागृति स्वीकृति के अनन्तर प्रमाणित होने का मार्ग प्रशस्त रहता है । इस विधि से अनेकानेक मानव संतान जागृति क्रम में अवतरित होना, जागृतिपूर्ण मार्ग प्रशस्त होना यही मानव कुल का स्वराज्य है, वैभव है ।(अध्याय:5, पेज नंबर:179-180)
    • स्वराज्य व्यवस्था ही होता है, शासन नहीं होता। व्यवस्था के संदर्भ में पहले से उसके स्वरूप को स्पष्ट किया जा चुका है । परिवार मानव विधि से ही स्वराज्य वैभव का उदय होना देखा जाता है। हर परिवार में शरीर यात्रा के लिए शरीर पोषण, संरक्षण एवं समाज गति के लिये आवश्यकीय वस्तुओं को उत्पादित करने का भी कार्यकलाप समाया रहता है। सम्बन्ध-मूल्य-मूल्यांकन-उभयतृप्ति अथवा परस्पर तृप्ति विधि से व्यवहार और आचरण को प्रकट करना मूलत: परिवार का तात्पर्य है । ऐसे परिवार में उक्त तीनों प्रकार की आवश्यकताएँ बनी ही रहती है। इसके निर्वाह क्रम में उत्पादन कार्य की आवश्यकता बना ही रहता है। इसका तात्पर्य यह हुआ परिवार गति और समाज गति के लिए उत्पादन कार्य भी एक आवश्यकीय तत्व है । अस्तु, सम्बंध-मूल्य-मूल्यांकन और उभय तृप्ति विधि से परिवार और समाज सूत्र और आवश्यकता से अधिक उत्पादन-कार्य में परिवार के हर सदस्य का उपयोगिता-पूरकता विधि से भागीदारी परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था के सूत्र में प्रमाणित हो पाता है । इसीलिये प्रत्येक परिवार में, से, के लिए न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनिमय सुलभता, स्वास्थ्य-संयम सुलभता नित्य सार्थक होना सहज है । जिसका स्रोत रूप में मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार और स्वास्थ्य-संयम कार्यकलापों के रूप में होना पाया जाता है। इस प्रकार व्यवस्था सार्वभौमता के दिशा में प्रशस्त होता है और अखण्ड समाज का सूत्र भी नित्य प्रभावी होना पाया जाता है। इसमें मूलसूत्र सह-अस्तित्व सूत्र ही है। यह अथ से इति तक अनुभवमूलक विधि से ही समझ में आता है। अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन होता है फलत: हर व्यक्ति स्वायत्त मानव, परिवार मानव, समाज व्यवस्था मानव के रूप में प्रमाणित होता है। यही अनुभव परंपरा की गरिमा और महिमा है। इसी का फलन मानवापेक्षा और जीवनापेक्षा परिपूर्ति और तृप्ति व उसकी निरंतरता बन पाती है। (अध्याय:5, पेज नंबर:180-181)
    • नियमपूर्वक ही व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी अस्तित्व में दृष्टव्य है । परमाणु अपने में व्यवस्था व समग्र व्यवस्था में भागीदारी का स्वरूप है। इसी क्रम में अणु, अणुरचित पिण्ड, मृदा, पाषाण, मणि, धातु, प्राणावस्था के बीजानुषंगीय प्रत्येक रचना-विरचना, वंशानुषंगीय सम्पूर्ण रचना-विरचना नियमपूर्वक व्यवस्था के रूप में ही प्रकाशित रहते हैं । पदार्थावस्था परिणामानुषंगीय विधि से ‘त्व’ सहित व्यवस्था, प्राणावस्था का सम्पूर्ण प्रकाशन बीजानुषंगीय विधि से त्व सहित व्यवस्था, जीव संसार में सम्पूर्ण प्रकाशन वंशानुषंगीय विधि से त्व सहित व्यवस्था व मानव प्रकृति में संस्कारानुषंगीय (ज्ञानानुषंगीय) विधि से ‘त्व’ सहित व्यवस्था होना पाया जाता है ।
    संस्कार का मूल रूप अनुभव के प्रकाश में किया गया स्वीकृतियाँ है। समग्र अध्ययन का स्वरूप ही है । समग्र अस्तित्व को अनुभव योग्य वस्तुओं के रूप में स्वीकारना प्रमाणित करना ही संस्कार है । संस्कार का तात्पर्य यही है पूर्णता के अर्थ में अनुभवमूलक विधि से प्रस्तुत क्रियाकलाप । शिक्षा के रूप में सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज के अर्थ में स्थापित होना सार्थक संस्कार है । संस्कारित होने का ही प्रमाण है मानवीयता पूर्ण आचरण और व्यवस्था में भागीदारी । इस विधि से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुभव मूलक विधि से अनुभव योग्य तथ्यों को स्थापित करना । स्थापित करने का तात्पर्य स्वीकृत सहज प्रमाण होने से है । अवधारणा का तात्पर्य अनवरत सुख स्त्रोत स्वीकृति एवं प्रमाण है।  (अध्याय:5, पेज नंबर:181-182)
    • .....इस सहज आशय के साथ ही यह तथ्य हर मेधावी व्यक्ति में,से, के लिए स्पष्ट होना स्वाभाविक है कि हम सर्वमानव बंधन मुक्ति रूपी जागृतिपूर्वक ही सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्न होते हैं । ऐसे जागृति सम्पन्नता में, से, के लिए मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार विधि ही एक मात्र उपाय है । मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार का मूल वस्तु जीवन ज्ञान, अस्तित्व-दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान है । यह मानव जागृति पंरपरा के लिए सार्थक सिद्घ होता है।(अध्याय:5, पेज नंबर:187)
    • चेतना विकास, मूल्य शिक्षा का अध्ययन कराना ही शिक्षा का मानवीयकरण है। (अध्याय:5, पेज नंबर:187)
    • वर्णित ऐतिहासिक विफलताएँ अग्रिम अनुसंधान के लिये आधार होना स्वाभाविक है। इस क्रम में इस तथ्य को अनुभव किया जा चुका है कि आँखों से अधिक कल्पनाशीलताएँ हर मानव में विद्यमान है। गणित भी कल्पनाशीलता का ही प्रकाशन है । संख्या के रूप में हर घटना या रूप और गुणों को बताने के लिये प्रयत्न हुआ । गुण ही गति के रूप में होना देखा गया है। गणितीय क्रियाकलाप भी मानव भाषा में गण्य होना पाया जाता है। सर्व मानव में गणना कार्य प्रकट होते ही आया है। ऐसे गणना कार्य को विधिवत् प्रयोग करने के आधार पर रूप सम्बन्धी तीनों आयाम आकार, आयतन, घन को समझने-समझाने का कार्य सम्पन्न होता है। इसी के साथ-साथ गति सम्बन्धी संप्रेषणा भी गणना विधि से लाने का प्रयास हुआ। मध्यस्थ गति गणितीय भाषा में संप्रेषित नहीं हो पायी है। सम-विषमात्मक गतियों को दूरी बढ़ने-दूरी घटने, दबाव और प्रवाह बढ़ने-घटने के साथ परिणामों का आंकलन सहित अध्ययन करने का प्रयास विविध प्रकार से किया गया है। ये दोनों सम-विषम गतियाँ आवेश के रूप में ही गण्य होते हैं जबकि हर वस्तु, हर इकाई, उसके मूल में जो परमाणु है वह अपने स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ही उनके त्व सहित व्यवस्था होना पाया जाता है। जो कुछ भी अस्तित्व में त्व सहित व्यवस्था के रूप में व्यक्त है वह सब मध्यस्थ गति के अनुरूप ही कार्यरत होना देखा गया । मानव में इसका कार्य रूप, कार्य प्रतिष्ठा जागृति मूलक विधि से ही स्पष्ट होना देखा गया है। इसका प्रमाण न्याय, धर्म, सत्य मूलक अभिव्यक्ति के रूप में ही प्रमाणित होता है। इनमें से कम से कम न्यायपूर्ण अभिव्यक्ति क्रम में ही मानव त्व को प्रकाशित कर पाता है । न्याय साक्षात्कार के उपरान्त स्वाभाविक रूप में धर्म और सत्य में जागृत होता है अर्थात् प्रमाणित होता है। इसलिये मानवीयतापूर्ण मानव चेतना पूर्ण पद में संक्रमित होना अति अनिवार्य है । इसी आवश्यकता के आधार पर शिक्षा में प्रावधानित वस्तु जागृति पूर्ण रहना आवश्यक है। यही परंपरा का परिवर्तन कार्य है। शिक्षापूर्वक ही सर्वमानव के जागृत होने का मार्ग प्रशस्त होता है। अतएव मध्यस्थ गति मानव का स्वभाव गति के रूप में मानवीयता को प्रमाणित करने के रूप में ही संभव होता है । फलस्वरूप समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रामाणिकता और स्वायत्तता के साथ दिव्य मानव प्रतिष्ठा शिक्षा-कार्य और प्रमाण वैभवित रहता है। यही मानव परंपरा का सर्वांग सुन्दर वैभव है। इसे अनुभव मूलक विधि से ही सम्पन्न करना संभव है। यही दृष्टा पद परम्परा का भी प्रमाण है। (अध्याय:6, पेज नंबर:194-195)
    • जागृत जीवन व जागृतिपूर्ण जीवन ही अपने कार्य व्यवहार, विचार और प्रयोगों को प्रमाणित करना ही जीवन दृष्टा पद प्रतिष्ठा मानव जागृति सहजता में होने का प्रमाण है। जीवन सहज अनुभव बल के आधार पर जीवन के सम्पूर्ण क्रियाएं अभिभूत होने के फलस्वरूप यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता का स्वीकृति होना व उसकी अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन सहज होना पाया जाता है । सम्पूर्ण सत्य स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य के रूप में ज्ञानगम्य विधि से दृश्यमान होना पाया गया है । क्रम से सह-अस्तित्व में ही दिशा, काल, देश, रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहज अध्ययन चेतना विकास मूल्य शिक्षा विधि से बोध अनुभव ही है । यह हर जागृत मानव के समझ में होता ही है । मानवीयता पूर्ण व्यवहार सहज विधि से अर्थात् मानवीयतापूर्ण आचरण सहित अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करने से इसी स्थिति में, इसी गति में हर व्यक्ति दृष्टापद अनुभव समाधान का प्रमाण प्रस्तुत करना सुगम, सार्थक होना समीचीन रहता ही है । इन्हीं तथ्यों के आधार पर मानव दृष्टा होना सह-अस्तित्व में अनुभव है, प्रमाणित होता है ।(अध्याय:6, पेज नंबर:207)
    • पूर्वावर्ती विचार में रहस्यमयी ईश्वर केन्द्रित विचार के अनुसार ईश्वर ही कर्ता-भोक्ता होना भाषा के रूप में बताते रहे। इसी के आधार पर ब्रह्म, आत्मा या ईश्वर सबका दृष्टा होना बताने भरपूर प्रयास किये । यह मुद्दा रहस्य होने के आधार पर अभी तक वाद-विवाद में उलझा ही हुआ है । जबकि सह-अस्तित्ववाद जीवन ही मानव परंपरा में दृष्टा पद प्रतिष्ठा सहित कर्ता व भोक्ता के रूप में सफल होना देखा गया है । जागृति का प्रमाण केवल मानव परंपरा में ही होता है । जितने भी विधा से सह-अस्तित्व, जीवन और मानवीयतापूर्ण आचरण संगत विधि से किया गया तर्क से, विश्लेषण से, किसी भी दो ध्रुवों के बीच त्व सहित व्यवस्था सहज कार्य प्रणाली से, जीवनापेक्षा अर्थात् जीवन मूल्य और मानवापेक्षा अर्थात् मानव सहज लक्ष्य के आधार पर और सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज क्रम को जानने-मानने-पहचानने, निर्वाह करने के आशयों से अवधारणाएँ सहज रूप में ही जीवन में स्वीकार हो जाता है । इस क्रम में इस तथ्य का उद्घाटन चेतना विकास मूल्य शिक्षा-संस्कार विधि से होता है जीवन ही सार्थकता के लिये जागृत होता है । सार्थकता में जीना ही भोगना है । सार्थकता के लिये ही जागृतिपूर्ण विधि से सभी कार्य व्यवहार करता है । जागृति ही दृष्टा पद सहज प्रमाण है । करना ही कर्ता पद है और जीवनापेक्षा और मानवापेक्षा को भूरि-भूरि विधि से जीना ही भोक्ता पद है । शरीर केवल करने के क्रम में एक साधन के रूप में उपयोगी होना देखा गया है । अध्ययन क्रम में भी सार्थक माध्यम होना देखा गया । अध्ययन-अध्यापन करना भी कत्र्ता के संज्ञा में ही आता है । दृष्टा पद में पूर्णतया जीवन ही जागृति के स्वरूप में प्रमाणित होता है । यह प्रमाण जान लिया हूँ, मान लिया हूँ, प्रमाणित कर सकता हूँ के रूप में स्थिति के रूप में अध्ययन का प्रयोजन होता है । अर्थात् हर व्यक्ति में जागृति स्थिति में होता है, भोगने का जहाँ तक मुद्दा है, मानवापेक्षा सहज समाधान समृद्घि को भोगते समय में सम्पूर्ण भौतिक-रासायनिक वस्तुओं का शरीर पोषण, संरक्षण, समाज गति के अर्थ में अर्पित, समर्पित कर समृद्घि को स्वीकार लेता है । जहाँ तक समाधान, अभय और सह-अस्तित्व में जीवन ही अनुभव करना देखा गया है । जीवनापेक्षा संबंधी सुख, शांति, संतोष आनन्द का भोक्ता केवल जीवन ही होना देखा गया है ।(अध्याय:6, पेज नंबर:208-209)
    • मानव परंपरा में शिक्षा-संस्कार, न्याय-सुरक्षा, उत्पादन कार्य, विनियम कोष, स्वास्थ्य-संयम, व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी सहज मुद्दों पर जागृत सहज प्रमाण होना, जानने-मानने-पहचानने में निरीक्षण समर्थ होना और निर्वाह करने में निष्णात रहना ही प्रामाणिकता है । निष्णातता का तात्पर्य निरीक्षण पूर्वक हर कार्य व्यवहारों को पूर्ण रूपेण, पूर्णता के अर्थ में प्रतिपादित, प्रकाशित और प्रमाणित करना ही है। (अध्याय:6, पेज नंबर:225)
    • मानव में जागृत परंपरा स्थापित होने प्रमाणित होने और उसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए सर्वसुखवादी विधि और व्यवस्था ही एक मात्र शरण है । यह पहले से ही स्पष्ट हो चुकी है जागृति ही विधि है, इसे प्रमाणित करना ही व्यवस्था है। यही व्यवस्था मानवीयता पूर्ण शिक्षा-संस्कार सुलभता व्यवस्था अपने स्वरूप में न्याय-सुरक्षा सुलभता, विनियम-कार्य सुलभता, उत्पादन-कार्य सुलभता, स्वास्थ्य-संयम कार्य सुलभता रूप में होना देखा गया है । यह सर्वसुलभ होना समीचीन है, आवश्यक और संभव है । मानव परंपरा में जागृति का प्रमाण मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार ही है । जागृति और व्यवस्था के निरंतरता क्रम में स्वास्थ्य-संयम प्रणाली अपने आप मानव में, से, के लिये करतलगत होता है। इस प्रकार जागृति और जागृतिमूलक विधि से व्यवस्था सार्वभौम होना स्वाभाविक है । क्योंकि हर मानव जागृत होना चाहता ही है और हर मानव व्यवस्था में जीना चाहता ही है । यही अस्तित्व में अनुभव की महिमा है सह-अस्तित्व का प्रभाव है फलत: जागृति और जागृति का प्रमाण रूप सार्वभौम व्यवस्था मानव परंपरा में सार्थक होता है। यही ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ का प्रयोजन है।(अध्याय:6, पेज नंबर:226-227)
    • जीवन ही दृष्टा, सह-अस्तित्व ही दृश्य, न्याय, धर्म, सत्यपूर्ण दृष्टियों का क्रियाशीलता ही दृष्टि का स्वरूप है। इसका साक्ष्य है न्याय सुलभता (परस्पर मानव और नैसर्गिकता में) धर्म सुलभता (सर्वतोमुखी समाधान सुलभता) और जागृति सुलभता (प्रामाणिकता और प्रमाण सुलभता) यह सब जागृति केन्द्रित विधि से सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य व्यवहार- कार्य रूप में सम्पन्न होना देखा गया है । जागृति हर व्यक्ति का आकांक्षा है ही। इसलिये परंपरा में निर्दिष्ट रूप में शिक्षा-संस्कार परंपरा में इनका सहज अध्ययन-मूल्यांकन पद्घति, प्रणाली, नीतियों को अपनाना ही परंपरा में वांछित परिवर्तन का स्वरूप है। दृष्टा पद रूपी जीवन अथवा दृष्टा पद प्रतिष्ठा में वैभवशील जीवन परंपरा में न्याय, धर्म, सत्य को अभिव्यक्त, संप्रेषित, प्रकाशित करने में मानव ही समर्थ है । इस तथ्य को परीक्षण, निरीक्षण पूर्वक देखने के उपरान्त ही उद्घाटित किया है। इसलिये कि मानवाकांक्षा, जीवनाकांक्षा ही सर्वशुभ के रूप में है। यह सर्वदा मानव परंपरा में सफल होते ही रहेगी । जागृत परंपरा में ही हर मानव और परिवार सर्वाधिक उपयोगी, सदुपयोगी, प्रयोजनशील होते हुए उपकारी होना देखा गया है । उपकारिता का तात्पर्य मानव को, मानव जागृति मार्ग को प्रशस्त कराते हुए देखने को मिला है । यह क्रिया वश जो मानव कर पाता है वह उपकारी होता है वह जागृति सहज प्रमाणों को प्रस्तुत करता ही है, वर्तमान में समीचीन मानव जो जागृत नहीं हुए हैं उन्हें जागृत होने के लिये योग्य प्रस्तुति के रूप में हो जाता है। यह सह-अस्तित्व में अनुभव सहज प्रामाणिकता सहित सर्वतोमुखी समाधान, समृद्घि सम्पन्न स्थिति और गति के रूप में होना देखा गया है; क्योंकि जागृतिगामी अध्ययन प्रणाली से हर व्यक्ति स्वायत्त होता है। स्वायत्तता का स्वरूप स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय (उत्पादन) में स्वावलंबी होना देखा गया है । ऐसे स्वायत्त मानव ही परिवार मानव के रूप में जीने देकर जीने में समर्थ होता है। यही अद्भूत सामर्थ्यवश सर्वतोमुखी समाधान और समृद्घि वैभवित होता है । यही हर स्वायत्त परिवार मानव सफलता का प्रमाण है और सर्वशुभ का भी प्रमाण है। अस्तु, मानव सत्य दृष्टि पूर्वक, धर्म दृष्टि पूर्वक, न्याय दृष्टि सहज स्वायत्त होता है और स्वायत्तता का मूल्यांकन कर पाता है । इसीलिये परिवार मानव का सार्वभौमता (परिवार मानवता में, से, के लिये सर्वमानव में स्वीकृति) प्रवाहित होना सहज है। (अध्याय:6, पेज नंबर:231-232)
    • मानव में संपूर्ण कारण रूपी दृष्टि (जागृति) के आधार पर हर व्यक्ति करणीय कार्यों का निर्धारण कर पाता है । ये निश्चित वैचारिक प्रक्रिया है । इन्हीं कारणवश करने, स्वीकारने के रूप में कार्यकलाप सम्पन्न होते हुए देखने को मिलता है । सर्वमानव में छ: दृष्टियाँ क्रियाशील होने की आवश्यकता और संभावना ही अध्ययनगम्य है, इसे स्पष्ट किया जा चुका है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रिय, हित, लाभ दृष्टि  पूर्वक कोई भी मानव सामाजिक होना संभव नहीं है, व्यवस्था में जीना अति दुरूह रहता ही है । इसी अवस्था को भ्रमित अवस्था के नाम से स्पष्ट किया गया । जागृतिपूर्वक मानव में  न्याय, धर्म, सत्य, दृष्टि विकसित होती है । जागृतिपूर्वक मानव सामाजिक होता है और व्यवस्था में जीता है। हर मानव में, से, के लिये जागृति न्याय, धर्म, सत्य स्वीकृत है और वांछनीय है । भ्रमवश विभिन्न समुदाय परम्पराएँ अपने-अपने सामुदायिक अहम्ता के साथ उनके परंपरा में आने वाले सन्तानों को भ्रमित करने का तरीका खोज रखे हैं । इसलिये हर परंपरा में आने वाले संतान पुन: पुन: भ्रमित होते आए । यह काम बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक देखने को  मिला । दसवें दशक में ‘‘अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित दृष्टिकोण’’ सम्पन्न कुछ लोगों में यह सुस्पष्ट हो गई कि विगत से परम्परा में प्राप्त शिक्षा-संस्कार भ्रम की ओर है । इससे छूटना आवश्यक है । इसी के साथ यह भी समझ में आया कि हर मानव परम्परागत समुदाय मानसिकता से बड़ा होना देखने को मिलता है । इसका साक्ष्य यही है परम्पराओं में कहे हुए विधि से जितना खराब होना था, उतना न होकर उतना भाग सही की ओर होना पाया जाता है । जैसे हर प्रकार की धर्मगद्दियाँ अपने-अपने धर्म के विरोधी सभी पापी है, विधर्मी हैं, अधर्मी हैं, इन सबका नाश होगा। नाश करने वाला ईश्वर परमात्मा, सर्वशक्तिमान है । धर्म को बचाने वाला ही विधर्मियों का संहार करेगा । ऐसे विधर्मियों को संहार करना न्याय है और इससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं । यह तो हुई परस्पर विद्रोहीता के लिये तत्व। यदि ईमानदारी से हर धर्म परम्पराओं में कही हुई बातों पर तुला जाये तो सदा लड़-झगड़ कर मारते ही रहना चाहिये या मरते ही रहना चाहिये । इतना कुछ हुआ नहीं । इसके विपरीत धरती में जनसंख्या बढ़ते ही रहा । इसलिये पता चलता है परंपरा जिस बदतर स्थिति में डालने के लिये अपने-अपने वचनों को बनाये रखा है उससे बेहतरीन स्थिति में अधिकांश लोगों को देखा जाता है । जिसका गवाही में किसी भी देश, काल, जाति, मत, संप्रदाय पंथों के अनुयायी हो अथवा समर्थक हो उन किसी सामान्य मानव से यह पूछने पर कि परस्पर समुदाय लड़ना चाहिये या साथ में जीना चाहिये ? उत्तर साथ में जीना चाहिये मिलता है । इस प्रकार हमें समुदाय परम्पराओं के मान्यताओं से बेहतरीन मानव होने की इच्छा आज भी दिखाई पड़ते हैं ।(अध्याय:6, पेज नंबर:234-236)
    • ....इस धरती में कलात्मक विज्ञान, तकनीकी, व्यापार की शिक्षा ही स्थापित हुई दिखती है । इस धरती में अभी तक न्याय पूर्ण व्यवहार और समाधानपूर्ण व्यवस्था मानवीयता पूर्ण शिक्षा में प्रवेश ही नहीं हो पाया । जबकि विनिमय व सार्वभौम व्यवस्था ही शिक्षा की सम्पूर्ण आत्मा है । ऐसी व्यवहार शिक्षा के लिये आवर्तनशील अर्थशास्त्र और व्यवस्था, व्यवहारवादी समाज शास्त्र और व्यवस्था, मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान और व्यवस्था अनिवार्यतम स्थिति है। उत्पादन, प्रौद्योगिकी, तकनीकी को हर परिवार में समृद्घि सम्मत विधि से विकसित और स्थापित करने की आवश्यकता है। एक पीढ़ी समृद्घ होता है, आगे पीढ़ी को समृद्घ बनाने के लिये स्थापना कार्य को करते रहता है । समृद्घि के मूल में मानव व्यवहार ध्रुवीकृत होना आवश्यक है । मानव व्यवहार सूत्र मानव की परिभाषा और मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में अनुप्राणित होना देखा जाता है। फलस्वरूप परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। शिक्षा-संस्कार से हर मानव में स्वायत्तता प्रमाणित होना ही इसकी सार्थकता है। इन तथ्यों को पहले भले प्रकार से स्पष्ट किया जा चुका है। यथार्थ यही है हर जागृत मानव सुख, शांति, संतोष को ही भोगता है और कोई चीज को भोगता नहीं है । सुविधा-संग्रह भी सुख, लक्षित होना सुस्पष्ट हो चुका है। इसी के साथ इसकी क्षणिकता-भंगुरता भी है, अतएव मानव इतिहास रूपी चारों सोपानों में कहीं भी सुख भोग की निरंतरता नहीं हो पायी। अब केवल परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था उसके पाँचों आयामों सहित कार्यप्रणाली में मानवापेक्षा सहित जीवनापेक्षा रूपी सुख, शांति, संतोष, आनंद भोगने में मिलता है। इसे भले प्रकार से हम देख पाये हैं। इस स्थिति के लिये हर व्यक्ति जागृत हो सकता है। इसी तथ्य के आधार पर सर्वसुख समीचीन है । सर्ववांछनीयता भी यही है । इस प्रकार जीवन भोक्ता है, सुख भोग है, भोग्य वस्तु व्यवस्था है। शरीर सहित मानव समाधान-समृद्घि अभय, सह-अस्तित्व सहज तथ्यों को भोगता है।(अध्याय:6, पेज नंबर:250)
    • मानव परंपरा जागृत होने के लिये अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित विश्व दृष्टिकोण को तर्क संगत विधि से अध्ययनगम्य होने के प्रणालियों से अभिव्यक्त होने के फलन में मानव परंपरा जागृत होना स्वाभाविक है। इसका प्रमाणों का धारक-वाहक अध्यापक ही होना पाया जाता है । निर्देशिका के रूप में वांग्मय और धारक-वाहकता के रूप में अध्यापक ही हो पाते हैं। विद्यार्थियों को जागृत शिक्षा प्रदान करने में समर्थ होना स्वाभाविक है। इस क्रम में मानव परंपरा जागृत होने का संयोग समीचीन है। जागृति निरंतर, न्याय, समाधान, सत्य सहज होता ही है, इसका वैभव ही मानवापेक्षा और जीवनापेक्षा के रूप में सार्थक हो जाता है। ऐसे सार्थकता को प्रमाणित करना ही जागृत मानव परम्परा का तात्पर्य है। (अध्याय:7, पेज नंबर:254)
    • सर्वशुभ विधि जागृति मूलक अभिव्यक्ति और जागृतिगामी शिक्षा-संस्कार ही है। यही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र है। इस विधि से अनुभव मूलक विधि से अभिव्यक्त होने का कार्यक्रम ही शिक्षा-संस्कार के रूप में प्रभावित व वांछित होना देखा गया है। इन तथ्यों को हृदयंगम करने के लिये ‘‘समाधानात्मक भौतिकवाद’’, ‘‘व्यवहारात्मक जनवाद’’ को अवश्य ही अध्ययन करें। मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान सहज विधि से अस्तित्व सदा-सदा ही विकासोन्मुखी सह-अस्तित्व होने के कारण समाधान के अनंतर समाधान ही होना देखने को मिलता है। विकास का हर बिन्दु, हर कड़ी, हर अवस्था अपने आप में समाधान होना दिखाई पड़ती है। हर व्यक्ति को इसे हृदयंगम करना आवश्यक है। (अध्याय:7, पेज नंबर:256)
    • जीना कम से कम तीन आयामों में स्वयं स्फूर्त विधि से सम्पन्न होता है । तभी व्यवस्था में जीने का रस और सुख अपने आप मिलने लगता है । ऐसे तीन आयाम को न्याय सुलभता (न्याय प्रदायिता एवं पाने में सुलभता), उत्पादन सुलभता और विनिमय सुलभता पूर्वक ही हर परिवार व्यवस्था में जीता हुआ अनुभव करता है । ज्यादा से ज्यादा मानव, मानवीयतापूर्ण व्यवस्था में पाँचों आयामों में अपने भागीदारी को प्रमाणित करता है । यह उक्त तीनों के साथ शिक्षा-संस्कार सुलभता और स्वास्थ्य-संयम सुलभता है । इन्हीं व्यवहारिक आधारों के कारण मानव को जागृत और जागृतपूर्ण स्थितियों में देखा गया है । यह सबके लिये समीचीन है । इन्हीं दो स्थिति को क्रम से क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता का नाम दिया है। आचरण की विशालता में ही विशाल, विशालतर और विशालतम व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होना सहज है । सम्पूर्ण प्रक्रिया का सफल स्वरूप समाधान और समृद्घि के रूप में मूल्यांकित होता है । अभय, सह-अस्तित्व मानवीयता पूर्ण आचरण का फलन है । इन तथ्यों को भली प्रकार से देखा गया है । इस प्रकार हर परिवार मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार पूर्वक स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में जीते हुए व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण प्रस्तुत करना सहज है । सहजता का तात्पर्य जागृति पूर्वक प्रमाण सहज गति ही सहज होना । जागृति नित्य समीचीन रहता ही है । यह परम्परा जागृत होने के उपरान्त ही सर्वसुलभ होता है । मानवापेक्षा, जीवनापेक्षा ही सार्वभौम अपेक्षा है । यही जागृति और कैवल्य का प्रमाण है।(अध्याय:7, पेज नंबर:259-260)

    स्त्रोत: अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
    प्रणेता -  श्रद्धेय श्री ए. नागराज